- गोरख पांडेय
भाइयो और बहनों!
अब यह आलीशान इमारत
बनकर तैयार हो गई
है
अब आप यहां से जा
सकते हैं।
अपनी भरपूर ताकत
लागकर,
आपने मिट्टी काटी,
गहरी नींव डाली,
मिट्टी के नीचे दब
भी गए
आपके कई साथी।
मगर आपने हिम्मत से
काम लिया,
पत्थर और इरादे से,
संकल्प और लोहे से,
बालू, कल्पना और
सीमेंट से
ईंट-दर-ईंट आपने,
अटूट बुलंदी की
दीवारें खड़ी की।
छत ऐसी कि वहां से
हाथ बढ़ाकर,
आसमान छुआ जा सके।
और खिड़कियां –
क्षितिज की थाह
लेने वाली आंखों
जैसी,
दरवाजे – शानदार स्वागत!
अपने घुटनों, बाजुओं
और
बरौनियों के बल पर
आपने
सैकड़ों साल टिकी
रहने वाली
यह जीती जागती
इमारत तैयार की।
अब आपने हरा-भरा
लॉन,
फूलों का बगीचा,
झरना और ताल भी बना
दिया है।
और कदम-कदम पर
रंग-बिरंगी रोशनी
फैला दी है।
गर्मी में ठंडक और
ठंड में
गुनगुनी गर्मी का
इंतजाम कर दिया है।
संगीत और नृत्य के
साज सामान
सही जगह पर रख दिए
हैं।
अलगनियां,
प्यालियां,
गिलास और बोतलें
सजा दी हैं।
कम शब्दों में कहें
तो
सुख-सुविधा और
आजादी का एक सुरक्षित इलाका
एक झिलमिलाता
स्वर्ग रच दिया है।
इस मेहनत और इस लगन
के लिए
आपको बहुत-बहुत
धन्यवाद,
अब आप यहां से जा
सकते हैं।
यह मत पूछिए कि
कहां जाएं,
जहां चाहें वहां
जाएं
फिलहाल, उस अंधेरे
में
कटी जमीन पर
जो झोंपड़े डाल रखे
हैं
उन्हें भी खाली कर
दें।
फिर जहां चाहें
वहां जाएं।
आप आजाद हैं
हमारी जिम्मेवारी
खत्म हुई
अब एक मिनट के लिए
भी
आपका यहां ठहरना
ठीक नहीं,
महामहिम आने वाले
हैं
विदेशी मेहमानों के
साथ।
आने वाली हैं
अप्सराएं,
और अफसरान।
पश्चिमी धुनों पर
शुरू होने वाला है
उन्मादक नृत्य।
जाम छलकने वाला है
भला आपकी यहां क्या
जरूरत हो सकती है?
और वे आपको यहां
देखकर क्या सोचेंगे?
गंदे कपड़े और धूल
में सने शरीर
ठीक से बोलने, हाथ
हिलाने का भी शऊर नहीं।
उनकी रुचि और
उम्मीद को
कितना धक्का लगेगा
और हमारी कितनी
तौहीन होगी।
मान लिया कि इमारत
को
यह शानदार बुलंदी
हासिल कराने में
आपने अपनी हड्डियां
तक गला दीं,
खून पसीना एक कर
दिया,
परंतु इसके एवज में
मजूरी दी जा चुकी
है
मुंह मीठा करा दिया
है
धन्यवाद भी दे चुके
हैं
अब आपको क्या चाहिए?
आप यहां से टल नहीं
रहे हैं
आपको चेहरे के भाव
भी बदल रहे हैं।
शायद अपनी इस विशाल
और खूबसूरत रचना से,
आपको मोह हो गया है
इसे छोड़कर जाने
में दुख हो रहा है।
ऐसा हो सकता है!
मगर इसका मतलब यह
तो नहीं
कि आप जो कुछ भी
अपने हाथों से बनाएंगे,
वह सब आपका हो
जाएगा।
इस तरह तो यह सारी
दुनिया आपकी होती,
फिर हम मालिक लोग
कहां जाते।
याद रखिए
मालिक, मालिक होता
है
मजदूर, मजदूर।
आपको काम करना है
हमें उसका फल भोगना
है
आपको स्वर्ग बनाना
है
हमें उसमें विहार
करना है।
अगर ऐसा सोचते हैं
कि आपको अपने काम
का
पूरा फल मिलना
चाहिए,
तो हो सकता है
कि पिछले जन्मों के
आपके काम,
आपको अभावों के नरक
में ले जा रहे हों।
विश्वास कीजिए
धर्म के सिवा कोई
रास्ता नहीं,
अब आप यहां से जा
सकते हैं।
क्या आप यहां से
जाना ही नहीं चाहते?
यहीं रहना चाहते
हैं
इस आलीशान इमारत
में,
इन गलीचों पर पांव
रखना चाहते हैं,
ओह! यह तो लालच की हद है,
सरासर अन्याय है।
कानून और व्यवस्था
पर सीधा हमला है।
दूसरों की मिल्कियत
पर कब्जा करने
और दुनिया को उलट
देने का
सबसे बुनियादी
अपराध है।
हम ऐसा हरगिज नहीं
होने देंगे
देखिए, यह भाईचारे
का मसला नहीं है।
इंसानियत का भी
नहीं,
यह तो लड़ाई का
जीने या मरने का
मसला है।
हालांकि हम
खून-खराबा नहीं चाहते
हम अमन-चैन,
सुख-सुविधा पसंद करते हैं।
लेकिन अगर आप मजबूर
करेंगे,
तो हमें कानून का
सहारा लेना पड़ेगा
पुलिस, और जरूरत
पड़ी तो
फौज को भी बुलाना
पड़ेगा।
हम कुचल देंगे,
अपने हाथों गढ़े,
इस स्वर्ग में रहने
की
आपकी इच्छा भी कुचल
देंगे,
वर्ना जाइए,
टूटते जोड़ों,
उजाड़ आंखों की,
आंधियों, अंधेरों
और सिसकियों की,
मृत्यु, गुलामी और
अभावों की अपनी
बे-दरो-दीवार
दुनिया में
चुपचाप, वापस चले
जाइए।

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