- मनोज कुमार झा
प्रेमचंद ने कहा था कि
साम्प्रदायिकता हमेशा संस्कृति की खाल ओढ़ कर आती है।आज यह बात सच होती दिखाई पड़ रही है। साम्प्रदायिक ताकतों ने हिंदू संस्कृति के नाम पर देश में अराजक माहौल बनाना शुरू कर दिया है। नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद साम्प्रदायिक ताकतों को सरकार का संरक्षण मिल रहा है और यही कारण है कि सरकार में शामिल कई मंत्री खुल कर आपत्तिजनक बयान दे रहे हैंअभी साध्वी निरंजन ज्योति के ‘रामजादे और हरामजादे’ वाला विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भगवद् गीता को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग कर डाली।
अब इस पर विवाद शुरू हो गया है। भगवद् गीता की मान्यता एक हिंदू धर्मग्रंथ के रूप में है। इस दृष्टि से इसे राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने का कोई तुक नहीं। वैसे भी किसी ग्रंथ को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित किया जाना कहीं से भी समझदारी की बात नहीं लगती। लेकिन भाजपा लगातार ऐसे मुद्दों की तलाश में रहती है कि कैसे किसी बहाने हिंदू वोटरों को अपनी तरफ खींचा जाए। उनके पास जन समस्याओं से जुड़े मुद्दे हैं नहीं, इसलिए ऐसे मुद्दे उछालना उनकी मजबूरी ही है। भूलना नहीं होगा कि भाजपा पहली बार जब सत्ता में आई थी, तो साम्प्रदायिक मुद्दे के आधार पर ही। आडवाणी की रामरथ यात्रा और बाबरी मस्जिद विध्वंस को कौन भूल सकता है भला। इस यात्रा के माध्यम से साम्प्रदायिक उन्माद भड़का भाजपा पहली बार केंद्र की सत्ता में आ सकी। लेकिन तब भाजपा सरकार गठबंधन सरकार थी और इसलिए खुलकर साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ा पाना उसके लिए मुमकिन नहीं था। लेकिन अब केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जो अपने उग्र तेवर के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्द हो चुके हैं। गुजरात दंगों के दौरान इन्होंने जो नाम कमाया, उससे प्रभावित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इन्हें प्रधान सेवक बना दिया। इन्होंने अपने मंत्रिमंडल में शामिल लोगों को स्वतंत्र निर्णय लेने से रोक दिया है और उनकी हैसियत कठपुतला-कठपुतली वाली कर दी है। इसके साथ ही, ये अब राज्यों में भाजपा की सत्ता कायम करने के प्रयास में लगे हुए हैं। विकास के नाम पर राजनीति करने का दिखावा करने वाले मोदी जब तक साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं करते, चुनावों में सफलता नहीं मिल सकती। इस काम में भाजपा के दंगारोपी और तड़ीपार रह चुके अध्यक्ष अमित शाह लगे हैं और उन्हें सफलता भी मिल रही है। इसके अलावा, अपने मंत्रिमंडल में मोदी ने गिरिराज सिंह जैसे गुंडों और बलात्कारियों तक को शामिल कर रखा है। अब येन-केन-प्रकारेण राज्यों की सत्ता हासिल करना इनका लक्ष्य है।
इसके लिए ये किसी हद तक जा सकते हैं। चुनाव के पहले दंगा भड़काना, दंगाइयों को सम्मानित करना आदि ऐसे काम हैं, जो दिखाते हैं कि मोदी सरकार किस तरह साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति पर पुरजोर तरीके से चल रही है और चलती रहेगी, क्योंकि इसका विकल्प नहीं है और विरोधी दलों को समझ में नहीं आ रहा कि वे करें तो क्या।
दूसरी तरफ, मोदी सरकार शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे बदलाव करने जा रही है, ताकि नई पीढ़ी को कूपमंडूक बनाया जा सके और वैज्ञानिक तर्कबुद्धि आधारित चेतना कुंद की जा सके। इसके लिए सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं और इसका कहीं कोई विरोध नज़र नहीं आ रहा। साम्प्रदायिक ताकतें सबसे पहले इतिहास पर ही हमला करती हैं। वो इतिहास के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं, ताकि जनता को बरगलाया जा सके। रामजन्मभूमि का विवादित मुद्दा और बाबरी मस्जिद का विध्वंस इनके इतिहास को विकृत करने के प्रयास का ही नतीजा था। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शुरू से ही साम्प्रदायिक एजेंडे को देशभर में फैली अपनी शाखाओं के माध्यम से प्रचारित करता रहा, पर नेहरू और उनके बाद इंदिरा गांधी के शासन के दौर में उसे कोई खास सफलता नहीं मिली। इसकी वजह थी कि इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में वैज्ञानिक विचारों का जहां तक संभव हो सका, समावेश किया।
दूसरे, उस दौरान समाजवादी और कम्युनिस्ट भी ताकतवर थे। इस वजह से संघ दुबका रहा। लेकिन फिर भी वह तरह-तरह के संगठनों और देश भर में फैले सरस्वती शिशु शिक्षा मंदिरों के माध्यम से साम्प्रदायिकता के प्रसार की नीति पर चलता रहा और हिंदू राष्ट्र का झंडा बुलंद करता रहा। इमरजेंसी के दौरन इंदिरा गांघी ने तमाम संघियों को जेल में ठूंस दिया। इसके बाद जब जनता दल का गठन हुआ तो जनसंघ उसमें शामिल हो गया। यह जनता पार्टी में शामिल दलों की ढुलमुल नीतियों की वजह से हुआ, बावजूद संघ को सफलता नहीं मिली। राजनीति में जगह बना पाने में वह कामयाब नहीं हो सका। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर पर सवार होकर राजीव गांधी सत्ता में आए, पर साम्प्रदायिक सवाल पर उनकी नीतियां भी ढुलमुल थीं। बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण उन्हीं के समय में आया था, जिसे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के रूप में देखा गया। साथ ही, विवादित रामजन्मभूमि का ताला भी उनके समय में ही खोला गया, जिसने संघ परिवार को इस मुद्दे पर राजनीति करने का अच्छा-खासा मौका दे दिया।
खास बात ये है कि राजीव गांधी ने भी इंदिरा गांधी के बाद सिखों के खिलाफ़ भड़के दंगों पर कोई कठोर रुख नहीं अपनाया था और एक तरह से कांग्रेसी दंगाइयों का बचाव ही किया था। सिखों के खून से बड़े कांग्रेसी नेताओं के हाथ रंगे हुए थे। ऐसे में, उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह साम्प्रदायिकता के प्रश्न पर कोई संतुलित नीति अपनाएंगे। राजीव की सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार-घोटालों में डूब गई। उनके बाद वीपी सिंह के नेतृत्व में जो अल्पमत सरकार बनी, उसे वामपंथियों के साथ भाजपा ने भी समर्थन दिया। सिर्फ़ कांग्रेस विरोध के नाम पर ऐसा करना उचित नहीं था, क्योंकि इससे भाजपा की ताकत बढ़ी और इसके बाद ही उसने रामजन्मभूमि का मुद्दा जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया। रामरथ यात्रा शुरू की। परिणाम दंगे और आगे चल कर भाजपा की सरकार।
देखा जाए तो शुरू से ही कांग्रेस के पास साम्प्रदायिकता विरोध की कोई ठोस नीति नहीं थी। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की उसकी समझ भी स्पष्ट नहीं थी। अगर ऐसा होता, कांग्रेस नेतृत्व वास्तव में धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिकता विरोधी होता तो क्या देश का विभाजन हो पाता? उल्लेखनीय है कि 1857 के गदर के बाद से ही अंग्रेजों ने सुनियोजित तौर पर साम्प्रदायिक नीति की शुरुआत कर दी थी, आगे चल कर जिसके जाल में कांग्रेस लगातार उलझती चली गई। धार्मिक आधार पर 1905 में ही लार्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया था। साम्प्रदायिक आधार पर किए गए इस विभाजन का भारी विरोध हुआ और बंगभंग के विरोध में आंदोलन चला। इसके परिणास्वरूप दो साल बाद 1907 में अंग्रेजों को यह विभाजन वापस लेना पड़ा। लेकिन इसके बाद भी अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक राजनीति जारी रखी, जिसका विरोध कांग्रेसी नेतृत्व नहीं कर सका। साम्प्रदायिकता के समक्ष सबसे निर्लज्ज समर्पण कांग्रेस और वामपंथियों ने तब किया, जब उन्होंने माउंटबेटन प्लान को स्वीकार कर देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया। जाहिर है, कांग्रेस को जल्दी से जल्दी सत्ता पाने की लालसा थी। वामपंथियों का वैचारिक दिवालियापन तो इससे जाहिर होता है कि उन्होंने पाकिस्तान बनने की वकालत की थी। धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ दिया था। आखिर, इनसे ये कैसे उम्मीद की जा सकती थी कि ये भारतीय राजनीति से साम्प्रदायिक तत्वों को दूर रखने में सफल हो सकेंगे। हुआ यह कि बहुसंख्यक यानी हिंदू साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए इन्होंने अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और अल्पसंख्यकों का सुरक्षित वोटबैंक के रूप में इन्होंने इस्तेमाल किया। इसकी प्रतिक्रिया में हिंदू संप्रदायवाद और भी मजबूत होता रहा।
अब राष्ट्रीय राजनीति के पटल से कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के सफाये के बाद साम्प्रदायिक चुनौती बहुत ही प्रबल हो चुकी है। नरेंद्र मोदी ने एक राजनीतिक दल के तौर पर भाजपा का लगभग खात्मा ही कर दिया है, क्योंकि पार्टी में मोदी और अमित शाह के अलावा अन्य किसी नेता का कोई वज़ूद ही नहीं है। मोदी एकाधिकारवादी हैं। वह ‘मैं’ की बात करते हैं, ‘हम’ की नहीं। मंत्रिमंडल में छांट-छांट कर ऐसे लोगों को रखा है, जो कोई आवाज़ न उठा सकें। भाजपा के बड़े कद-काठी के नेता दरकिनार कर दिए गए। उन्हें ‘मार्गदर्शक मंडल’ में बिठाकर मौन रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है।
बहरहाल, चिंता का विषय यह है कि मोदी सरकार शिक्षा में पाठ्यक्रम में जो बदलाव करने जा रही है, वह पूरी की पूरी पीढ़ी को मानसिक रूप से पंगु बना सकती है। स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में गुजरात में पहले से ही संघ के इतिहासकार दीनानाथ बत्रा की अवैज्ञानिक किताबें पढ़ाई जा रही हैं। उन्ही किताबों को सभी राज्यों में थोपने की योजना है। दीनानाथ बत्रा जैसे इतिहासकारों की संघ में कमी नहीं है। इनका मानना है कि ताजमहल पहले हिंदू मंदिर था। ये मिसाइल टेक्नोलॉजी महाभारत से उत्पन्न मानते हैं। स्वयं प्रधानमंत्री की समझ कितनी वैज्ञानिक है, यह इससे ज़ाहिर हो गई कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि पुराणों में स्टेम सेल टेक्नोलॉजी थी। गणेश जी को सूंड लगाया जाना प्लास्टिक सर्जरी को दिखाता है। यह सब अत्यंत ही हास्यास्पद है, पर आश्चर्य की बात तो ये है कि इसका कहीं कोई विरोध दिखाई नहीं पड़ता। किसी भी वैज्ञानिक ने, किसी भी इतिहासकार ने सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री की इन अवैज्ञानिक बातों का विरोध नहीं किया। वहीं, इतिहास और समाज विज्ञान की राष्ट्रीय शोध संस्थाओं में चुन-चुन कर ऐसे लोग बैठाए जा रहे हैं, जो संघ की साम्प्रदायिक विचारधारा में यकीन रखते हैं और अंधविश्वासी हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् का अध्यक्ष वाइ. सुदर्शन राव को बना दिया गया है, जिनकी शोध के क्षेत्र में कोई खास उपलब्धि नहीं है और जो वर्णाश्रम व्यवस्था को उचित ठहराते हैं। ऐसे तथाकथित विद्वान किस तरह का शोधकार्य कराएंगे, ये आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे ही कूपमंडूकों को चुन-चुन कर लाया जा रहा है। ये जनता के धन पर ये पता लगाएंगे कि राम और कृष्ण का जन्म कब हुआ था, जबकि माना जाता है कि वो अवतारी पुरुष थे, वास्तविक नहीं। वो कथा के काल्पनिक पात्र हैं, पर इतिहास अनुसंधान परिषद् यह शोध कर पता लगवाएगा। रामसेतु की ऐतिहासिकता पर तो विवाद पहले से ही चल रहा है, अब पुष्पक विमान और शेषनाग की ऐतिहासिक सच्चाई का लगाया जाएगा। सवाल है, इन अवैज्ञानिक धारणाओं का विरोध विश्वविद्यालयों में बैठे वो मार्क्सवादी प्रोफेसर और बुद्धिजीवी क्यों नहीं कर रहे, जिन्होंने इतिहास और समाज विज्ञान के क्षेत्र में व्यापक शोध किए हैं। क्या उन्हें भी वर्तमान सत्ता से भय है? दूसरी तरफ, कतिपय टीवी चैनल तो राम के जीवन की विविध तिथियों की घोषणा भी करने लगे।
सिर्फ़ इतना ही नहीं, राजनीतिक प्रचार के दौरान अब भाजपा और संघ परिवार के लोग खुलेआम ज़हर उगलते हुए साम्प्रदायिक प्रचार कर रहे हैं। इस मामले में सबसे आगे है भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। पश्चिम बंगाल में उन्होंने ग़लत आरोप लगाते हुए यहां तक कहा दिया कि वर्दमान विस्फोटों के पीछे अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी लोगों का हाथ है और तृणमूल ने इसकी फंडिंग की है। इसका विरोध केंद्रीय मंत्री ने किया। जहां भी चुनाव होने होते हैं, भाजपा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की नीति पर चल पड़ती है। अब तक इसी नीति से इन्हें फायदा मिला है। इसलिए ये समझ चुके हैं कि ये नीति कारगर है। यही नहीं, जब लव जिहाद का मुद्दा इनका फेल हो गया तो अब इन्होंने निम्न तबके के मुसलमानों को लालच देकर धर्मपरिवर्तन कराना भी शुरू कर दिया है। अभी हाल में ही आगरा में ऐसी घटना सामने आई, जिसमें कई परिवारों का धर्मपरिवर्तन आरएसएस और बजरंग दल ने करवाया। संघ की नीति पूरी तरह से साम्प्रदायिकता को उभारने की है, क्योंकि उसे पता है कि इसी के सहारे सत्ता में आए और इसी ते सहारे सत्ता में बने भी रहेंगे। सवाल है, साम्प्रदायिकता की इस चुनौती का जवाब क्या है।

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