- मनोज
कुमार झा/ वीणा भाटिया
भगवा चुनौती का मुकाबला करने के लिए जनता
परिवार ने महाविलय की घोषणा की थी, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। यह अलग बात है कि
राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम
सिंह यादव को नेता माना है, लेकिन जब गठबंधन बन ही नहीं पाया तो यह सिर्फ कहने की
ही बात रह गई है। अक्टूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। इस चुनाव
में भाजपा का मुकाबला करने के लिए जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का गठबंधन हो चुका है। वामपंथी दल
नीतीश-लालू का समर्थन करेंगे, यह पहले से जाहिर है। इधर, जीतन राम मांझी को भाजपा
ने अपने पाले में ले लिया है। अब ये अलग बात है कि मांझी भाजपा को किस हद तक फायदा
पहुंचा सकेंगे। कुल मिलाकर, बिहार में भाजपा की स्थिति कमजोर दिखाई पड़ती है।
लोकसभा
चुनाव में भले ही भाजपा ने जदयू और राजद को पछाड़ दिया, लेकिन अब परिदृश्य बदल
चुका है। लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर
दिया है, लेकिन बिहार में भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिसे वह नीतीश
कुमार के मुकाबले सामने ला सके। ऐसे में, भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
सहारे ही बिहार विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है, पर मोदी का प्रभाव अब
पहले जैसा रह नहीं गया है। नरेंद्र मोदी को आगे कर विधानसभा चुनाव में उतरने के
पीछे भाजपा का तर्क ये है कि जिन राज्यों में उसने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की पहले
घोषणा नहीं की, वहां उसे जीत मिली। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड,
लेकिन जहां पहले से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी, वहां हार मिली,
उदाहरण के लिए दिल्ली।
इस वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 2017
में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव भाजपा
के लिए काफी मायने रखते हैं। साथ ही, ये वो राज्य हैं जहां जीत हासिल कर पाना
भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। जब तक इन राज्यों में भाजपा को सत्ता नहीं
मिलती, वह भले ही केंद्र की सत्ता में बनी रहे, पर उसकी स्थिति बहुत मजबूत नहीं रह
सकती। बिहार विधानसभा चुनाव में जो समीकरण सामने आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए
भाजपा के लिए जीत दर्ज कर पाना संभव नहीं लगता। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने
में काफी वक्त है, तब तक नए समीकरण उभर सकते हैं और नए गठबंधन भी बन सकते हैं। बहरहाल,
ऐसा लगता है कि जनता परिवार के घटक दलों ने महाविलय की जो घोषणा की थी, उसके
कामयाब नहीं हो पाने के बावजूद जदयू-राजद का गठबंधन कांग्रेस और वामदलों के सहयोग
से चुनाव में जीत हासिल कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि भगवा की जीत और मोदी के
प्रधानमंत्री बनते ही नीतीश कुमार और मुलायम सिंह जैसे नेताओं को अपनी सत्ता के
लिए चुनौती साफ दिखाई पड़ने लगी। भाजपा ने जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद को
उम्मीदवार घोषित किया, तभी नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ले अपना
नाता तोड़ लिया। इसकी वजह यह थी कि मोदी की छवि कट्टरपंथी सांप्रदायिक नेता की रही
है और गुजरात दंगों के लिए उन्हें भाजपा के दिग्गज नेताओं की आलोचना का सामना भी
करना पड़ा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी ‘राजधर्म’ का पालन करने की नसीहत उन्हें दी थी। यह
भी नहीं भूलना होगा कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर भाजपा के और भी कई दिग्गज नेता नरेंद्र
मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ थे, पर राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ के आगे किसी की नहीं चल पाई। इसके साथ ही अमित शाह को भाजपा का
अध्यक्ष बना दिया गया। इससे राजग के घटक दलों की तो छोड़ें, भाजपा में भी असंतोष
गहरा गया जो अभी भी सुलग रहा है और समय आते ही भड़क सकता है। इस लिहाज से नीतीश
कुमार ने राजग से अलग होकर जनता को यह संदेश दिया कि वह उग्र हिंदूवादी तत्वों के
विरुद्ध हैं।
लोकसभा चुनाव में जदयू की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश
कुमार ने इस्तीफा भी दे दिया, पर जिस जीतन राम मांझी को उन्होंने मुख्यमंत्री के
पद पर बैठाया, उन्होंने एक के बाद एक उलटे-सीधे बयान देकर बहुत ही अगंभीरता और
गैरजिम्मेदारी का परिचय दिया। उनकी गतिविधियों ने नीतीश कुमार को बहुत ही परेशानी
में डाल दिया। आखिरकार, खुद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी फिर से संभाल कर नीतीश
कुमार ने एक सही कदम उठाया, क्योंकि चुनावों के दौरान जीतन राम मांझी बहुत नुकसान
पहुंचा सकते थे। मांझी की महत्त्वाकांक्षा मुख्यमंत्री पद पाकर बेलगाम हो चुकी थी
और जिस पेड़ की डाल पर वह बैठे थे, उसकी ही जड़ खोदनी शुरू कर दी थी। अब भाजपा से
गठबंधन कर उन्होंने अपना असली चेहरा दिखा दिया है।
जहां तक जनता परिवार के दलों के महाविलय
का सवाल था, तो यह अभी भी मौजू है। उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह बहुत पहले से ही गैरभाजपा
और गैरकांग्रेसवाद के आधार पर इस तरह का एक महागठबंधन बनाने का प्रयास कर रहे थे। इसके
लिए उन्होंने काफी कोशिश की, पर कतिपय दलों और नेताओं के उत्साह नहीं दिखा पाने के
कारण कारण उनकी योजना मूर्त रूप नहीं ले सकी। इसके बाद भगवा चुनौती का सामना करने
के लिए उन्होंने और नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे नेताओं ने जनता परिवार के महाविलय
की घोषणा की। इनका कहना था कि जनता परिवार के अलग-अलग दलों का विलय इसलिए भी जरूरी
हो गया था, क्योंकि मोदी देश में सर्वसत्तावादी नीतियां चलाने की कोशिश कर रहे
हैं। सांप्रदायिकता से लड़ना भी इसका मुख्य उद्देश्य बताया गया।
भूलना नहीं होगा कि सबसे पहले जनता पार्टी
का गठन इंदिरा गांधी की सर्वसत्तावादी प्रवृत्तियों के ही ख़िलाफ़ हुआ था। उस समय
इमरजेंसी से त्रस्त देश की जनता ने जनता पार्टी को भारी बहुमत से जीत दिलाई, ये
अलग बात है कि अंतर्विरोधों के कारण जनता पार्टी में जल्दी ही बिखराव हो गया। इसके
बाद, राजीव गांधी जब बोफोर्स घोटाले में फंसे तो भ्रष्टाचार विरोध के मसीहा बन कर
उभरे उन्हीं के मंत्रिमंडल में शामिल विश्वनाथ प्रताप सिंह। विश्वनाथ प्रताप सिंह
ने जो जनमोर्चा बनाया। उसमें जनता पार्टी के बहुतेरे घटक दल शामिल हो गए। लेकिन तब
तक जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी के रूप में नया अवतार ले लिया था। कांग्रेस के
कुशासन और भ्रष्टाचार से उबी हुई जनता ने कांग्रेस को चुनाव में हरा दिया और वी पी
सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी। यही वह दौर था जब अयोध्या में राममंदिर
का आंदोलन और सांप्रदायिक उन्माद फैला कर भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ाई थी।
आज केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के साथ
एक बार फिर से सर्वसत्तावादी ताकतें सिर उठा रही हैं। यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे
के लिए बहुत बड़ा खतरा है। बिहार में होने वाला चुनाव इस बात को तय करेगा कि देश
में सर्वसत्तावादी ताकतों को चुनौती मिलती है या नहीं। यह भूलना नहीं होगा कि
भाजपा में सत्ता के केंद्र से दूर कर दिए गए लालकृष्ण आडवाणी ने एक इंटरव्यू में
कहा है कि देश में फिर से इमरजेंसी लग सकती है। यह एक भयावह संकेत है। नीतीश कुमार
की छवि एक ईमानदार और जनपक्षधर नेता की रही है। जहां तक लालू प्रसाद का का सवाल है, भले ही उन पर जितने आरोप लगे हों,
पर यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में भाजपा को सत्ता से दूर रखने में उनकी बहुत
बड़ी भूमिका रही है। आडवाणी के रामरथ को रोककर उन्होंने सांप्रदायिक तत्वों को
खुली चुनौती दी थी। फिलहाल, नीतीश और लालू का एक साथ आना देश में लोकतांत्रिक
ढांचे को बनाए रखने के लिए जरूरी हो गया था। आज की मुख्य चुनौती सांप्रदायिक
ताकतों को आगे बढ़ने से रोकने की है। बिहार को ही अब इस चुनौती का सामना करना है।
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