Wednesday, 24 December 2014

क्या जनता परिवार एकजुट हो भगवा चुनौती का सामना कर पाएगा

 -मनोज कुमार झा

केंद्र में मोदी सरकार के बने अभी सात महीने ही हुए हैं, पर इसकी लोकप्रियता का ग्राफ तेज़ी से नीचे आता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में मोदी-अमित शाह का ‘मिशन 44+’ बुरी तरह फेल हो गया। झारखंड में भाजपा को सफलता मिली है, पर लहर जैसी कोई बात दिखाई नहीं पड़ी। झारखंड में मिली जीत की वजह जनता के सामने अन्य विकल्प का नहीं होना है। भूलना नहीं होगा कि झारखंड बने 14 साल हुए हैं, जिनमें 10 साल तक भाजपा ही वहां जोड़-तोड़ कर सत्ता पर काबिज़ रही है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी को संभवत: यह बात याद नहीं रही और उन्होंने दावा किया पिछली सरकारों ने झारखंड को लूटने का काम किया है। यह सच है। हर सरकार ने झारखंड को लूटा है और भाजपा वहां सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रही, इसलिए उसने राज्य को सबसे ज्यादा लूटा है। एक बार फिर से झारखंड को लूटने का ‘जनादेश’ उसे मिल गया है। जम्मू-कश्मीर में भी सरकार बनाने को लेकर भाजपा नेतृत्व उत्साह में दिखा। हर तरह के विकल्प खुले रखती है भाजपा। महाराष्ट्र में जो सरकार बनी, हर तरह के विकल्प खुले रख कर ही बनी। अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जीत का लड्डू खाकर यह घोषणा कर दी है कि अगला नंबर बिहार और बंगाल का है। भारत विजय की तैयारी है भाजपा की। अश्वमेध का यज्ञ शुरू हो गया है। अब देखना यह है कि कम से कम वोटरों का समर्थन पाकर हर जगह सत्ता में आती जा रही भाजपा वो क्या कदम उठाती है कि इसका जलवा कायम रहे। खास बात यह है कि इसकी नीतियों के देखते हुए विरोधी तो विरोधी, आम जनता में भी असंतोष पैदा होने लगा है, क्योंकि अब तक मोदी जी ने सिर्फ़ बातें ही बड़ी-बड़ी की हैं। शासन-प्रशासन, अर्थव्यवस्था और तमाम मुद्दों पर सरकार की कोई उपलब्धि सामने नहीं आ सकी है। जनता को यह महसूस होने लगा है कि यह सरकार तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से भी अधिक नाकारा है।

दूसरी तरफ, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तेवर दिन-ब-दिन लगातार उग्र होता जा रहा है। विश्व हिंदू परिषद् और संघ परिवार के अन्य संगठन साम्प्रदायिक मुद्दों को उभारने की पुरज़ोर कोशिश में लगे हुए हैं। वे भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। जनता के मुद्दे हवा हो गए। बात सिर्फ़ धर्मांतरण की चल रही है। ‘घरवापसी’ कराने पर पूरा ज़ोर है। इसे लेकर संसद में कांग्रेस समेत अन्य दल लगातार विरोध जता रहे हैं, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पर मुंह खोलने की ज़रूरत नहीं समझी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने खुलेआम धर्मांतरण और ‘घरवापसी’ का आह्वान किया है। आपत्तिजनक बयान देते हुए उन्होंने हिंदुओं को ‘अपना माल’ घोषित किया और कहा कि वे मुस्लिम और ईसाइयों की ‘घरवापसी’ कराएंगे। जाहिर है, इससे साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ेगा, पर भाजपा तो चाहती ही यही है। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे ही वह केंद्र की सत्ता में पहले भी आई और अभी भी आई है, इसलिए वह साम्प्रदायिक नीतियों को छोड़ नहीं सकती। नरेंद्र मोदी उग्र हिंदुत्व के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वो लाख ‘विकासपुरुष’ बनने का दावा करें, पर इसे कोई मानेगा नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने बहुत सोच-समझ कर उन्हें भाजपा नेतृत्व में शीर्ष पर पहुंचाया। अब ये उन पर है कि वे संघ को उसका एजेंडा लागू करने की पूरी छूट दें। धर्मांतरण के मुद्दे पर भाजपा के नेताओं का कहना है कि वे जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन कराए जाने के पक्ष में नहीं हैं, पर ‘घरवापसी’ जैसे साम्प्रदायिक अभियानों का खुला समर्थन भी कर रहे हैं। दूसरी बात, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि धर्मांतरण से जुड़ा मुद्दा राज्यों का है। इसे उन्हें देखना चाहिए। उल्लेखनीय है कि विश्व हिंदू परिषद् ने यह घोषणा की है कि जल्दी ही अयोध्या में चार हज़ार मुसलमानों को हिंदू बनाया जाएगा, यानी बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया जाएगा। जाहिर है, इससे बड़े पैमाने पर साम्प्रदायिक विद्वेष फैलेगा। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तेज़ होगा और भाजपा इससे फायदा उठाएगी। क्या नरेंद्र मोदी की सरकार विश्व हिंदू परिषद् को उसके इस साम्प्रदायिक अभियान से रोक सकती है? हर्गिज़ नहीं। इसके पीछे वजह है कि भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे ही उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होना चाहती है। इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए भाजपा और संघ परिवार ने पहले वहां लव जिहाद का मुद्दा गर्म किया था, पर वह पिट गया। अब खुल कर धर्मांतरण कराने की योजना है। इससे साम्प्रदायिक घृणा का माहौल बनेगा और भाजपा अपने मंसूबे पूरा कर सकेगी। यही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी संघ परिवार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति पर चल रहा है। मुंबई में विहिप के एक कार्यक्रम में तोगड़िया और ऐसे ही भगवा ढोंगियों ने कहा कि हिंदू सिर्फ़ भारत में ही नहीं हैं। रूस भी पहले हिंदू देश था। वे यूरोप और अन्य महाद्वीपों को भी हिंदू बताते हैं। इसके साथ ही, समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को, खासकर बांग्लादेशियों के डरा-धमका कर उनका धर्मांतरण कराए जाने के मामले सामने आ रहे हैं। तरह-तरह के संगठन सामने आ रहे हैं, जो पोस्टरों-पैम्फलैटों के माध्यम से हिंदू धर्म की ध्वजा ऊंचा लहराने की कोशिश में लगे हैं। ये बेलगाम हैं और खुली गुंडागर्दी पर ऊतारू हैं। जाहिर है, नरेंद्र मोदी के सत्ता में होने के कारण ये किसी तरह का भय महसूस नहीं कर रहे, पर इनके क्रिया-कलापों से देश के अल्पसंख्यकों में एक तरह का ख़ौफ़ पैदा हो रहा है। इसकी प्रतिक्रिया बहुत बुरी हो सकती है। कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद देश में एक तरह का भगवा आतंकवाद फैल रहा है। क्या अब मुसलमानों और ईसाइयों के जबरन हिंदू बनाया जाएगा, यह डर अल्पसंख्यकों में पैदा हो रहा है। जाहिर है, कमजोर वर्ग के और ग़रीब लोग ही इनके निशाने पर आते हैं। आर्थिक दृष्टि से संपन्न और अच्छी हैसियत रखने वाले मुस्लिम-ईसाइयों का ये कुछ नहीं कर सकते।

उल्लेखनीय है कि जब नरेंद्र मोदी ने धर्मांतरण कराने वाले संगठनों से अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की तो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने ‘सामना’में लेख लिख कर कहा कि नरेंद्र मोदी धर्मांतरण का विरोध नहीं कर सकते, वो इसके पक्ष में ही रहेंगे। वहीं, संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हज़ार साल के बाद देश में हिंदूराज स्थापित हुआ है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने इसका विरोध करने की जरूरत नहीं समझी। क्या इसका मतलब ये नहीं कि संघ परिवार को साम्प्रदायिक ज़हर फैलाने की पूरी छूट मिल गई है? संघ यह मान कर चल रहा है कि देश की सत्ता अब उसके हाथ में है। नरेंद्र मोदी महज संघ के एक मोहरे हैं। संघ ने उन्हें भाजपा में शीर्ष पर पहुंचाया। फ़िर भला वो संघ की धर्मातंरण करने की नीतियों का विरोध कैसे कर सकते हैं! स्वयं उनकी छवि भी गुजरात में सुनियोजित दंगा करवाने वाले नेता की रही है। अपने को उदारवादी कहने वाले अटल-आडवाणी ने उनका खुलेआम विरोध किया था, वहीं शिवसेना जैसे कट्टर संगठनों ने उनका समर्थन किया था। तो क्या यह माना जाए कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए संघ परिवार देश में भगवा आतंकवाद फैलाएगा।

यह एक गंभीर सवाल है। लेकिन देश में राजनीतिक विकल्पहीनता की जो स्थिति बन गई है, उसमें इसका जवाब देने वाला कोई नहीं। भगवा ब्रिगेड के हौसले बुलंद हैं। संघ समझ रहा है कि अपनी साम्प्रदायिक नीतियों को आगे बढ़ाते हुए और मोदी की प्रचार शैली के सहारे उसे देश के बाकी राज्यों में भी सत्ता हासिल कर लेने में सफलता मिल जाएगी। यद्यपि जम्मू-कश्मीर में उसका दांव नहीं चल पाया, पर यही बात यूपी, बिहार, बंगाल के बारे में नहीं कही जा सकती। भूलना नहीं होगा कि इन राज्यों में वोटर अभी शासन कर रहे दलों से पूरी तरह असंतुष्ट हो चुके हैं और महज बदलाव के लिए वे भाजपा के पाले में जा सकते हैं। कांग्रेस का तो हर जगह सूपड़ा साफ होता दिखाई पड़ रहा है, वहीं क्षेत्रीय दलों और क्षत्रपों में भी हड़कंप की स्थिति है। उनमें यह भय व्याप्त हो चुका है कि कहीं उनका पूरी तरह सफाया ही न हो जाए।

इसे देखते हुए पिछले दिनों मुलायम, लालू, नीतीश, शरद और जनता परिवार के पुराने नेता दिल्ली में जंतर-मंतर पर महाधरना देने के लिए एकजुट हुए। बिहार में लालू और नीतीश पहले ही हाथ मिला चुके हैं। इसके पहले भी दिल्ली में मुलायम की पहल पर जनता परिवार के नेता जुटे थे और उन्होंने एक फ्रंट बना कर भगवा चुनौती का सामना करने की बात कही थी। कहा जा रहा है कि मुलायम के नेतृत्व में जनता परिवार के कथित दल महाविलय भी कर सकते हैं और एक पार्टी बना कर एक झंडे के साथ मैदान में उतर सकते हैं। कहा ये भी जा रहा है कि पहले लालू और नीतीश अपने दलों का विलय करेंगे। इनकी कोशिश है कि ममता बनर्जी भी इनके साथ आ जाएं। उल्लेखनीय है कि अमित शाह ने अगला निशाना बंगाल को बना रखा है। उन्होंने वहां काफी सरगर्मी शुरू की है। सारदा घोटाले में तृणमूल के सांसद की गिरफ्तारी के बाद ममता भी बौखला गई हैं और वह खुल कर नरेंद्र मोदी सरकार को चुनौती दे रही हैं। मुलायम द्वारा प्रस्तावित महादल में उनके आने की संभावना काफी है, पर सवाल ये है कि फिर वामपंथियों का क्या होगा। क्या वामपंथी इस महादल से दूर रहेंगे या फिर वे बाहर से इनका समर्थन करेंगे? यही बात मायावती के साथ है। मायावती मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हैं, पर क्या उनका मुलायम के साथ आ पाना संभव है? अगर सारे मोदी विरोधी दल एकजुट नहीं होते तो फिर वे सफल कैसे हो सकेंगे। यहां स्पष्ट है कि जंतर-मंतर पर हुए महाधरने में शामिल सभी नेताओं ने मुलायम का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है, पर ममता के बारे में ये नहीं कहा जा सकता। वहीं, वामपंथियों की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं है।

सवाल ये है कि महाविलय के बाद अगर जनता परिवार एक होता भी है तो क्या ये भगवा चुनौती का सामना कर सकेगा। भूलना नहीं होगा कि ये वही दल हैं, जिनके नेताओं पर न जाने भ्रष्टाचार के कितने मामले चलते रहे हैं और जनता के बीच इनकी छवि कतई साफ-सुथरी नहीं रही है। लालू से लेकर मुलायम तक के चेहरे भ्रष्टाचार की कालिख से पुते हुए हैं। ममता के सांसद भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं और ममता उनके बचाव में सामने आ रही हैं। लालू से लेकर मुलायम तक ने जातिवाद को बढ़ावा तो दिया ही, अल्पसंख्यकवाद को भी अपना राजनीतिक औज़ार बनाया। इन्होंने मुस्लिम तुष्टिकरण के सहारे अपनी राजनीति की है। साथ ही, राजनीति में वंशवाद को बढ़ावा देने में ये कांग्रेस से जरा भी पीछे नहीं रहे हैं। ग़रीब जनता के मुद्दे कभी इनकी प्राथमिकता में नहीं रहे। इसके विपरीत, अपने व्यवहार से इन्होंने ग़रीबों का मजाक उड़ाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। अभी हाल में ही मुलायम ने जिस राजसी तौर-तरीकों से अपना जन्मदिन मनाया, उसे देखते हुए कतई नहीं कहा जा सकता कि ये आम जनता के हित में काम कर सकते हैं। ये सिर्फ़ सत्ता के भूखे हैं। अब इन्हें यह डर समा गया है कि कहीं इनका अस्तित्व ही न मिट जाए, इसलिए इसे घोर संकट की घड़ी मानते हुए ये अब एक साथ आ रहे हैं। जनहित इनका मुद्दा नहीं है, ये बस किसी तरह अपनी सत्ता बचाए रखना चाहते हैं। खास बात ये भी है कि मुलायम सिंह की प्रधानमंत्री बनने की बहुत पुरानी लालसा है। इसी चक्कर में इन्होंने यूपी का ताज अपने सुपुत्र अखिलेश यादव को सौंपा था, पर अब तो सूबे की सत्ता बनाये रख पाने का संकट दिखाई पड़ रहा है। मोदी-अमित शाह की जोड़ी का अगला निशाना यूपी-बिहार ही है। यूपी-बिहार और बंगाल फतह के बाद ही भगवा का भारत विजय अभियान पूरी हो सकता है। मुलायम-लालू-नीतीश इस ख़तरे को भांप रहे हैं और इस जुगत में लगे हैं कि किसी तरह उनकी सत्ता पर आंच न आए। पर भगवा चुनौती का सामना कर पाना उनके लिए कठिन ही नहीं, असंभव-सा है। संघ की ताकत कोई एक दिन में इतनी नहीं बढ़ी है। इसके पीछे भी इन नेताओं की जनविरोधी नीतियां और सत्ता संचालन में नाकामी रही है। मुलायम-नीतीश-लालू कांग्रेस के समर्थक रह चुके हैं। नीतीश तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सवाल पर भाजपा गठबंधन राजग से अलग हुए। बाकी उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व से कोई दिक्कत नहीं थी। ये इनकी वैचारिक स्थिति है। वामपंथियों का वैचारिक दिवालियापन तो बहुत पहले से उजागर होता रहा है। इसलिए यह उम्मीद करना बेमानी होगा कि जनता परिवार महाविलय कर नरेंद्र मोदी की सत्ता के लिए कोई चुनौती पेश कर पाएगा। अभी जो हालात बन रहे हैं, उसमें भगवा आतंक का कहर बढ़ेगा। कोई जनविकल्प दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ता। ऐसे में, सामाजिक-राजनीतिक संकट और भी गहराएगा। जनता को और भी दुर्दिन देखने हैं।

Saturday, 13 December 2014

साम्प्रदायिकता की चुनौती

- मनोज कुमार झा
प्रेमचंद ने कहा था कि
साम्प्रदायिकता हमेशा संस्कृति की खाल ओढ़ कर आती है।आज यह बात सच होती दिखाई पड़ रही है। साम्प्रदायिक ताकतों ने हिंदू संस्कृति के नाम पर देश में अराजक माहौल बनाना शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद साम्प्रदायिक ताकतों को सरकार का संरक्षण मिल रहा है और यही कारण है कि सरकार में शामिल कई मंत्री खुल कर आपत्तिजनक बयान दे रहे हैंअभी साध्वी निरंजन ज्योति के ‘रामजादे और हरामजादे’ वाला विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भगवद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग कर डाली।
अब इस पर विवाद शुरू हो गया है। भगवद् गीता की मान्यता एक हिंदू धर्मग्रंथ के रूप में है। इस दृष्टि से इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का कोई तुक नहीं। वैसे भी किसी ग्रंथ को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाना कहीं से भी समझदारी की बात नहीं लगती। लेकिन भाजपा लगातार ऐसे मुद्दों की तलाश में रहती है कि कैसे किसी बहाने हिंदू वोटरों को अपनी तरफ खींचा जाए। उनके पास जन समस्याओं से जुड़े मुद्दे हैं नहीं, इसलिए ऐसे मुद्दे उछालना उनकी मजबूरी ही है। भूलना नहीं होगा कि भाजपा पहली बार जब सत्ता में आई थी, तो साम्प्रदायिक मुद्दे के आधार पर ही। आडवाणी की रामरथ यात्रा और बाबरी मस्जिद विध्वंस को कौन भूल सकता है भला। इस यात्रा के माध्यम से साम्प्रदायिक उन्माद भड़का भाजपा पहली बार केंद्र की सत्ता में आ सकी। लेकिन तब भाजपा सरकार गठबंधन सरकार थी और इसलिए खुलकर साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा पाना उसके लिए मुमकिन नहीं था। लेकिन अब केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो अपने उग्र तेवर के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्द हो चुके हैं। गुजरात दंगों के दौरान इन्होंने जो नाम कमाया, उससे प्रभावित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इन्हें प्रधान सेवक बना दिया। इन्होंने अपने मंत्रिमंडल में शामिल लोगों को स्वतंत्र निर्णय लेने से रोक दिया है और उनकी हैसियत कठपुतला-कठपुतली वाली कर दी है। इसके साथ ही, ये अब राज्यों में भाजपा की सत्ता कायम करने के प्रयास में लगे हुए हैं। विकास के नाम पर राजनीति करने का दिखावा करने वाले मोदी जब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं करते, चुनावों में सफलता नहीं मिल सकती। इस काम में भाजपा के दंगारोपी और तड़ीपार रह चुके अध्यक्ष अमित शाह लगे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है। इसके अलावा, अपने मंत्रिमंडल में मोदी ने गिरिराज सिंह जैसे गुंडों और बलात्कारियों तक को शामिल कर रखा है। अब येन-केन-प्रकारेण राज्यों की सत्ता हासिल करना इनका लक्ष्य है। 

इसके लिए ये किसी हद तक जा सकते हैं। चुनाव के पहले दंगा भड़काना, दंगाइयों को सम्मानित करना आदि ऐसे काम हैं, जो दिखाते हैं कि मोदी सरकार किस तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति पर पुरजोर तरीके से चल रही है और चलती रहेगी, क्योंकि इसका विकल्प नहीं है और विरोधी दलों को समझ में नहीं आ रहा कि वे करें तो क्या। 

दूसरी तरफ, मोदी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे बदलाव करने जा रही है, ताकि नई पीढ़ी को कूपमंडूक बनाया जा सके और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि आधारित चेतना कुंद की जा सके। इसके लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं और इसका कहीं कोई विरोध नज़र नहीं आ रहा। साम्प्रदायिक ताकतें सबसे पहले इतिहास पर ही हमला करती हैं। वो इतिहास के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं, ताकि जनता को बरगलाया जा सके। रामजन्मभूमि का विवादित मुद्दा और बाबरी मस्जिद का विध्वंस इनके इतिहास को विकृत करने के प्रयास का ही नतीजा था। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू से ही साम्प्रदायिक एजेंडे को देशभर में फैली अपनी शाखाओं के माध्यम से प्रचारित करता रहा, पर नेहरू और उनके बाद इंदिरा गांधी के शासन के दौर में उसे कोई खास सफलता नहीं मिली। इसकी वजह थी कि इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में वैज्ञानिक विचारों का जहां तक संभव हो सका, समावेश किया। 

दूसरे, उस दौरान समाजवादी और कम्युनिस्ट भी ताकतवर थे। इस वजह से संघ दुबका रहा। लेकिन फिर भी वह तरह-तरह के संगठनों और देश भर में फैले सरस्वती शिशु शिक्षा मंदिरों के माध्यम से साम्प्रदायिकता के प्रसार की नीति पर चलता रहा और हिंदू राष्ट्र का झंडा बुलंद करता रहा। इमरजेंसी के दौरन इंदिरा गांघी ने तमाम संघियों को जेल में ठूंस दिया। इसके बाद जब जनता दल का गठन हुआ तो जनसंघ उसमें शामिल हो गया। यह जनता पार्टी में शामिल दलों की ढुलमुल नीतियों की वजह से हुआ, बावजूद संघ को सफलता नहीं मिली। राजनीति में जगह बना पाने में वह कामयाब नहीं हो सका। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर पर सवार होकर राजीव गांधी सत्ता में आए, पर साम्प्रदायिक सवाल पर उनकी नीतियां भी ढुलमुल थीं। बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण उन्हीं के समय में आया था, जिसे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के रूप में देखा गया। साथ ही, विवादित रामजन्मभूमि का ताला भी उनके समय में ही खोला गया, जिसने संघ परिवार को इस मुद्दे पर राजनीति करने का अच्छा-खासा मौका दे दिया। 

खास बात ये है कि राजीव गांधी ने भी इंदिरा गांधी के बाद सिखों के खिलाफ़ भड़के दंगों पर कोई कठोर रुख नहीं अपनाया था और एक तरह से कांग्रेसी दंगाइयों का बचाव ही किया था। सिखों के खून से बड़े कांग्रेसी नेताओं के हाथ रंगे हुए थे। ऐसे में, उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर कोई संतुलित नीति अपनाएंगे। राजीव की सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार-घोटालों में डूब गई। उनके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में जो अल्पमत सरकार बनी, उसे वामपंथियों के साथ भाजपा ने भी समर्थन दिया। सिर्फ़ कांग्रेस विरोध के नाम पर ऐसा करना उचित नहीं था, क्योंकि इससे भाजपा की ताकत बढ़ी और इसके बाद ही उसने रामजन्मभूमि का मुद्दा जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया। रामरथ यात्रा शुरू की। परिणाम दंगे और आगे चल कर भाजपा की सरकार।

देखा जाए तो शुरू से ही कांग्रेस के पास साम्प्रदायिकता विरोध की कोई ठोस नीति नहीं थी। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की उसकी समझ भी स्पष्ट नहीं थी। अगर ऐसा होता, कांग्रेस नेतृत्व वास्तव में धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिकता विरोधी होता तो क्या देश का विभाजन हो पाता? उल्लेखनीय है कि 1857 के गदर के बाद से ही अंग्रेजों ने सुनियोजित तौर पर साम्प्रदायिक नीति की शुरुआत कर दी थी, आगे चल कर जिसके जाल में कांग्रेस लगातार उलझती चली गई। धार्मिक आधार पर 1905 में ही लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया था। साम्प्रदायिक आधार पर किए गए इस विभाजन का भारी विरोध हुआ और बंगभंग के विरोध में आंदोलन चला। इसके परिणास्वरूप दो साल बाद 1907 में अंग्रेजों को यह विभाजन वापस लेना पड़ा। लेकिन इसके बाद भी अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक राजनीति जारी रखी, जिसका विरोध कांग्रेसी नेतृत्व नहीं कर सका। साम्प्रदायिकता के समक्ष सबसे निर्लज्ज समर्पण कांग्रेस और वामपंथियों ने तब किया, जब उन्होंने माउंटबेटन प्लान को स्वीकार कर देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया। जाहिर है, कांग्रेस को जल्दी से जल्दी सत्ता पाने की लालसा थी। वामपंथियों का वैचारिक दिवालियापन तो इससे जाहिर होता है कि उन्होंने पाकिस्तान बनने की वकालत की थी। धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया था। आखिर, इनसे ये कैसे उम्मीद की जा सकती थी कि ये भारतीय राजनीति से साम्प्रदायिक तत्वों को दूर रखने में सफल हो सकेंगे। हुआ यह कि बहुसंख्यक यानी हिंदू साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए इन्होंने अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और अल्पसंख्यकों का सुरक्षित वोटबैंक के रूप में इन्होंने इस्तेमाल किया। इसकी प्रतिक्रिया में हिंदू संप्रदायवाद और भी मजबूत होता रहा। 

अब राष्ट्रीय राजनीति के पटल से कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के सफाये के बाद साम्प्रदायिक चुनौती बहुत ही प्रबल हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने एक राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा का लगभग खात्मा ही कर दिया है, क्योंकि पार्टी में मोदी और अमित शाह के अलावा अन्य किसी नेता का कोई वज़ूद ही नहीं है। मोदी एकाधिकारवादी हैं। वह ‘मैं’ की बात करते हैं, ‘हम’ की नहीं। मंत्रिमंडल में छांट-छांट कर ऐसे लोगों को रखा है, जो कोई आवाज़ न उठा सकें। भाजपा के बड़े कद-काठी के नेता दरकिनार कर दिए गए। उन्हें ‘मार्गदर्शक मंडल’ में बिठाकर मौन रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है।

बहरहाल, चिंता का विषय यह है कि मोदी सरकार शिक्षा में पाठ्यक्रम में जो बदलाव करने जा रही है, वह पूरी की पूरी पीढ़ी को मानसिक रूप से पंगु बना सकती है। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में गुजरात में पहले से ही संघ के इतिहासकार दीनानाथ बत्रा की अवैज्ञानिक किताबें पढ़ाई जा रही हैं। उन्ही किताबों को सभी राज्यों में थोपने की योजना है। दीनानाथ बत्रा जैसे इतिहासकारों की संघ में कमी नहीं है। इनका मानना है कि ताजमहल पहले हिंदू मंदिर था। ये मिसाइल टेक्नोलॉजी महाभारत से उत्पन्न मानते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री की समझ कितनी वैज्ञानिक है, यह इससे ज़ाहिर हो गई कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि पुराणों में स्टेम सेल टेक्नोलॉजी थी। गणेश जी को सूंड लगाया जाना प्लास्टिक सर्जरी को दिखाता है। यह सब अत्यंत ही हास्यास्पद है, पर आश्चर्य की बात तो ये है कि इसका कहीं कोई विरोध दिखाई नहीं पड़ता। किसी भी वैज्ञानिक ने, किसी भी इतिहासकार ने सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री की इन अवैज्ञानिक बातों का विरोध नहीं किया। वहीं, इतिहास और समाज विज्ञान की राष्ट्रीय शोध संस्थाओं में चुन-चुन कर ऐसे लोग बैठाए जा रहे हैं, जो संघ की साम्प्रदायिक विचारधारा में यकीन रखते हैं और अंधविश्वासी हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् का अध्यक्ष वाइ. सुदर्शन राव को बना दिया गया है, जिनकी शोध के क्षेत्र में कोई खास उपलब्धि नहीं है और जो वर्णाश्रम व्यवस्था को उचित ठहराते हैं। ऐसे तथाकथित विद्वान किस तरह का शोधकार्य कराएंगे, ये आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे ही कूपमंडूकों को चुन-चुन कर लाया जा रहा है। ये जनता के धन पर ये पता लगाएंगे कि राम और कृष्ण का जन्म कब हुआ था, जबकि माना जाता है कि वो अवतारी पुरुष थे, वास्तविक नहीं। वो कथा के काल्पनिक पात्र हैं, पर इतिहास अनुसंधान परिषद् यह शोध कर पता लगवाएगा। रामसेतु की ऐतिहासिकता पर तो विवाद पहले से ही चल रहा है, अब पुष्पक विमान और शेषनाग की ऐतिहासिक सच्चाई का लगाया जाएगा। सवाल है, इन अवैज्ञानिक धारणाओं का विरोध विश्वविद्यालयों में बैठे वो मार्क्सवादी प्रोफेसर और बुद्धिजीवी क्यों नहीं कर रहे, जिन्होंने इतिहास और समाज विज्ञान के क्षेत्र में व्यापक शोध किए हैं। क्या उन्हें भी वर्तमान सत्ता से भय है? दूसरी तरफ, कतिपय टीवी चैनल तो राम के जीवन की विविध तिथियों की घोषणा भी करने लगे।

सिर्फ़ इतना ही नहीं, राजनीतिक प्रचार के दौरान अब भाजपा और संघ परिवार के लोग खुलेआम ज़हर उगलते हुए साम्प्रदायिक प्रचार कर रहे हैं। इस मामले में सबसे आगे है भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। पश्चिम बंगाल में उन्होंने ग़लत आरोप लगाते हुए यहां तक कहा दिया कि वर्दमान विस्फोटों के पीछे अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी लोगों का हाथ है और तृणमूल ने इसकी फंडिंग की है। इसका विरोध केंद्रीय मंत्री ने किया। जहां भी चुनाव होने होते हैं, भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति पर चल पड़ती है। अब तक इसी नीति से इन्हें फायदा मिला है। इसलिए ये समझ चुके हैं कि ये नीति कारगर है। यही नहीं, जब लव जिहाद का मुद्दा इनका फेल हो गया तो अब इन्होंने निम्न तबके के मुसलमानों को लालच देकर धर्मपरिवर्तन कराना भी शुरू कर दिया है। अभी हाल में ही आगरा में ऐसी घटना सामने आई, जिसमें कई परिवारों का धर्मपरिवर्तन आरएसएस और बजरंग दल ने करवाया। संघ की नीति पूरी तरह से साम्प्रदायिकता को उभारने की है, क्योंकि उसे पता है कि इसी के सहारे सत्ता में आए और इसी ते सहारे सत्ता में बने भी रहेंगे। सवाल है, साम्प्रदायिकता की इस चुनौती का जवाब क्या है।