Friday, 1 May 2020

कामसूत्र और अनंगरंग : प्रेम और संभोग कला का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ


कामसूत्र और अनंगरंग : प्रेम और संभोग कला का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ

               - मनोज कुमार झा

"कामसुख मानव शरीर के लिए आहार के समान है।" - वात्स्यायन, कामसूत्र

1. भारतीय चिंतन परंपरा में 'काम' (sex) को दुर्गुण या दुर्भाव न मान कर चतुर्वग - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। 'काम' के बिना जीवन को अपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसके बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता जो ध्येय है।
'धर्मो विरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरकर्षर्भ' (श्रीमद्भवद्गीता-7/11

2. 'कामसूत्र' के रचनाकार वात्स्यायन को महर्षि का दर्जा दिया गया है, जबकि वे गणिका-पुत्र थे। प्रसिद्घ मनोविज्ञानवेत्ता और लेखक डॉ. सुधीर कक्कड़ ने उन पर एक बॉयोग्राफिकल नॉवेल लिखा है, जिसका हिंदी अनुवाद 'कामयोगी' के नाम से राजकमल प्रकाशन से आया है। इस उपन्यास में उनके जीवन, विज़न, उनके सांसारिक और आध्यात्मिक प्रेम का ग्राफिक चित्रण किया गया है। यह एकमात्र ऐसी कथाकृति है, जिसमें इस महान दार्शनिक के जीवन और विचारों की झलक मिलती है।
उल्लेखनीय है कि वात्स्यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर 'कामसूत्र' ग्रंथ की रचना की। उनका उद्देश्य किसी भी रूप में वासना को उत्तेजित करना नहीं था, ऐसा उनके बाद के कई टीकाकारों का मानना है।

3. महर्षि वात्स्यायन का जीवन काल स्पष्ट रूप में निर्धारित नहीं है, पर भारतीय और विदेशी शोधकर्ताओं ने उनका जीवन काल ईसा की पहली शताब्दी से पांचवीं शताब्दी तक माना है। अगर यह सच है तो वात्स्यायन उस दौर में पैदा हुए थे जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल माना गया है। दर्शन, कला, साहित्य, शिल्प, विज्ञान, सौंदर्य शास्त्र आदि क्षेत्रों में उस ज़माने में श्रेष्ठ कृतियां सामने आईं।

4. वात्स्यायन के पूर्व कामशास्त्र पर कई विद्वानों ने ग्रंथों की रचना की। इनमें बाभ्रव, नंदी, औद्दालिक श्वेत केतु, गोणिकापुत्र एवं कुचुमार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वात्स्यायन ने इन सभी विद्वानों का उल्लेख किया है और यह स्वीकार किया है कि उन्होंने 'बाभ्रवीय' सिद्धांतों के अनुसार कामसूत्र ग्रंथ का प्रणयन किया।

5. 'कामसूत्र' पर सबसे महत्त्वपूर्ण टीका यशोधर रचित 'जयमंगला' है। कामशास्त्र पर संस्कृत में कई ग्रंथ हैं - 'अनंगरंग', 'कंदर्प चूड़ामणि', 'कुट्टिनीमत', 'नागर सर्वस्व', 'पंचसायक', 'रतिकेलि कुतूहल', 'रति मंजरी', 'रति रहस्य', 'रतिरत्न प्रदीपिका', 'स्मरदीपिका', 'श्रृंगारमंजरी' आदि। वात्स्यायन का कामसूत्र सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है।

6. 'कामसूत्र' में वात्स्यायन ने यौन जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तृत और गहरी विवेचना की है। इस ग्रंथ का अधिकांश भाग मनोविज्ञान से संबंधित है। इस ग्रंथ के एक हिंदी अनुवादक डॉ. गंगासहाय शर्मा ने लिखा है, "यह जान कर अत्यंत आश्चर्य होता है कि आज से दो हज़ार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्म ज्ञान था।"
'कामसूत्र' में 36 अध्याय, 64 विषय और सात भाग हैं। श्लोकों की संख्या एक हज़ार दो सौ पचास है। इसे संक्षिप्त बताया गया है। समझा जा सकता है कि इसका विस्तार कितना होगा।

7. 'कामसूत्र' में नायक-नायिका भेद, चौंसठ कलाओं का वर्णन, पुरुष-स्त्री का संभोग, विवाह के लिए कन्या का चयन, पत्नी से व्यवहार, दूसरों की पत्नियों से संबंध, वेश्याओं से संबंध और रहस्य (काम संबंधी) का विस्तृत वर्णन मिलता है। ग्रंथ में वर्णित विविध आसन (sex positions) महत्त्वपूर्ण और रोचक हैं, विशेषकर स्त्री द्वारा पुरुष का अभिनय यानी विपरीत रति (women on top)। यूरोप में जब मिशनरी पोजिशन ही मान्य था, तब यहां इतने विविध आसनों का प्रयोग यह साबित करता है कि भारतीय अभिजन कितना आगे कितना आगे पहुंच चुके थे। वात्स्यायन ने पूर्वराग (fore play)  का विस्तृत वर्णन किया है और आलिंगन, चुंबन, संवाहन (मालिश), नखच्छेद, दंतच्छेद, प्रहार, सीत्कार, मुखमैथुन के बारे में विस्तार से लिखा है। आलिंगन-चुंबन के अनेकों सूक्ष्म भेद बताए हैं। कुच-मर्दन, स्तन-पान आदि के विस्तृत विधान मिलते हैं। नखक्षत के बारे में लिखा है कि दूसरों की पत्नियों के शरीर पर नखक्षत नहीं करने जाहिए, क्योंकि इससे गुप्त प्रेम खुल सकता है। इसलिए उनके छिपे हुए स्थानों - जंघा, पेड़ू, नितंब, योनि आदि पर ही अपनी यादगार के रूप में नखक्षत बनाने चाहिए। स्पष्ट है कि दूसरों की पत्नियों के साथ भी गोपनीय प्रणय संबंधों का प्रचलन था। यह सब पूरी तरह अभिजात वर्ग के बीच ही था। आम जन की स्त्रियां सामंती प्रभुओं की भोग्या होती थीं। सामंत अथवा सामंत-पुत्रों द्वारा वासना-तृप्ति के लिए चुन ली गईं कमेरे वर्ग की स्त्रियां इसे अपना अहोभाग्य मानती थीं, क्योंकि इसके बदले उन्हें उपहारादि मिलते थे और कभी-कभी कठिन मेहनत से थोड़ी राहत भी।

8. ग्रंथ में देश के अलग-अलग प्रांतों की नारियों के प्रेम के विशेष ढंग का वर्णन मिलता है।
मध्य देश अर्थात् हिमालय और विंध्य पर्वत के बीच के भाग की नारियों के बारे में लिखा है कि वे संभोग में पवित्र आचार वाली होती हैं। 
सिंध और पंजाब प्रांत की नारियों के अधिक वासनामयी बताया गया है। ग्रंथ में उल्लेख है कि वे मुख मैथुन करना पसंद करती हैं।
मालवा की नारियों को भी अधिक वासना वाली बताया गया है।
आंध्र प्रांत की नारियों को स्वभाव से कोमल, पर संभोग में अपवित्र रुचियों वाली एवं आचारहीन कहा गया है। उल्लेख है कि वे मुख मैथुन, गुदा मैथुन एवं अन्य अप्राकृतिक कृत्यों को ज्यादा पसंद करती हैं।
बंगाल एवं कोशल प्रांत की नारियों को संभोग में कृत्रिम साधनों की इच्छुक बताया गया है।
महाराष्ट्र प्रांत की नारियों के बारे में उल्लेख है कि वे चौंसठ प्रयोगों को चाहती हैं। साथ ही, संभोग के दौरान अश्लील बातें बोलना और सुनना पसंद करती हैं।
पाटलिपुत्र की नारियों को महाराष्ट्र की स्त्रियों के समान ही बताया गया है, पर कहा गया है कि वे एकांत में संभोग करना पसंद करती हैं।
इसी प्रकार, अन्य क्षेत्रों की नारियों की पसंद-नापंसद का विवरण मिलता है।

9. ग्रुप सेक्स और एक स्त्री के साथ एक ही समय दो पुरुषों द्वारा योनि मैथुन एवं गुदा मैथुन का भी उल्लेख मिलता है। वात्स्यायन का कहना है कि ऐसा सिर्फ वेश्याओं और दासियों के साथ ही किया जाना चाहिए। 
10. यदि एक पुरुष को लगातार कई नारियों के साथ संभोग करना हो तो वात्स्यायन कृत्रिम लिंग के प्रयोग और उसके विविध प्रकार, इस्तेमाल के तरीके आदि का उल्लेख करते हैं। 

11. वेश्याओं पर एक अलग ही अध्याय है, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि किस तरह ग्राहक को संतुष्ट करना चाहिए और कैसे अधिक से अधिक रकम ऐंठने की कोशिश करनी चाहिए। वात्स्यायन कहते हैं कि वेश्या बाजार में बिक्री के लिए रखे हुए सौदे के समान है।

12. वात्स्यायन विस्तार से बताते हैं कि राजाओं के अंत:पुरों में रहने वाली रानियों के किस तरह गोपनीय तरीके से अपने प्रेमियों को बुलाना चाहिए अथवा कृत्रिम साधनों से अपनी काम वासना शांत करनी चाहिए।

13. पर नारियों के हासिल करने के कई तरीके बताए गए हैं, पर यह भी कहा गया है पर नारियों विशेषत: विवाहिता स्त्रियों से संभोग की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरुष चाहे जितने भी अधिकार संपन्न एवं वैभवशाली हों, पथभ्रष्ट हो विनाश के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

वात्स्यायन ने कहा है कि दूसरों की पत्नियों साथ संभोग करना धर्म विरुद्ध आचरण है। उन बालिकाओं के साथ संभोग करना कुलीन पुरुषों का अभीष्ट होता है जिनका कौमार्य अभी भंग नहीं हुआ हो। अपने प्रभाव से ऐसे पुरुष अक्षत योनि बालिकाओं को प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।

14. वात्स्यायन ने लिखा है कि मित्र, अनुज एवं निकट संबंधियों की पत्नियों से संभोग की इच्छा नहीं करनी चाहिए। पत्नी की छोटी बहनों से पुरुष प्राय: संभोग करने की चेष्टा करते हैं और इसमें सफल भी होते हैं, पर पत्नी की बड़ी बहनों पर कामुक दृष्टि रखना धर्मविरुद्ध माना गया है।

15. कामसूत्र में कौटंबिक व्यभिचार (incest) का भी उल्लेख है। लिखा गया है कि विदर्भ प्रांत के राजपरिवार की नारियां अपने सौतेले पुत्रों से संभोग करती हैं। स्त्रीपुरी नामक राज्य की स्त्रियों के बारे में उल्लेख है कि वे पीहर यानी मायके के लोगों से शारीरिक संबंध रखती हैं। ग्रंथ में पत्नियों की रक्षा के उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है।

16. ग्रंथ के सातवें भाग में सौंदर्य बढ़ाने, वशीकरण, मैथुन शक्ति बढ़ाने वाले नुस्खे, नष्ट काम शक्ति को पुन: प्राप्त के उपाय एवं तरह-तरह के कृत्रिम लिंग और उन्हें बनाने के तरीके बताए गए हैं। लिंग बड़ा करने के विचित्र उपायों और अनोखी औषधियों का वर्णन भी मिलता है।

17. महर्षि वात्स्यायन के कुछ विशिष्ट कथन -
'वासना पर किसी का अधिकार नहीं होता।'
'रति संभोग आरंभ होने पर राग ही सब क्रियाओं के आरंभ का कारण होता है।'
'नारियां फूल के समान कोमल होती हैं।'
'यंत्रयोग अर्थात शिश्न और योनि का संयोग।'
'जो पुरुष अत्यंत लज्जावती जान कर कन्या की उपेक्षा करता है, वह कन्या की इच्छा नहीं समझ सकता। कन्याएं ऐसे लोगों को पशु समझ कर उनका तिरस्कार करती हैं।'
'संसार में अर्थ की ही प्रधानता है।'

18. इस अद्भुत ग्रंथ का अनुवाद पहले फारसी और फिर अरबी में हुआ। सन् 1845-46 में सर रिचर्ड बर्टन ने मूल संस्कृत से अनुवाद किया जो आज भी सबसे प्रामाणिक माना जाता है। भारतीय विद्वान एस.सी.उपाध्याय ने भी कामसूत्र का अंग्रेजी में अनुवाद किया जो तारापुरवाला संस एंड कंपनी, बंबई से छपा। अब तो दुनिया की कई भाषाओं में यह ग्रंथ उपलब्ध है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हिंदी में इस ग्रंथ का संपूर्ण प्रामाणिक अनुवाद उपलब्ध नहीं है, न ही इस पर विशेष शोध कार्य हुए। इस ग्रंथ के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम ही होगा।

अनंगरंग

1.15वीं या 16वीं सदी में कल्याण मल्ल नाम के कवि ने वात्स्यायन के कामसूत्र के आधार पर 'अनंगरंग' नामक ग्रंथ की रचना की। कहा जाता है कि इस सेक्स मैनुअल की रचना कल्याण मल्ल ने लोदी वंश (1451-1526 ई.) के शासक अहमद खान के शादजादे लाड खान के लिए खास तौर पर लिखी थी। ये शासक बहुत ही सौंदर्यप्रेमी थे और इन्हें पता था कि संभोग कला के क्षेत्र में भारत का विशेष योगदान है। 'अनंगरंग' को संबंध में बाद के टिप्पणीकारों ने कहा कि इस ग्रंथ की रचना का उद्देश्य है कि पति-पत्नी में अलगाव न हो और दांपत्य जीवन सुखमय हो। 

2. इस ग्रंथ का अंग्रेजी में अनुवाद सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने सन् 1885 में किया था। उन्होंने इसका संपादन भी किया था। उल्लेखनीय है कि वात्स्यायन कृत 'कामसूत्र' का पहला और अब तक का सबसे प्रामाणिक अनुवाद भी सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने ही किया था।

3. इस ग्रंथ में इस बात पर जोर डाला गया है कि पुरुष सिर्फ एक स्त्री से ही पूर्ण यौन संतुष्टि पा सकता है, अगर उसे कामकला का पूरा ज्ञान हो। कई लोग, विशेषकर सामंत अनेक शादियां करते हैं और उऩकी रखैलें भी होती हैं, पर उनके यौन-जीवन में अक्सर आनंद की कमी होती है। 'अनंगरंग' में लिखा गया है कि कामकला का ज्ञान रखने वाला पुरुष एक पत्नी से इतना ज्यादा आनंद हासिल कर सकता है, जितना 32 औरतों के साथ भी संभोगरत होकर नहीं। 

4. इस तरह यह ग्रंथ यौन शुचिता और नैतिकता की अवधारणा पर आधारित है। इसका उद्देश्य है कि व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ही काम सुख प्राप्त करे, न कि पराई औरतों के पीछे भागता रहे। लोदी सुल्तान विलासी प्रवृत्ति के थे, जैसे कि तमाम राजे-महाराजे हुआ करते थे। उनके हरम में सैकड़ों औरतें होती थीं। कहा जाता है, उन्हें नैतिकता की शिक्षा देने के लिए ही कल्याण मल्ल ने 'अनंगरंग' की रचना की।

5. 'अनंगरंग' में विविध संभोग आसनों, फोर प्ले यानी पूर्वराग के अलावा स्त्री को लुभाने के तरीके बताए गए हैं। इस ग्रंथ में 9 अध्याय हैं। इनमें अलग-अलग तरह की स्त्रियों, स्त्रियों में यौन उत्तेजना के विशेष स्थल, अलग-अलग प्रकार के पुरुष और स्त्री एवं उनका मिलन, अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाओं के चरित्र की खास बातें, वशीकरण और संभोग के आनंद के विविध रूपों पर प्रकाश डाला गया है। 

6. यह ग्रंथ पूरी तरह से 'कामसूत्र' पर आधारित है, इसलिए इसमें ज्यादातर उन्हीं संभोग आसनों और चुंबन विधियों का वर्णन है, जो उस ग्रंथ में पहले ही किया जा चुका है। यह अलग बात है कि कल्याण मल्ल ने इस ग्रंथ में संभोग विधि को सरल रूप में समझाया है। साथ ही, कुछ नए आसनों का भी उल्लेख किया है। अलग-अलग क्षेत्रों की स्त्रियों की सेक्स अभिरुचि के बारे में 'कामसूत्र' में जो लिखा गया है, वही उल्लेख इस ग्रंथ में भी मिलता है। इस ग्रंथ में तंत्र सेक्स का भी विवरण मिलता है, जो आम लोगों की समझ से परे की बात है।

7. इस ग्रंथ के लेखक इस बात के प्रति विशेष रूप से चिंतित नज़र आते हैं कि पुरुष पर-नारियों से संबंध बनाने को क्यों उत्सुक रहते हैं और स्त्रियां भी भी अनजान मर्दों से सेक्स संबंध बना लेती हैं। इसका मुख्य कारण ग्रंथ लेखक ने सेक्स जीवन में नीरसता को माना है। कल्याण मल का कहना है कि अगर पुरुष और नारी संभोग कला में पारंगत हों और नये प्रयोग करने को तैयार रहते हों, तो उन्हें सेक्स-संतुष्टि के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा और व्यभिचार कम होंगे।

8. इस ग्रंथ से लोदी वंश के शासक बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने कल्याण मल को पुरस्कृत भी किया, पर कवि ने एकनिष्ठा पर जो जोर दिया, उससे वो सहमत नहीं थे। हो भी नहीं सकते थे, क्योंकि जमाना चाहे कोई भी हो, शासक वर्ग भोग-विलास में ही डूबा रहा है। वह यौन शुचिता की धारणा में यकीन नहीं कर सकता।

9. भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि यहां शुरुआत में सेक्स को कभी भी वर्जित विषय नहीं माना गया, लेकिन इस विषय पर वात्स्यायन से पूर्व और बाद के भी तमाम लेखकों-विचारकों ने यौन शुचिता और नैतिकता पर काफी जोर दिया है। उन्होंने काम को धर्म मानते हुए भोग-विलास एवं कई स्त्रियों से संबंध को त्याज्य एवं हेय माना है।

10.  कल्याण मल 'अनंगरंग' के अंत में कहते हैं - अनंगरंग स्त्री और पुरुषों के लिए तब तक प्रिय हो, जब तक पवित्र गंगा शिव की जटाओं से बहती हो, जब तक अनके वाम गौरी विराजती हों, जब तक लक्ष्मी विष्णु से प्रेम करती हों, जब तक ब्रह्मा वेदों के अध्ययन में रत हों और जब तक धरती, चंद्रमा और सूर्य अस्त्तिवमान हों।

                               Manoj Kumar Jha

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