Friday, 21 August 2015

कहां है कोई जगह

- मनोज कुमार झा

कहां है कोई जगह
तुमसे मिलने की
कम होती जा
रही है
हर जगह
जहां किसी भी तरह
हो सके मिलना
जैसे इस मौसम में ही
कोई खोट है
तो हमारा मिलना
बहुत ही मुश्किल है
जैसे प्रकृति में
तुम्हारा बचपन है
कभी सुनाई पड़ जाता है
तो फ़िर कुछ
लालसाएं भी
उमड़ने लगती हैं
पर पल में
सब निरर्थक
लगता है
समय किसी
प्रलाप की तरह
निरंतर जारी रहता है
तो फ़िर
कहीं कोई
जगह नहीं
तुमसे मिलने की।


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