Thursday, 7 September 2017

अरुण माहेश्वरी के नाम खुला पत्र - मनोज कुमार झा





आदरणीय अरुण माहेश्वरी जी,

‘लहक’ पत्रिका का नाम मैंने आपसे ही सुना। आप इसके नियमित लेखक रहे हैं। कोई भी पत्रिका उसके सम्पादक की निजी संपत्ति नहीं होती। स्वत्वाधिकार उसका ज़रूर होता है, पर पत्रिका में जो लेख, कहानी, कविता, विचारों का प्रकाशन वह करता है, उस पर सार्वजनिक चर्चा होती है। इधर लहक सम्पादक के कुछ विचारों के बारे में जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और इस बात पर भी कि आपके जैसे विचारक ने इस पर चुप्पी साध रखी है। लहक सम्पादक द्वारा निराला और गाँधी को जातिवादी ठहराया जाना, प्रेमचंद को पश्चिमपरस्त बताया जाना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो गंभीर रूप से विचारणीय हैं। इतना ही नही, धर्मवीर भारती, भगवतीचरण वर्मा और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन जी को एक फ्रेंच लेखक की पुस्तक का नकलची कहते हैं। आप इनका फेसबुक पेज देखें कि ये क्या उलटी-सीधी बातें लिख रहे हैं और सूअर आदि लिख कर कैसे काव्य का सृजन कर रहे हैं। यदि यह व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है तो इसे अपना इलाज कराना चाहिए। ये महोदय साफ कहते हैं कि कोई भी आलोचना से परे नहीं है, बात ठीक है, पर जिस तरह की बेसिर-पैर की बातें ये कर रहे हैं, वह कहाँ तक उचित है। पिछले दिनों इन्होंने सुशील कुमार को, साथ ही परोक्ष तौर पर मुझे भी क्या नहीं कहा है। आप इस मैगजीन से जुड़े रहे हैं, इसलिए कुछ लिहाज भी कर रहा हूँ, नहीं तो इस तरह के अहमक तत्वों से निपटना मुझे अच्छी तरह आता है। आप इन महोदय को समझा दें कि ये अपनी सीमा में रहें, अन्यथा सही नहीं होगा। मैं इनकी लहक की बहक को शान्त कर दूँगा। जो निराला, प्रेमचंद और गाँधी का अपमान कर सकता है, वह किसी का भी अपमान कर सकता है। ऐसे तत्व जो परजीवी होते हैं, शातिर किस्म के लोगों के द्वारा जनवादी संघर्ष की जड़ों में मट्ठा डालने के लिए प्रत्यारोपित किए जाते हैं।

आभार और धन्यवाद।

मनोज कमार झा