उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले मुलायम के कुनबे में जो
ड्रामेबाजी शुरू हुई है, उससे यह साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी का हाल क्या
होने वाला है। पहले भी कहा जा रहा था कि मुलायम के कुनबे में सत्ता की बंदरबांट को
लेकर अंदर ही अंदर घमासान चल रहा है, पर चुनाव के पहले यह सतह पर आ गया और देश भर
में चर्चा का विषय बन गया। दरअसल, समाजवादी पार्टी का मतलब एक तरह से मुलायम का
कुनबा ही रह गया है। गत लोकसभा चुनाव में सपा को उन्हीं सीटों पर जीत हासिल हुई,
जिन पर मुलायम परिवार के सदस्य खड़े हुए थे। अन्य किसी सीट पर जीत नहीं मिली।
सभी जानते हैं कि मुलायम ने सपा को परिवारवाद की बुनियाद पर खड़ा किया
है। सपा में जितने भी प्रमुख पद हैं, सब मुलायम के परिवार वालों के पास ही हैं। अब
परिवार में भी धड़े और गुट बन गए और अंतर्कलह शुरू हो गया। इसकी पृष्ठभूमि बहुत
पहले से बन रही थी। इसके पीछे मुख्य बात यह लगती है कि मुलायम और सपा के अन्य
कर्णधारों को यह समझ में आ गया है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का
सामना करना पड़ेगा, तो इसके लिए आखिर ठीकरा किस पर फोड़ा जाएगा। इसके साथ ही ढहते
हुए वोट बैंक के चलते मुलायम और उनके सलाहकारों में बौखलाहट की स्थिति पैदा हो गई
है। वे चाह रहे हैं कि किसी तरह कुछ ऐसे उपाय किए जाएं जिससे उनका वोट बैंक पूरी
तरह तो न ढहे। इसलिए मुलायम ने पार्टी और सरकार में कुछ बदलाव करना चाहा।
भूलना नहीं होगा कि मुलायम समय-समय पर मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की
भूमिका की आलोचना भी करते रहे हैं। अखिलेश की स्थिति ये है कि वे स्वतंत्र रूप से
कुछ भी कर पाने में कभी समर्थ नहीं रहे। उन पर हमेशा मुलायम और अपने चाचा शिवपाल
यादव का दबाव बना रहा। इस बीच, कुछ ऐसी बातें हुईं जिनका अखिलेश ने विरोध किया,
जैसे मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का, जिसका शिवपाल
समर्थन करते थे और मुलायम भी चाहते थे कि इस माफिया की मदद चुनाव जीतने में ली
जाए। पर अखिलेश के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका। इस बीच, अखिलेश ने कुछ
भ्रष्ट मंत्रियों को भी हटाया जो शिवपाल के गुट के थे। इससे सपा में खलबली मची और
अखिलेश का विरोध शिवपाल ने किया। रस्साकशी चलने लगी। मुलायम ने अखिलेश के पर संगठन
में कतर दिए तो बदले में अखिलेश ने शिवपाल से कई विभाग छीन लिए। इसके बाद सत्ता
संघर्ष तेज हो गया। अखिलेश के खिलाफ साजिश में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना,
उसका बेटा प्रतीक यादव भी शामिल बताए जाते हैं। कहा जा रहा है कि साधना चाहती है
कि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार प्रतीक को घोषित किया जाए। मुलायम के बारे में
बताया जाता है कि वे पूरी तरह से अपनी पत्नी, अमर सिंह और अपने भाई शिवपाल यादव के
पक्ष में हैं। यही कारण है कि उन्होंने अखिलेश के विरुद्ध सार्वजनिक तौर पर कई
बातें कही। बहरहाल, ऐसी खबरें मीडिया में चलीं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना ने
अपने बेटे के लिए राजगद्दी और सौतेले बेटे अखिलेश के लिए वनवास मांगा है। लेकिन
साधना के बेटे प्रतीक की कोई राजनीतिक पहचान है ही नहीं। हालत तो ये है कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा
की जीत की कोई संभवाना ही नज़र नहीं आती। ऐसे में, मुलायम के कुनबे में कलह के
सामने आने से सपा का और भी नुकसान होगा, इसमें दो राय नहीं है। गायत्री प्रजापति
जैसे भ्रष्ट मंत्री को जिसे अखिलेश ने हटा दिया था, शिवपाल के दबाव पर मुलायम ने
फिर से मंत्री बनवाया। इससे बहुत गलत संदेश गया है। लोग ये समझ रहे हैं कि मुलायम
पूरी तरह सत्ता के दलाल अमर सिंह के प्रभाव में हैं, जो काफी समय के बाद सपा में
लौटा है। वह शुरू से ही अखिलेश का विरोधी रहा है, क्योंकि अखिलेश उसके हिसाब से
नहीं चलते।
सपा में दो ध्रुव बन गए हैं। एक में मुलायम, शिवपाल और अमर सिंह हैं,
दूसरे में रामगोपाल यादव और अखिलेश हैं। दोनों जोर-आजमाइश कर रहे हैं। यह कुनबे
में सत्ता हासिल करने की लड़ाई है, जो एक तरह से व्यर्थ है, क्योंकि विधानसभा
चुनाव परिणाम जब सामने आएगा तो यह कुनबा राजनीतिक शक्ति से शून्य हो जाएगा। यह अलग
बात है कि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण इनके पास बेशुमार दौलत है, भरपूर
काला धन है जिसे लेकर मुलायम को कभी भी जेल जाना पड़ सकता है। जेल जाने से बचने के
लिए ही ये यूपीए सरकार के दौरान ये सोनिया के तलवे चाटते रहे और अभी भी मोदी-अमित
शाह से मधुर संबंध बना के रखते हैं। ये जब भी मुख्यमंत्री रहे, इन्होंने खुल कर
गुंडों और माफिया तत्वों को प्रश्रय दिया, अभी भी दे रहे हैं। इसका अखिलेश विरोध
करते हैं तो उन पर दबाव डालते हैं। अखिलेश जानते हैं कि चुनाव में जीत हासिल करने
के लिए जनता को भरोसे में लेना होगा और अपराधियों पर लगाम कसने से जनता का भरोसा
उन पर बढ़ेगा। पर यह बात शिवपाल को बुरी लगती है। सारी आमदनी का जरिया तो माफिया
ही है। सत्ता में उसे भागीदारी नहीं देंगे तो काम कैसे चलेगा। भूलना नहीं होगा कि
यूपी की सत्ता पर लंबे समय से माफिया का नियंत्रण रहता आया है। चाहे सरकार बसपा की
रही हो, भाजपा की या सपा की। बसपा-भाजपा गठबंधन सरकार में सत्ता पर पूरी तरह
माफिया हावी था और यह साझे में लूट के लिए बना था, पर बाद में मायावती ने भाजपा को
अंगूठा दिखा दिया था। जब बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो उसे गुंडा राज कहा
जाने लगा। लेकिन मुलायम की छत्रछाया में बनी अखिलेश सरकार को महागुंडा राज कहा
गया। यानी सत्ता में कोई भी दल आए, असली बात यही है कि माफिया ही राज करेगा। अब
किसका माफिया करेगा, किसका हित साधेगा, लड़ाई इस बात को लेकर है। फिर भी मुलायम के
कुनबे में जो संघर्ष चला है और जैसी छीछालेदर हुई है, उससे यह बहुत साफ हो गया है
कि जब एक पर्टी के स्वामित्व वाले दल में इतनी गुटबाजी है, तो अन्य दलों की स्थिति
क्या होगी जिनका अस्तित्व ही गुटों पर आधारित है। कांग्रेस भी एक परिवार की पार्टी
है, पर वहाँ सत्ता की दावेदारी के लिए सड़कों पर ऐसा संघर्ष हो, इसकी कल्पना नहीं
की जा सकती। इसकी वजह सिर्फ यही है कि परिवार में सत्ता का कोई दूसरा दावेदार ही
नहीं है एक को छोड़ कर।
बहरहाल, मुलायम के कुनबे में हुए
वर्चस्व के इस संघर्ष ने साबित कर दिया है कि ये क्षेत्रीय दल किस हद तक पतन के
गर्त में जा चुके हैं। इन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि इनके पाँवों तले ज़मीन
खिसकती जा रही है, पर सत्ता के नशे में बदमस्त हो कर ये सुध-बुध खो बैठे हैं।
मुलायम ने अपने जन्मोत्सवों और सैफई महोत्सवों से जो नाम कमाया है, वह उन्हें
डुबोने के लिए काफी है। धनलिप्सा और तरह-तरह के कुटैब से घिरा ये शख्स अमर सिंह के
चंगुल में इसीलिए फंसता है, क्योंकि वह इसे ब्लैकमेल करता है। वह परले दर्जे का
दलाल है और उसकी सांठगांठ कई दलों के नेताओं से है। उसने मुलायम की कमजोर नस पकड़
रखी है और उसका फायदा उठा रहा है। ऐसे में, सपा का भविष्य क्या होने जा रहा है, यह
समझा जा सकता है। यूपी के मतदाताओं का भरोसा सपा पर नहीं रहा, लेकिन कहा जा रहा है
कि मतदाताओं के एक वर्ग में अखिलेश के प्रति सहानुभूति का भाव भी उमड़ रहा है। अब
इसका कितना फायदा अखिलेश को मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। वैसे तमाम उटापठक के बाद
मुलायम इस बात पर राजी हो गए हैं कि संगठन में प्रमुख शिवपाल रहेंगे और
मुख्यमंत्री पद का चेहरा अखिलेश बनेंगे। लेकिन दोनों में विश्वास की कमी इतनी
ज्यादा हो गई है कि कब फिर कैसा विवाद और झगड़ा सामने आ जाएगा, कहा नहीं जा सकता।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मुलायम के कुनबे में हुई इस कलह का फायदा
भाजपा को मिलेगा तो कुछ कहते हैं कि इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। यहाँ यह देखना
जरूरी है कि अगर यह सपा में यह ड्रामेबाजी नहीं होती तो क्या उसे फायदा मिलने जा
रहा था। क्या वह यूपी में सरकार बनाने की दावेदार पार्टी के रूप में थी? कहा जा सकता है कि
ऐसा कभी नहीं था। यूपी की जनता मुलायम-अखिलेश के शासन से परेशान हो चुकी है,
गुंडों, माफिया और बलात्कारियों का आतंक चरम पर है। मुलायम-अखिलेश जनता को लॉलीपॉप
दिखाते हैं। करोड़ों की लगात से अपने लिए पांच सितारा ऑफिस बना कर उसे अपने शासन
की उपलब्धि बताते हैं। जनता के पास विकल्प की कमी है, पर इसका मतलब ये नहीं कि वह
बेवकूफ है। तमाम दल के नेता जनता को यानी वोटरों को बेवकूफ मान कर ही चलते हैं। यूपी
के वोटरों का मुलायम-अखिलेश सरकार से इस कदर मोहभंग हो गया है कि मुलायम कुनबे में
वर्चस्व का यह विवाद सामने नहीं भी आता तो भी उसे जाना ही था। अगले विधानसभा चुनाव
में सपा का सूपड़ा साफ होना है। जीत किसे मिलती है, यह अलग बात है। भाजपा किसी
खुशफहमी में न रहे, क्योंकि मोदी जी के भाषणों और अमित शाह की कुटिल चालों से जनता
परेशान हो गई है। कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाएं तो मिल जाएं, पर वह सरकार
बनाएगी, इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस की खटिया लूटी जा चुकी है यूपी
में। अब यह पार्टी पूरी तरह बेदम हो चुकी है। सवाल है, फिर सरकार किसकी बनेगी। बार-बार
धोखा खाने वाली जनता ही इसका जवाब समय पर दे देगी। उसके पास विकल्प है नहीं।
विकल्पहीनता की स्थिति में आत्मघात की स्थितियाँ ही बनती हैं।
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