- मनोज कुमार झा
कहां है कोई जगह
तुमसे मिलने की
तुमसे मिलने की
कम होती जा
रही है
हर जगह
जहां किसी भी तरह
हो सके मिलना
रही है
हर जगह
जहां किसी भी तरह
हो सके मिलना
जैसे इस मौसम में ही
कोई खोट है
तो हमारा मिलना
बहुत ही मुश्किल है
कोई खोट है
तो हमारा मिलना
बहुत ही मुश्किल है
जैसे प्रकृति में
तुम्हारा बचपन है
कभी सुनाई पड़ जाता है
तुम्हारा बचपन है
कभी सुनाई पड़ जाता है
तो फ़िर कुछ
लालसाएं भी
उमड़ने लगती हैं
लालसाएं भी
उमड़ने लगती हैं
पर पल में
सब निरर्थक
लगता है
सब निरर्थक
लगता है
समय किसी
प्रलाप की तरह
निरंतर जारी रहता है
तो फ़िर
कहीं कोई
जगह नहीं
तुमसे मिलने की।
प्रलाप की तरह
निरंतर जारी रहता है
तो फ़िर
कहीं कोई
जगह नहीं
तुमसे मिलने की।
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