Friday, 1 May 2020

कामसूत्र और अनंगरंग : प्रेम और संभोग कला का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ


कामसूत्र और अनंगरंग : प्रेम और संभोग कला का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ

               - मनोज कुमार झा

"कामसुख मानव शरीर के लिए आहार के समान है।" - वात्स्यायन, कामसूत्र

1. भारतीय चिंतन परंपरा में 'काम' (sex) को दुर्गुण या दुर्भाव न मान कर चतुर्वग - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। 'काम' के बिना जीवन को अपूर्ण माना गया है, क्योंकि इसके बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता जो ध्येय है।
'धर्मो विरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरकर्षर्भ' (श्रीमद्भवद्गीता-7/11

2. 'कामसूत्र' के रचनाकार वात्स्यायन को महर्षि का दर्जा दिया गया है, जबकि वे गणिका-पुत्र थे। प्रसिद्घ मनोविज्ञानवेत्ता और लेखक डॉ. सुधीर कक्कड़ ने उन पर एक बॉयोग्राफिकल नॉवेल लिखा है, जिसका हिंदी अनुवाद 'कामयोगी' के नाम से राजकमल प्रकाशन से आया है। इस उपन्यास में उनके जीवन, विज़न, उनके सांसारिक और आध्यात्मिक प्रेम का ग्राफिक चित्रण किया गया है। यह एकमात्र ऐसी कथाकृति है, जिसमें इस महान दार्शनिक के जीवन और विचारों की झलक मिलती है।
उल्लेखनीय है कि वात्स्यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर 'कामसूत्र' ग्रंथ की रचना की। उनका उद्देश्य किसी भी रूप में वासना को उत्तेजित करना नहीं था, ऐसा उनके बाद के कई टीकाकारों का मानना है।

3. महर्षि वात्स्यायन का जीवन काल स्पष्ट रूप में निर्धारित नहीं है, पर भारतीय और विदेशी शोधकर्ताओं ने उनका जीवन काल ईसा की पहली शताब्दी से पांचवीं शताब्दी तक माना है। अगर यह सच है तो वात्स्यायन उस दौर में पैदा हुए थे जिसे भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल माना गया है। दर्शन, कला, साहित्य, शिल्प, विज्ञान, सौंदर्य शास्त्र आदि क्षेत्रों में उस ज़माने में श्रेष्ठ कृतियां सामने आईं।

4. वात्स्यायन के पूर्व कामशास्त्र पर कई विद्वानों ने ग्रंथों की रचना की। इनमें बाभ्रव, नंदी, औद्दालिक श्वेत केतु, गोणिकापुत्र एवं कुचुमार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वात्स्यायन ने इन सभी विद्वानों का उल्लेख किया है और यह स्वीकार किया है कि उन्होंने 'बाभ्रवीय' सिद्धांतों के अनुसार कामसूत्र ग्रंथ का प्रणयन किया।

5. 'कामसूत्र' पर सबसे महत्त्वपूर्ण टीका यशोधर रचित 'जयमंगला' है। कामशास्त्र पर संस्कृत में कई ग्रंथ हैं - 'अनंगरंग', 'कंदर्प चूड़ामणि', 'कुट्टिनीमत', 'नागर सर्वस्व', 'पंचसायक', 'रतिकेलि कुतूहल', 'रति मंजरी', 'रति रहस्य', 'रतिरत्न प्रदीपिका', 'स्मरदीपिका', 'श्रृंगारमंजरी' आदि। वात्स्यायन का कामसूत्र सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है।

6. 'कामसूत्र' में वात्स्यायन ने यौन जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं पर विस्तृत और गहरी विवेचना की है। इस ग्रंथ का अधिकांश भाग मनोविज्ञान से संबंधित है। इस ग्रंथ के एक हिंदी अनुवादक डॉ. गंगासहाय शर्मा ने लिखा है, "यह जान कर अत्यंत आश्चर्य होता है कि आज से दो हज़ार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्म ज्ञान था।"
'कामसूत्र' में 36 अध्याय, 64 विषय और सात भाग हैं। श्लोकों की संख्या एक हज़ार दो सौ पचास है। इसे संक्षिप्त बताया गया है। समझा जा सकता है कि इसका विस्तार कितना होगा।

7. 'कामसूत्र' में नायक-नायिका भेद, चौंसठ कलाओं का वर्णन, पुरुष-स्त्री का संभोग, विवाह के लिए कन्या का चयन, पत्नी से व्यवहार, दूसरों की पत्नियों से संबंध, वेश्याओं से संबंध और रहस्य (काम संबंधी) का विस्तृत वर्णन मिलता है। ग्रंथ में वर्णित विविध आसन (sex positions) महत्त्वपूर्ण और रोचक हैं, विशेषकर स्त्री द्वारा पुरुष का अभिनय यानी विपरीत रति (women on top)। यूरोप में जब मिशनरी पोजिशन ही मान्य था, तब यहां इतने विविध आसनों का प्रयोग यह साबित करता है कि भारतीय अभिजन कितना आगे कितना आगे पहुंच चुके थे। वात्स्यायन ने पूर्वराग (fore play)  का विस्तृत वर्णन किया है और आलिंगन, चुंबन, संवाहन (मालिश), नखच्छेद, दंतच्छेद, प्रहार, सीत्कार, मुखमैथुन के बारे में विस्तार से लिखा है। आलिंगन-चुंबन के अनेकों सूक्ष्म भेद बताए हैं। कुच-मर्दन, स्तन-पान आदि के विस्तृत विधान मिलते हैं। नखक्षत के बारे में लिखा है कि दूसरों की पत्नियों के शरीर पर नखक्षत नहीं करने जाहिए, क्योंकि इससे गुप्त प्रेम खुल सकता है। इसलिए उनके छिपे हुए स्थानों - जंघा, पेड़ू, नितंब, योनि आदि पर ही अपनी यादगार के रूप में नखक्षत बनाने चाहिए। स्पष्ट है कि दूसरों की पत्नियों के साथ भी गोपनीय प्रणय संबंधों का प्रचलन था। यह सब पूरी तरह अभिजात वर्ग के बीच ही था। आम जन की स्त्रियां सामंती प्रभुओं की भोग्या होती थीं। सामंत अथवा सामंत-पुत्रों द्वारा वासना-तृप्ति के लिए चुन ली गईं कमेरे वर्ग की स्त्रियां इसे अपना अहोभाग्य मानती थीं, क्योंकि इसके बदले उन्हें उपहारादि मिलते थे और कभी-कभी कठिन मेहनत से थोड़ी राहत भी।

8. ग्रंथ में देश के अलग-अलग प्रांतों की नारियों के प्रेम के विशेष ढंग का वर्णन मिलता है।
मध्य देश अर्थात् हिमालय और विंध्य पर्वत के बीच के भाग की नारियों के बारे में लिखा है कि वे संभोग में पवित्र आचार वाली होती हैं। 
सिंध और पंजाब प्रांत की नारियों के अधिक वासनामयी बताया गया है। ग्रंथ में उल्लेख है कि वे मुख मैथुन करना पसंद करती हैं।
मालवा की नारियों को भी अधिक वासना वाली बताया गया है।
आंध्र प्रांत की नारियों को स्वभाव से कोमल, पर संभोग में अपवित्र रुचियों वाली एवं आचारहीन कहा गया है। उल्लेख है कि वे मुख मैथुन, गुदा मैथुन एवं अन्य अप्राकृतिक कृत्यों को ज्यादा पसंद करती हैं।
बंगाल एवं कोशल प्रांत की नारियों को संभोग में कृत्रिम साधनों की इच्छुक बताया गया है।
महाराष्ट्र प्रांत की नारियों के बारे में उल्लेख है कि वे चौंसठ प्रयोगों को चाहती हैं। साथ ही, संभोग के दौरान अश्लील बातें बोलना और सुनना पसंद करती हैं।
पाटलिपुत्र की नारियों को महाराष्ट्र की स्त्रियों के समान ही बताया गया है, पर कहा गया है कि वे एकांत में संभोग करना पसंद करती हैं।
इसी प्रकार, अन्य क्षेत्रों की नारियों की पसंद-नापंसद का विवरण मिलता है।

9. ग्रुप सेक्स और एक स्त्री के साथ एक ही समय दो पुरुषों द्वारा योनि मैथुन एवं गुदा मैथुन का भी उल्लेख मिलता है। वात्स्यायन का कहना है कि ऐसा सिर्फ वेश्याओं और दासियों के साथ ही किया जाना चाहिए। 
10. यदि एक पुरुष को लगातार कई नारियों के साथ संभोग करना हो तो वात्स्यायन कृत्रिम लिंग के प्रयोग और उसके विविध प्रकार, इस्तेमाल के तरीके आदि का उल्लेख करते हैं। 

11. वेश्याओं पर एक अलग ही अध्याय है, जिसमें विस्तार से बताया गया है कि किस तरह ग्राहक को संतुष्ट करना चाहिए और कैसे अधिक से अधिक रकम ऐंठने की कोशिश करनी चाहिए। वात्स्यायन कहते हैं कि वेश्या बाजार में बिक्री के लिए रखे हुए सौदे के समान है।

12. वात्स्यायन विस्तार से बताते हैं कि राजाओं के अंत:पुरों में रहने वाली रानियों के किस तरह गोपनीय तरीके से अपने प्रेमियों को बुलाना चाहिए अथवा कृत्रिम साधनों से अपनी काम वासना शांत करनी चाहिए।

13. पर नारियों के हासिल करने के कई तरीके बताए गए हैं, पर यह भी कहा गया है पर नारियों विशेषत: विवाहिता स्त्रियों से संभोग की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करने से पुरुष चाहे जितने भी अधिकार संपन्न एवं वैभवशाली हों, पथभ्रष्ट हो विनाश के मार्ग पर चल पड़ते हैं।

वात्स्यायन ने कहा है कि दूसरों की पत्नियों साथ संभोग करना धर्म विरुद्ध आचरण है। उन बालिकाओं के साथ संभोग करना कुलीन पुरुषों का अभीष्ट होता है जिनका कौमार्य अभी भंग नहीं हुआ हो। अपने प्रभाव से ऐसे पुरुष अक्षत योनि बालिकाओं को प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं।

14. वात्स्यायन ने लिखा है कि मित्र, अनुज एवं निकट संबंधियों की पत्नियों से संभोग की इच्छा नहीं करनी चाहिए। पत्नी की छोटी बहनों से पुरुष प्राय: संभोग करने की चेष्टा करते हैं और इसमें सफल भी होते हैं, पर पत्नी की बड़ी बहनों पर कामुक दृष्टि रखना धर्मविरुद्ध माना गया है।

15. कामसूत्र में कौटंबिक व्यभिचार (incest) का भी उल्लेख है। लिखा गया है कि विदर्भ प्रांत के राजपरिवार की नारियां अपने सौतेले पुत्रों से संभोग करती हैं। स्त्रीपुरी नामक राज्य की स्त्रियों के बारे में उल्लेख है कि वे पीहर यानी मायके के लोगों से शारीरिक संबंध रखती हैं। ग्रंथ में पत्नियों की रक्षा के उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है।

16. ग्रंथ के सातवें भाग में सौंदर्य बढ़ाने, वशीकरण, मैथुन शक्ति बढ़ाने वाले नुस्खे, नष्ट काम शक्ति को पुन: प्राप्त के उपाय एवं तरह-तरह के कृत्रिम लिंग और उन्हें बनाने के तरीके बताए गए हैं। लिंग बड़ा करने के विचित्र उपायों और अनोखी औषधियों का वर्णन भी मिलता है।

17. महर्षि वात्स्यायन के कुछ विशिष्ट कथन -
'वासना पर किसी का अधिकार नहीं होता।'
'रति संभोग आरंभ होने पर राग ही सब क्रियाओं के आरंभ का कारण होता है।'
'नारियां फूल के समान कोमल होती हैं।'
'यंत्रयोग अर्थात शिश्न और योनि का संयोग।'
'जो पुरुष अत्यंत लज्जावती जान कर कन्या की उपेक्षा करता है, वह कन्या की इच्छा नहीं समझ सकता। कन्याएं ऐसे लोगों को पशु समझ कर उनका तिरस्कार करती हैं।'
'संसार में अर्थ की ही प्रधानता है।'

18. इस अद्भुत ग्रंथ का अनुवाद पहले फारसी और फिर अरबी में हुआ। सन् 1845-46 में सर रिचर्ड बर्टन ने मूल संस्कृत से अनुवाद किया जो आज भी सबसे प्रामाणिक माना जाता है। भारतीय विद्वान एस.सी.उपाध्याय ने भी कामसूत्र का अंग्रेजी में अनुवाद किया जो तारापुरवाला संस एंड कंपनी, बंबई से छपा। अब तो दुनिया की कई भाषाओं में यह ग्रंथ उपलब्ध है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि हिंदी में इस ग्रंथ का संपूर्ण प्रामाणिक अनुवाद उपलब्ध नहीं है, न ही इस पर विशेष शोध कार्य हुए। इस ग्रंथ के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम ही होगा।

अनंगरंग

1.15वीं या 16वीं सदी में कल्याण मल्ल नाम के कवि ने वात्स्यायन के कामसूत्र के आधार पर 'अनंगरंग' नामक ग्रंथ की रचना की। कहा जाता है कि इस सेक्स मैनुअल की रचना कल्याण मल्ल ने लोदी वंश (1451-1526 ई.) के शासक अहमद खान के शादजादे लाड खान के लिए खास तौर पर लिखी थी। ये शासक बहुत ही सौंदर्यप्रेमी थे और इन्हें पता था कि संभोग कला के क्षेत्र में भारत का विशेष योगदान है। 'अनंगरंग' को संबंध में बाद के टिप्पणीकारों ने कहा कि इस ग्रंथ की रचना का उद्देश्य है कि पति-पत्नी में अलगाव न हो और दांपत्य जीवन सुखमय हो। 

2. इस ग्रंथ का अंग्रेजी में अनुवाद सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने सन् 1885 में किया था। उन्होंने इसका संपादन भी किया था। उल्लेखनीय है कि वात्स्यायन कृत 'कामसूत्र' का पहला और अब तक का सबसे प्रामाणिक अनुवाद भी सर रिचर्ड एफ. बर्टन ने ही किया था।

3. इस ग्रंथ में इस बात पर जोर डाला गया है कि पुरुष सिर्फ एक स्त्री से ही पूर्ण यौन संतुष्टि पा सकता है, अगर उसे कामकला का पूरा ज्ञान हो। कई लोग, विशेषकर सामंत अनेक शादियां करते हैं और उऩकी रखैलें भी होती हैं, पर उनके यौन-जीवन में अक्सर आनंद की कमी होती है। 'अनंगरंग' में लिखा गया है कि कामकला का ज्ञान रखने वाला पुरुष एक पत्नी से इतना ज्यादा आनंद हासिल कर सकता है, जितना 32 औरतों के साथ भी संभोगरत होकर नहीं। 

4. इस तरह यह ग्रंथ यौन शुचिता और नैतिकता की अवधारणा पर आधारित है। इसका उद्देश्य है कि व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ही काम सुख प्राप्त करे, न कि पराई औरतों के पीछे भागता रहे। लोदी सुल्तान विलासी प्रवृत्ति के थे, जैसे कि तमाम राजे-महाराजे हुआ करते थे। उनके हरम में सैकड़ों औरतें होती थीं। कहा जाता है, उन्हें नैतिकता की शिक्षा देने के लिए ही कल्याण मल्ल ने 'अनंगरंग' की रचना की।

5. 'अनंगरंग' में विविध संभोग आसनों, फोर प्ले यानी पूर्वराग के अलावा स्त्री को लुभाने के तरीके बताए गए हैं। इस ग्रंथ में 9 अध्याय हैं। इनमें अलग-अलग तरह की स्त्रियों, स्त्रियों में यौन उत्तेजना के विशेष स्थल, अलग-अलग प्रकार के पुरुष और स्त्री एवं उनका मिलन, अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाओं के चरित्र की खास बातें, वशीकरण और संभोग के आनंद के विविध रूपों पर प्रकाश डाला गया है। 

6. यह ग्रंथ पूरी तरह से 'कामसूत्र' पर आधारित है, इसलिए इसमें ज्यादातर उन्हीं संभोग आसनों और चुंबन विधियों का वर्णन है, जो उस ग्रंथ में पहले ही किया जा चुका है। यह अलग बात है कि कल्याण मल्ल ने इस ग्रंथ में संभोग विधि को सरल रूप में समझाया है। साथ ही, कुछ नए आसनों का भी उल्लेख किया है। अलग-अलग क्षेत्रों की स्त्रियों की सेक्स अभिरुचि के बारे में 'कामसूत्र' में जो लिखा गया है, वही उल्लेख इस ग्रंथ में भी मिलता है। इस ग्रंथ में तंत्र सेक्स का भी विवरण मिलता है, जो आम लोगों की समझ से परे की बात है।

7. इस ग्रंथ के लेखक इस बात के प्रति विशेष रूप से चिंतित नज़र आते हैं कि पुरुष पर-नारियों से संबंध बनाने को क्यों उत्सुक रहते हैं और स्त्रियां भी भी अनजान मर्दों से सेक्स संबंध बना लेती हैं। इसका मुख्य कारण ग्रंथ लेखक ने सेक्स जीवन में नीरसता को माना है। कल्याण मल का कहना है कि अगर पुरुष और नारी संभोग कला में पारंगत हों और नये प्रयोग करने को तैयार रहते हों, तो उन्हें सेक्स-संतुष्टि के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा और व्यभिचार कम होंगे।

8. इस ग्रंथ से लोदी वंश के शासक बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने कल्याण मल को पुरस्कृत भी किया, पर कवि ने एकनिष्ठा पर जो जोर दिया, उससे वो सहमत नहीं थे। हो भी नहीं सकते थे, क्योंकि जमाना चाहे कोई भी हो, शासक वर्ग भोग-विलास में ही डूबा रहा है। वह यौन शुचिता की धारणा में यकीन नहीं कर सकता।

9. भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि यहां शुरुआत में सेक्स को कभी भी वर्जित विषय नहीं माना गया, लेकिन इस विषय पर वात्स्यायन से पूर्व और बाद के भी तमाम लेखकों-विचारकों ने यौन शुचिता और नैतिकता पर काफी जोर दिया है। उन्होंने काम को धर्म मानते हुए भोग-विलास एवं कई स्त्रियों से संबंध को त्याज्य एवं हेय माना है।

10.  कल्याण मल 'अनंगरंग' के अंत में कहते हैं - अनंगरंग स्त्री और पुरुषों के लिए तब तक प्रिय हो, जब तक पवित्र गंगा शिव की जटाओं से बहती हो, जब तक अनके वाम गौरी विराजती हों, जब तक लक्ष्मी विष्णु से प्रेम करती हों, जब तक ब्रह्मा वेदों के अध्ययन में रत हों और जब तक धरती, चंद्रमा और सूर्य अस्त्तिवमान हों।

                               Manoj Kumar Jha

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Thursday, 7 September 2017

अरुण माहेश्वरी के नाम खुला पत्र - मनोज कुमार झा





आदरणीय अरुण माहेश्वरी जी,

‘लहक’ पत्रिका का नाम मैंने आपसे ही सुना। आप इसके नियमित लेखक रहे हैं। कोई भी पत्रिका उसके सम्पादक की निजी संपत्ति नहीं होती। स्वत्वाधिकार उसका ज़रूर होता है, पर पत्रिका में जो लेख, कहानी, कविता, विचारों का प्रकाशन वह करता है, उस पर सार्वजनिक चर्चा होती है। इधर लहक सम्पादक के कुछ विचारों के बारे में जानकर बहुत ही आश्चर्य हुआ और इस बात पर भी कि आपके जैसे विचारक ने इस पर चुप्पी साध रखी है। लहक सम्पादक द्वारा निराला और गाँधी को जातिवादी ठहराया जाना, प्रेमचंद को पश्चिमपरस्त बताया जाना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो गंभीर रूप से विचारणीय हैं। इतना ही नही, धर्मवीर भारती, भगवतीचरण वर्मा और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन जी को एक फ्रेंच लेखक की पुस्तक का नकलची कहते हैं। आप इनका फेसबुक पेज देखें कि ये क्या उलटी-सीधी बातें लिख रहे हैं और सूअर आदि लिख कर कैसे काव्य का सृजन कर रहे हैं। यदि यह व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठा है तो इसे अपना इलाज कराना चाहिए। ये महोदय साफ कहते हैं कि कोई भी आलोचना से परे नहीं है, बात ठीक है, पर जिस तरह की बेसिर-पैर की बातें ये कर रहे हैं, वह कहाँ तक उचित है। पिछले दिनों इन्होंने सुशील कुमार को, साथ ही परोक्ष तौर पर मुझे भी क्या नहीं कहा है। आप इस मैगजीन से जुड़े रहे हैं, इसलिए कुछ लिहाज भी कर रहा हूँ, नहीं तो इस तरह के अहमक तत्वों से निपटना मुझे अच्छी तरह आता है। आप इन महोदय को समझा दें कि ये अपनी सीमा में रहें, अन्यथा सही नहीं होगा। मैं इनकी लहक की बहक को शान्त कर दूँगा। जो निराला, प्रेमचंद और गाँधी का अपमान कर सकता है, वह किसी का भी अपमान कर सकता है। ऐसे तत्व जो परजीवी होते हैं, शातिर किस्म के लोगों के द्वारा जनवादी संघर्ष की जड़ों में मट्ठा डालने के लिए प्रत्यारोपित किए जाते हैं।

आभार और धन्यवाद।

मनोज कमार झा

Monday, 28 August 2017

21वीं सदी की सुबह आने से पहले ही जलता हुआ सवाल छोड़ कर चले गए गोरख पांडेय - मनोज कुमार झा

                       स्वप्न और क्रान्ति के कवि गोरख पांडेय
                       ............................................................

दुनिया के कई महान और क्रांतिकारी कवियों ने आत्महत्या की है। कवियों की हत्या भी की गई है। पिछली सदी के अंतिम दशक में क्रांतिकारी कवि पाश की आतंकवादियों ने हत्या कर दी, तो एक और क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने आत्महत्या कर ली। हत्या हो या आत्महत्या, त्रासद होती है। क्या यह एक हत्यारे समय का ही सच है?

गोरख पांडेय की अंतिम कविताओं में एक है -

हत्या-दर-हत्या

हत्या की खबर फैली हुई है

अखबार पर,

पंजाब में हत्या

हत्या बिहार में

लंका में हत्या

लीबिया में हत्या

बीसवीं सदी हत्या से हो कर जा रही है

अपने अंत की ओर

इक्कीसवीं सदी

की सुबह

क्या होगा अखबार पर ?

खून के धब्बे

या कबूतर

क्या होगा

उन अगले सौ सालों की

शुरुआत पर

लिखा?

यह एक जलता हुआ सवाल छोड़ कर गोरख पांडेय चले गए।

इक्कीसवीं सदी की सुबह आने से पहले ही।

जब आतंकवादियों द्वारा पाश की हत्या कर दिए जाने की ख़बर आई थी, तो गोरख पांडेय काफ़ी विचलित हो उठे थे। इसी प्रकार, लखनऊ में बैडमिंटन के नेशनल चैम्पियन सैयद मोदी की हत्या की ख़बर आने के बाद भी वह बहुत दुखी और परेशान नज़र आए थे। उस समय कौन जानता था कि कुछ समय ही बाद गोरख पांडेय भी अपने जीवन का अंत कर लेंगे। गोरख पांडेय जैसे क्रांतिकारी कवि की आत्महत्या हमारे समय के एक भयावह सच से परदा हटाती है। यह वर्तमान पूंजीवादी समाज में एक व्यक्ति के अलगाव, उसके बिखराव और उसके अस्तित्व के विलोपित होते जाने की भयानक पीड़ा को सामने लाती है। जबकि गोरख पांडेय कोई सामान्य व्यक्ति तो थे नहीं। वह उस वक़्त स्वयं को सबसे अग्रगामी कहने वाले वाम सांस्कृतिक आंदोलन के प्रतिनिधि थे। तीसरी धारा के रूप में उभरने वाले वामपंथी आंदोलन के सशक्त प्रतिनिधियों में एक और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव। गोरख पांडेय प्रखर राजनीतिक चेतना से संपन्न कवि थे। अपने समय के अन्य कवियों से पूरी तरह अलग। उन्होंने लिखा था –

समझौता और आत्मसमर्पण नहीं,

नहीं, नहीं तो जीने का प्रण नहीं।

भूलना नहीं होगा कि देश में वामपंथी आंदोलनों का जो इतिहास रहा है, वह समझौते और आत्मसमर्पण का ही रहा, जिसके खिलाफ़ नक्सलबाड़ी की जो आग़ भड़की, उसने बड़े पैमाने पर कवियों-लेखकों-कलाकारों, विचारकों, छात्रों-शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी तरफ़ खींचा। बंगाल से भड़की नक्सलबाड़ी वह आग़ जल्दी ही देश के कई हिस्सों में फैल गई। बिहार, आंध्र प्रदेश और कई अन्य राज्यों में किसान आंदोलनों का सिलसिला शुरू हो गया। बिहार में भोजपुर इसका केंद्र बना। वर्गशत्रु का अहसास तीखा और सघन हो गया। बाबा नागार्जुन ने उसी समय अपनी प्रसिद्ध ‘भोजपुर’ शीर्षक कविता लिखी थी –

यही धुआं मैं खोज रहा था

यही आग थी मुझे चाहिए

बारूदी छर्रे की खुशबू

आओ आओ इन नथुनों में इनको भर लूं

बाबा ने लिखा था – भगत सिंह ने यही-यहीं अवतार लिया है...

देश में क्रांतिकारी फिज़ा बन गई थी। इसने कविता और कला जगत पर ग़ज़ब का असर डाला। उस समय अराजक कविता का दौर था। पर इस नए आंदोलन से शुरू हुआ एक नया क्रांतिकारी दौर, जिसके सबसे सशक्त प्रतिनिधि बन कर उभरे गोरख पांडेय।

1984-85 में ज्ञानरंजन द्वारा प्रकाशित ‘पहल’ के किसी अंक में गोरख पांडेय की कविता देखने को मिली। ज्ञानरंजन पहल के हर अंक में कवर पेज के बाद एक कविता खास तौर पर प्रकाशित करते थे। यह कविता थी –

कविता युग की नब्ज़ धरो

अफ्रीका लातिन अमेरिका उत्पीड़ित हर अंग एशिया

आदमखोरों की निग़ाह में

खंज़र-सी उभरो।

यह गोरख पांडेय की कविता से प्रथम साक्षात्कार था। इसके पहले उनका नाम भी नहीं सुना था, जबकि उनका संग्रह ‘जागते रहो सोने वालो’ प्रकाशित हो चुका था और उसे ओमप्रकाश सम्मान भी मिल चुका था।

उस समय हिंदी कविता में युवा सितारे थे – अरुण कमल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश और दिविक रमेश। गोरख पांडेय का कोई नाम नहीं लेता था। सारे आलोचक इन्हीं कवियों को श्रेष्ठ और क्रांतिकारी बता रहे थे। इनके संग्रह लगातार छप रहे थे और पत्र-पत्रिकाओं में इन पर आलोचनात्मक लेख भी। उस दौरान प्रगितशील लेखक संघ का पुनर्गठन हुआ था। आलोक धन्वा जैसे कवि तो बहुत पहले से ही चर्चित हो चुके थे और प्रगतिशील लेखक संगठन में शामिल नहीं थे, पर आलोचकों का मुख्य जोर अरुण कमल पर था। पर गोरख पांडेय की ‘कविता युग की नब्ज़ धरो’ पढ़ते ही लगा कि कलेजे में सच का खंजर चुभ गया है। लगा कि यह तो अलग ही किस्म का कवि है। इसके तेवर अलग ही हैं। कविता का ये अंदाज़ अलग है, जो प्रगतिशील युवा कवियों के रूप में स्थापित हो रहे और पुरस्कारों से नवाज़े जा रहे कवियों से कहीं साम्य नहीं रखता। जल्दी ही गोरख पांडेय का कविता संग्रह ‘जागते रहो सोने वालो’ उपलब्ध किया। एक-एक कविता न जाने कितनी बार पढ़ डाली। और भोजपुरी में लिखे गीत। ये कविताएं उन कविताओं से पूरी तरह अलग थीं जो युवा प्रगतिशील कवि लिख रहे थे, पुरस्कारों-सम्मानों से नवाजे जा रहे थे और जिन्होंने अपने इर्द-गिर्द एक अच्छा-खासा प्रभामंडल कायम कर लिया था। प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलनों में इनका जलवा देखने लायक होता था। पर कविता में वही लिजलिजी भावुकता। वही निम्न मध्यवर्गीय संवेदना। वही शब्दों का खेल। गढ़े गए शब्द। खींच-खींच कर और सांचे में ढाले गए। तमाम साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी ही कविताएं दिखाई पड़तीं।

आलोचकों ने क्या ख़ूब बांधे इनके प्रशंसा के पुल, पर गोरख पांडेय के बारे में कहीं पढ़ने को नहीं मिलता। शायद ही किसी आलोचक ने महत्वपूर्ण युवा कवि के तौर पर उस वक़्त उनके नाम का उल्लेख किया हो। इनमें तमाम मार्क्सवादी आलोचक आ जाते हैं। उस वक़्त तो कुछ मार्क्सवादी विद्वान और आलोचक एक ऐसे कवि को आगे बढ़ाने या कहें लॉन्च करने में कठिन परिश्रम कर रहे थे, जिन्होंने बाबा नागार्जुन पर ‘नागार्जुन की राजनीति’ नाम से एक बुकलेट प्रकाशित करा पर्याप्त नाम कमाया था, जिसमें नागार्जुन की इसलिए आलोचना या कहें निंदा की गई थी कि वे सीपीआई की नीतियों का समर्थन क्यों नहीं करते और सोवियत संघ की यात्रा से लौटने के बाद वहां की व्यवस्था के ख़िलाफ़ टिप्पणी क्यों की।

बाबा पर यह कह कर कीचड़ उछालने की कोशिश की गई थी कि उन्होंने इमरजेंसी के विरोध में पटना की सड़कों पर कविता पाठ किया था और जेल भी गए थे। पटना की सड़कों पर इमरजेंसी के विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु और आलोक धन्वा भी उतरे थे। बहरहाल, प्रगतिशील लेखक संघ के बाद जनवादी लेखक संघ का भी गठन हुआ, क्योंकि प्रगतिशील लेखक संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन था, महासचिव, अध्यक्ष एवं हर स्तर के पदाधिकारी वही हो सकते थे, जो सीपीआई के कार्ड होल्डर हों। फिर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने अपने सदस्य लेखकों का जनवादी लेखक संगठन बनाया। इस तरह साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई बन गई, जबकि सन् 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं, बल्कि उसके आगे-आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।

जो भी हो, गोरख पांडेय की चर्चा कोई नहीं करता था। उस दौर की पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं शायद ही देखने को मिलती थीं। न ही किसी साहित्यिक गोष्ठी, कार्यक्रम, सम्मेलन में उनके बारे में कुछ सुनने को मिला।

ज़ाहिर है, साहित्यिक समाज में गोरख पांडेय घोर उपेक्षा के शिकार थे। आख़िर क्यों? दरअसल, हिंदी साहित्य परंपरा में जनकवियों की उपेक्षा कोई नई बात नहीं है। इसका इतिहास रहा है। हिंदी में दरबारी परंपरा के कवियों को ही नाम और नामा मिलता रहा है।

वामपंथी लेखकों और उनके संगठनों की बात की जाए तो वे भी सत्ता प्रतिष्ठानों से ही जुड़े रहे हैं।

भारत में वामपंथी राजनीति हमेशा से कांग्रेस की पिछलग्गू रही और सत्ता प्रतिष्ठानों से इसका गहरा नाता रहा। आगे चल कर कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वाम मोर्चा बना कर पश्चिम बंगाल और केरल में सत्ता हासिल की। वहां उनकी नीतियां कितनी जनसमर्थक रहीं, सभी जानते हैं। पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चा शासन के ख़िलाफ़ ही नक्सलबाड़ी का किसान आंदोलन चारु मजुमदार के नेतृत्व में सामने आया, जो तीसरी धारा के नाम से मशहूर हुआ।

बनारस में अध्ययन करने के दौरान गोरख पांडेय नक्सलवाद की इसी विचारधारा से जुड़े और किसान आंदोलनों के गहरे संपर्क में आए। इसने उनकी रचनाशीलता की धारा को बदल दिया। आंदोलनों और ज़मीन से जुड़े होने के कारण ही गोरख पांडेय की कविता की अंतर्वस्तु और रूप में भिन्नता दिखाई पड़ती है। और चूंकि वे कभी सत्ता प्रतिष्ठानों से नहीं जुड़े और न ही उनमें आत्मप्रचार-प्रदर्शन की मध्यमवर्गीय प्रवृत्ति थी, इसलिए घनघोर उपेक्षा के शिकार हुए।

आज भी साहित्याचार्यों की नज़र में गोरख पांडेय का मोल शायद ही कुछ हो, वैसे जहां भाषणों की बात है तो स्वनामधन्य आलोचकों ने उन्हें भारत का लोर्का तक कहा। उनकी आत्महत्या को भी गौरवान्वित करने की कोशिश की गई। दरअसल, गोरख पांडेय हिंदी के कोई पहले कवि नहीं हैं, जिनकी इतनी उपेक्षा हुई हो।

जितने भी जनकवि हुए, नागार्जुन से लेकर त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल तक, शुरू में जबरदस्त उपेक्षा के शिकार रहे। स्वयं साहबी संस्कृति में डूबे प्रगतिशीलों ने ही उनकी उपेक्षा की। पर जनता के लिए, मेहनतकश अवाम के लिए लिखने वाले संघर्षधर्मी ये कवि अपनी उपेक्षा से कतई विचलित नहीं हुए। त्रिलोचन ने तो इन पर कटाक्ष करते हुए यहां तक लिखा था – ‘प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है, देखा त्रिलोचन का कहीं नाम नहीं था।’ इसी प्रकार शलभ श्रीराम सिंह और अदम गोंडवी जैसे कवि हैं, जो जनता के बीच काफी लोकप्रिय हुए, पर हिंदी के प्रगतिशील-जनवादी यानी मार्क्सवादी आलोचकों ने इन्हें तरजीह नहीं दी।

गोरख पांडेय की कविता वास्तव में लोक कविता है, इसलिए उन्हें आलोचकों की प्रशंसात्मक टिप्पणियों-लेखों की कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी। उनकी कविता स्वयं अपनी ताकत के दम पर पाठकों के बीच अपना स्थान बना रही थी। खासकर भोजपुरी में लिखे गए उनके गीत तो जन आंदोलनों के दौरान खूब गाए जाते थे, उसी तरह जैसे शलभ श्रीराम सिंह की नज़्म – नफ़स-नफ़स कद़म-कद़म की पंक्तियां – घिरे हैं हम सवालों से हमें जवाब चाहिए

 जवाब-दर-सवाल है इंक़लाब चाहिए।    

लेकिन इसे वामपंथी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की विडंबना ही कहेंगे कि सीपीआई के प्रगतिशील लेखक संघ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जनवादी लेखक संघ के तर्ज पर इंडियन पीपुल्स फ्रंट ने जन संस्कृति मंच का गठन किया और गोरख पांडेय को इसका महासचिव बना दिया गया। उस समय भूमिगत मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन ने इस फ्रंट को चुनावी राजनीति में खुली भागीदारी करने के लिए बनाया था। दरअसल, पार्टी लाइन पर लेखक संगठनों का गठन ही एक ग़लत विचार था, पर उस दौर में यही विचार हावी था। इससे जो नुकसान हुआ, वह उस समय लोगों को समझ में नहीं आया और अब तो ये संगठन भी बस नाम भर के ही रह गए हैं। इनकी अब कहीं कोई मौजूदगी नज़र नहीं आती। वैचारिक संकीर्णता ने इनका एक तरह से लोप ही कर दिया। लेकिन ऐसा लगता है कि गोरख पांडेय समान विचार और उद्देश्य वाले लेखकों का इस तरह से अलग-अलग संगठन बनाए जाने को दिल से स्वीकार नहीं कर पाए थे, जैसे नागार्जुन, त्रिलोचन और कुछ अन्य साहित्यकार। यही कारण है कि वह हर संगठन और गुट के लेखकों से खुल कर मिलने और संवाद कायम करने में यक़ीन रखते थे, जिसके लिए उन्हें पीपुल्स फ्रंट के कुछ नेताओं की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी थी। पर गोरख पांडेय ने प्रलेस और जसम के साथी लेखकों से मिलना और संवाद कायम करना बंद नहीं किया।

गोरख पांडेय बहुत ही खुले दिल और विचारों के व्यक्ति थे। वैचारिक संकीर्णता से कोसों दूर। उनमें यह क्षमता थी कि वह व्यक्ति के मन को समझ लेते थे, जो संभवत: उनकी सच्ची प्रतिबद्धता से पैदा हुई थी। असली-नकली और करियरवादी वामपंथियों को समझ लेना उनके लिए कठिन नहीं था। पर यह भी एक सच्चाई थी कि गोरख पांडेय जिस स्तर पर किसी व्यक्ति से जुड़ जाते थे, वह व्यक्ति उनसे उस स्तर पर नहीं जुड़ पाता था। गोरख पांडेय एक सच्चे मार्क्सवादी विचारक और लेखक इसलिए थे कि वह वास्तव में मनुष्य की समानता में यक़ीन करते थे। उनके लिए हर मनुष्य बराबर था। वह पद, पैसे और अधिकार के कारण किसी को बड़ा-छोटा नहीं मानते थे। यह उनका मूल स्वभाव था, जो दुर्लभ ही कहा जा सकता है।

1986 में दिल्ली जाने पर एक दोस्त के मार्फ़त गोरख पांडेय से मिलना हुआ। गोरख पांडेय जेएनयू ओल्ड कैंपस की लाइब्रेरी में सुबह ही चले जाते थे और देर शाम तक वहां पढ़ते थे। बीच-बीच में चाय-सिगरेट पीने बाहर निकला करते थे। ओल्ड कैंपस स्थित होस्टल में रहते थे। लाइब्रेरी के बाहर ही उनसे मुलाकात हुई और फिर तो लगभग रोज ही मिलने का सिलसिला चल पड़ा। पहली मुलाकात में ही उन्होंने मुझसे कविता सुनाने को कहा। एक कविता सुनाई जो आत्महत्या पर थी। उन्होंने कहा कि कविता अच्छी है, पर कुछ झाड़पोंछ की ज़रूरत है। मुझे याद आया कि बाबा नागार्जुन भी कविता की झाड़पोंछ करनी बाकी है, जैसी बात कहा करते थे। गोरख पांडेय ने अपनी भी कविताएं सुनाई। वह ज़्यादातर भोजपुरी के गीत सुनाया करते थे। जेएनयू ओल्ड कैंपस स्थित कैफेटेरिया में जहां अभिजात वर्गीय स्टूडेंट्स की भरमार होती थी, कुर्ता-धोती पहने गोरख पांडेय जब ‘गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो अजदिया हमरा के भावे ले’ गाने लगते थे, तो समां ही बंध जाता था। वह अभिजात के छल-छद्म और अहंकार को कहीं भी तोड़ देते थे। जेएनयू के न्यू कैंपस में केदारनाथ सिंह का आवास था। वहां अक्सर कविता गोष्ठी होती थी, जिसमें गोरख पांडेय शामिल होते थे। होस्टल के उनके कमरे पर भी साथियों का जमावड़ा होता था। वहां वह स्वयं बोलते तो कम थे, पर दूसरे लोगों को सुना करते थे।

एक बार वह ब्रेख़्त की कविताओं की चर्चा कर रहे थे। उसी क्रम में उन्होंने बताया, “वीणा भाटिया ने उनके साथ ब्रेख़्त की 20 कविताओं का अनुवाद किया, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण कविता थी ‘वेश्या  ऐलविन रो‘। ये कविताएं गोष्ठियों में सुनी-सुनाई गईं, पर कभी प्रकाशित नहीं हुईं।“ वीणा भाटिया साहित्य चयन संस्था का संचालन करती हैं। गोरख पांडेय से नियमित अंतरालों पर मिलने वालों में वह भी थीं। वह साहित्य के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से दिल्ली में 35, फिरोजशाह स्थित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् के कैंपस में किताबों की एक स्टाल लगाती थीं। गोरख पांडेय से जुड़ी बहुत-सी स्मृतियां उन्होंने सहेज रखी हैं।  

गोरख पांडेय का स्वभाव बच्चों जैसा सरल था। उनमें जरा भी कृत्रिमता नहीं थी। बड़ा हो या छोटा, सबसे वह एक ही तरह मिलते थे। होस्टल के उनके कमरे पर विद्यार्थियों से लेकर राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, लेखकों-कवियों और जान-पहचान के कई लोगों का आना-जाना लगा रहता था। आईपीएफ के कई बड़े नेता अक्सर उनके पास आया करते थे। कहानीकार अरुण प्रकाश जब दिल्ली आए तो सबसे पहले गोरख पांडेय के कमरे पर ही आए और जब तक उनके रहने की स्थाई व्यवस्था नहीं हुई, वहीं रहे।

जेएनयू के कई पुराने विद्यार्थी भी उनके पास आकर रहते थे, लेकिन उनका पूरा दिन प्राय: जेएनयू की लाइब्रेरी में ही बीतता था। संस्कृत के प्रकांड विद्वान और दर्शनशास्त्र के अध्येता गोरख पांडेय अति सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक थे। बड़े-बड़े घुंघराले बाल और धोती-कुर्ते में उनका व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली लगता था। गोरख पांडेय ने सार्त्र के अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद पर पीएच.डी की थी और इसी से संबंधित विषय पर पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च कर रहे थे। साथ ही, पत्र-पत्रिकाओं के लिए वह लगातार लेख भी लिखा करते थे।  

बहरहाल, उनके जीवन पर विचार किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि बहुत ही कम उम्र में ही अपना जीवन जन आंदोलनों को समर्पित कर देने वाले गोरख पांडेय बहुत ही अकेले होते चले जा रहे थे। 1945 में जन्मे गोरख पांडेय की मां का निधन तभी हो गया था, जब वह बहुत छोटे थे। बड़ी भू-संपत्ति के मालिक उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। गोरख पांडेय का बचपन अपनी बुआ के सानिध्य में बीता, जिन पर उन्होंने ‘बुआ के प्रति’ जैसी अद्भुत कविता लिखी है, जिसकी तुलना निराला की ‘सरोज-स्मृति’ से की जा सकती है। लेकिन करियरवादी सुविधाभोगी कतिपय वामपंथी लेखकों ने समय-समय पर उनका मजाक उड़ाने की कोशिश भी कम नहीं की। परिवार से गोरख पांडेय का नाता लगभग टूट ही चुका था, दूसरी तरफ वो दोस्त भी उनसे उस स्तर पर नहीं जुड़ सके, जिस स्तर पर गोरख पांडेय स्वयं उनसे जुड़ाव महसूस करते थे। यह बात तब सामने आई जब गोरख पांडेय गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। यद्यपि नामुराद मानसिक बीमारी सीजोफ्रेनिया के लक्षण उनमें पहले से ही उभरने लगे थे, पर उनका इलाज तब शुरू हो पाया जब बीमारी चरम पर पहुंच गई। बीमारी के दौरान उसे गंभीरता से लेने की जगह उनका मजाक उड़ाने वाले ज़्यादा थे।

जिन लोगों की गोरख पांडेय ने हर स्तर पर लगातार मदद की थी, वो भी गाढ़े वक़्त में किनाराकशी करते नज़र आए। इससे गोरख पांडेय संभवत: भीतर से टूट गए।

बीमारी जब अंतिम अवस्था में पहुंची तो ऑल इंडिया ऑफ मेडिकल सांइसेस में उनका इलाज शुरू हुआ। बुलाने पर परिवार वाले भी आए, पर चंद दिनों के लिए। बहरहाल, लंबे इलाज के बाद गोरख पांडेय सामान्य हो गए थे। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर होस्टल लौट आए थे। पर अब कोई देखरेख करने वला नहीं था। रिसर्च प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं देने के कारण स्कॉलरशिप बंद हो चुकी थी। वह गहरे आर्थिक संकट में फंस चुके थे। उन्हें लंबे समय तक दवा खानी थी, पर दवाइयों के पैसे भी नहीं थे। एक समय जिन लोगों की उन्होंने खुले दिल से मदद की थी, वो झांकने भी नहीं आ रहे थे। जिस जनसंस्कृति मंच के वह महासचिव थे, उसके नेता, आइपीएफ के नेता कहां थे, कुछ पता नहीं था। दिल्ली का वामपंथी साहित्यिक समुदाय गोरख पांडेय की स्थिति से जानबूझकर बेख़बर था। सबसे बड़ी बात तो ये कि जिस व्यक्ति ने आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, क्या उसके प्रति संगठन का कोई दायित्व नहीं बनता था? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। और अगर इसका जवाब देना हो तो कहा जा सकता है कि भारतीय वामपंथ की जो दुर्दशा हुई है और आज जिस प्रकार यह राजनीति से लेकर संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में हाशिए पर चला गया है, उसके पीछे वामपंथी संगठनों का अवसरवाद, सत्तलोलुपता और परमुखापेक्षिता ही है। जाहिर है, गोरख पांडेय जैसे सच्चे मनीषी और कवि के महत्व को वो कभी नहीं समझ सकते थे। वह उनका इस्तेमाल कर सकते थे, जो उन्होंने करने की कोशिश भी की, और जब उन्हें लगा कि वह उनके काम के नहीं रह गए तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। परिवार ने तो छोड़ ही रखा था, दोस्तों ने भी छोड़ दिया, और सबसे बढ़कर संगठन ने। यह संगठन अब उन्हें याद करने की रस्मअदायगी करता है।

पर यह भूला नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य के इतिहास में गोरख पांडेय का नाम अमिट है। राजनीतिक विचारधाराएं अपनी जगह हैं, पर साहित्य तो मनुष्य और मनुष्यता से जुड़ा है। इससे बड़ा सच और कोई नहीं। गोरख पांडेय की कविता उत्पीड़ित मनुष्य की आवाज़ बुलंद करती है। उनकी कविता आज़ादी का उद्घोष है, संघर्ष की रणभेरी है और उत्पीड़ित मनुष्यता की करुण पुकार ही नहीं, उसकी मुक्ति के लिए युद्ध का आह्वान है।

गोरख पांडेय लघुमानवों के कवि नहीं, सर्वहारा के कवि हैं, किसानो के कवि हैं, खेतों-खलिहानों में श्रमरत स्त्रियों की आवाज़ को सामने लाने वाले कवि हैं। गोरख पांडेय का कवि व्यक्तित्व विराट है। वह भारतेंदु, निराला, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की परंपरा के कवि हैं। गोरख पांडेय के कृतित्व-व्यक्तित्व का मूल्यांकन इतिहास करेगा। फिलहाल, जो दौर है वह भटकाव और पतन का है। छद्म वाम पर गोरख पांडेय ने भी जम कर प्रहार किया था अपनी कविताओं के माध्यम से। लेकिन वह समय आएगा जब जनता का संघर्ष रंग लाएगा और सच्चे अर्थों में मनुष्यता की स्थापना होगी। युगो-युगों से चला आ रहा क्रांति का स्वप्न पूरा होगा। गोरख पांडेय स्वप्न और क्रांति के ही कवि हैं।      
दुनिया के कई महान और क्रांतिकारी कवियों ने आत्महत्या की है। कवियों की हत्या भी की गई है। पिछली सदी के अंतिम दशक में क्रांतिकारी कवि पाश की आतंकवादियों ने हत्या कर दी, तो एक और क्रांतिकारी कवि गोरख पांडेय ने आत्महत्या कर ली। हत्या हो या आत्महत्या, त्रासद होती है। क्या यह एक हत्यारे समय का ही सच है?
गोरख पांडेय की अंतिम कविताओं में एक है -
हत्या-दर-हत्या
हत्या की खबर फैली हुई है
अखबार पर,
पंजाब में हत्या
हत्या बिहार में
लंका में हत्या
लीबिया में हत्या
बीसवीं सदी हत्या से हो कर जा रही है
अपने अंत की ओर
इक्कीसवीं सदी
की सुबह
क्या होगा अखबार पर ?
खून के धब्बे
या कबूतर
क्या होगा
उन अगले सौ सालों की
शुरुआत पर
लिखा?
यह एक जलता हुआ सवाल छोड़ कर गोरख पांडेय चले गए।
इक्कीसवीं सदी की सुबह आने से पहले ही।
जब आतंकवादियों द्वारा पाश की हत्या कर दिए जाने की ख़बर आई थी, तो गोरख पांडेय काफ़ी विचलित हो उठे थे। इसी प्रकार, लखनऊ में बैडमिंटन के नेशनल चैम्पियन सैयद मोदी की हत्या की ख़बर आने के बाद भी वह बहुत दुखी और परेशान नज़र आए थे। उस समय कौन जानता था कि कुछ समय ही बाद गोरख पांडेय भी अपने जीवन का अंत कर लेंगे। गोरख पांडेय जैसे क्रांतिकारी कवि की आत्महत्या हमारे समय के एक भयावह सच से परदा हटाती है। यह वर्तमान पूंजीवादी समाज में एक व्यक्ति के अलगाव, उसके बिखराव और उसके अस्तित्व के विलोपित होते जाने की भयानक पीड़ा को सामने लाती है। जबकि गोरख पांडेय कोई सामान्य व्यक्ति तो थे नहीं। वह उस वक़्त स्वयं को सबसे अग्रगामी कहने वाले वाम सांस्कृतिक आंदोलन के प्रतिनिधि थे। तीसरी धारा के रूप में उभरने वाले वामपंथी आंदोलन के सशक्त प्रतिनिधियों में एक और जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय महासचिव। गोरख पांडेय प्रखर राजनीतिक चेतना से संपन्न कवि थे। अपने समय के अन्य कवियों से पूरी तरह अलग। उन्होंने लिखा था –
समझौता और आत्मसमर्पण नहीं,
नहीं, नहीं तो जीने का प्रण नहीं।
भूलना नहीं होगा कि देश में वामपंथी आंदोलनों का जो इतिहास रहा है, वह समझौते और आत्मसमर्पण का ही रहा, जिसके खिलाफ़ नक्सलबाड़ी की जो आग़ भड़की, उसने बड़े पैमाने पर कवियों-लेखकों-कलाकारों, विचारकों, छात्रों-शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं को अपनी तरफ़ खींचा। बंगाल से भड़की नक्सलबाड़ी वह आग़ जल्दी ही देश के कई हिस्सों में फैल गई। बिहार, आंध्र प्रदेश और कई अन्य राज्यों में किसान आंदोलनों का सिलसिला शुरू हो गया। बिहार में भोजपुर इसका केंद्र बना। वर्गशत्रु का अहसास तीखा और सघन हो गया। बाबा नागार्जुन ने उसी समय अपनी प्रसिद्ध ‘भोजपुर’ शीर्षक कविता लिखी थी –
यही धुआं मैं खोज रहा था
यही आग थी मुझे चाहिए
बारूदी छर्रे की खुशबू
आओ आओ इन नथुनों में इनको भर लूं
बाबा ने लिखा था – भगत सिंह ने यही-यहीं अवतार लिया है...
देश में क्रांतिकारी फिज़ा बन गई थी। इसने कविता और कला जगत पर ग़ज़ब का असर डाला। उस समय अराजक कविता का दौर था। पर इस नए आंदोलन से शुरू हुआ एक नया क्रांतिकारी दौर, जिसके सबसे सशक्त प्रतिनिधि बन कर उभरे गोरख पांडेय।
1984-85 में ज्ञानरंजन द्वारा प्रकाशित ‘पहल’ के किसी अंक में गोरख पांडेय की कविता देखने को मिली। ज्ञानरंजन पहल के हर अंक में कवर पेज के बाद एक कविता खास तौर पर प्रकाशित करते थे। यह कविता थी –
कविता युग की नब्ज़ धरो
अफ्रीका लातिन अमेरिका उत्पीड़ित हर अंग एशिया
आदमखोरों की निग़ाह में
खंज़र-सी उभरो।
यह गोरख पांडेय की कविता से प्रथम साक्षात्कार था। इसके पहले उनका नाम भी नहीं सुना था, जबकि उनका संग्रह ‘जागते रहो सोने वालो’ प्रकाशित हो चुका था और उसे ओमप्रकाश सम्मान भी मिल चुका था।
उस समय हिंदी कविता में युवा सितारे थे – अरुण कमल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश और दिविक रमेश। गोरख पांडेय का कोई नाम नहीं लेता था। सारे आलोचक इन्हीं कवियों को श्रेष्ठ और क्रांतिकारी बता रहे थे। इनके संग्रह लगातार छप रहे थे और पत्र-पत्रिकाओं में इन पर आलोचनात्मक लेख भी। उस दौरान प्रगितशील लेखक संघ का पुनर्गठन हुआ था। आलोक धन्वा जैसे कवि तो बहुत पहले से ही चर्चित हो चुके थे और प्रगतिशील लेखक संगठन में शामिल नहीं थे, पर आलोचकों का मुख्य जोर अरुण कमल पर था। पर गोरख पांडेय की ‘कविता युग की नब्ज़ धरो’ पढ़ते ही लगा कि कलेजे में सच का खंजर चुभ गया है। लगा कि यह तो अलग ही किस्म का कवि है। इसके तेवर अलग ही हैं। कविता का ये अंदाज़ अलग है, जो प्रगतिशील युवा कवियों के रूप में स्थापित हो रहे और पुरस्कारों से नवाज़े जा रहे कवियों से कहीं साम्य नहीं रखता। जल्दी ही गोरख पांडेय का कविता संग्रह ‘जागते रहो सोने वालो’ उपलब्ध किया। एक-एक कविता न जाने कितनी बार पढ़ डाली। और भोजपुरी में लिखे गीत। ये कविताएं उन कविताओं से पूरी तरह अलग थीं जो युवा प्रगतिशील कवि लिख रहे थे, पुरस्कारों-सम्मानों से नवाजे जा रहे थे और जिन्होंने अपने इर्द-गिर्द एक अच्छा-खासा प्रभामंडल कायम कर लिया था। प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलनों में इनका जलवा देखने लायक होता था। पर कविता में वही लिजलिजी भावुकता। वही निम्न मध्यवर्गीय संवेदना। वही शब्दों का खेल। गढ़े गए शब्द। खींच-खींच कर और सांचे में ढाले गए। तमाम साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में इनकी ही कविताएं दिखाई पड़तीं।
आलोचकों ने क्या ख़ूब बांधे इनके प्रशंसा के पुल, पर गोरख पांडेय के बारे में कहीं पढ़ने को नहीं मिलता। शायद ही किसी आलोचक ने महत्वपूर्ण युवा कवि के तौर पर उस वक़्त उनके नाम का उल्लेख किया हो। इनमें तमाम मार्क्सवादी आलोचक आ जाते हैं। उस वक़्त तो कुछ मार्क्सवादी विद्वान और आलोचक एक ऐसे कवि को आगे बढ़ाने या कहें लॉन्च करने में कठिन परिश्रम कर रहे थे, जिन्होंने बाबा नागार्जुन पर ‘नागार्जुन की राजनीति’ नाम से एक बुकलेट प्रकाशित करा पर्याप्त नाम कमाया था, जिसमें नागार्जुन की इसलिए आलोचना या कहें निंदा की गई थी कि वे सीपीआई की नीतियों का समर्थन क्यों नहीं करते और सोवियत संघ की यात्रा से लौटने के बाद वहां की व्यवस्था के ख़िलाफ़ टिप्पणी क्यों की।
बाबा पर यह कह कर कीचड़ उछालने की कोशिश की गई थी कि उन्होंने इमरजेंसी के विरोध में पटना की सड़कों पर कविता पाठ किया था और जेल भी गए थे। पटना की सड़कों पर इमरजेंसी के विरोध में फणीश्वरनाथ रेणु और आलोक धन्वा भी उतरे थे। बहरहाल, प्रगतिशील लेखक संघ के बाद जनवादी लेखक संघ का भी गठन हुआ, क्योंकि प्रगतिशील लेखक संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन था, महासचिव, अध्यक्ष एवं हर स्तर के पदाधिकारी वही हो सकते थे, जो सीपीआई के कार्ड होल्डर हों। फिर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने अपने सदस्य लेखकों का जनवादी लेखक संगठन बनाया। इस तरह साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई बन गई, जबकि सन् 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के पीछे नहीं, बल्कि उसके आगे-आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।
जो भी हो, गोरख पांडेय की चर्चा कोई नहीं करता था। उस दौर की पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं शायद ही देखने को मिलती थीं। न ही किसी साहित्यिक गोष्ठी, कार्यक्रम, सम्मेलन में उनके बारे में कुछ सुनने को मिला।
ज़ाहिर है, साहित्यिक समाज में गोरख पांडेय घोर उपेक्षा के शिकार थे। आख़िर क्यों? दरअसल, हिंदी साहित्य परंपरा में जनकवियों की उपेक्षा कोई नई बात नहीं है। इसका इतिहास रहा है। हिंदी में दरबारी परंपरा के कवियों को ही नाम और नामा मिलता रहा है।
वामपंथी लेखकों और उनके संगठनों की बात की जाए तो वे भी सत्ता प्रतिष्ठानों से ही जुड़े रहे हैं।
भारत में वामपंथी राजनीति हमेशा से कांग्रेस की पिछलग्गू रही और सत्ता प्रतिष्ठानों से इसका गहरा नाता रहा। आगे चल कर कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने वाम मोर्चा बना कर पश्चिम बंगाल और केरल में सत्ता हासिल की। वहां उनकी नीतियां कितनी जनसमर्थक रहीं, सभी जानते हैं। पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चा शासन के ख़िलाफ़ ही नक्सलबाड़ी का किसान आंदोलन चारु मजुमदार के नेतृत्व में सामने आया, जो तीसरी धारा के नाम से मशहूर हुआ।
बनारस में अध्ययन करने के दौरान गोरख पांडेय नक्सलवाद की इसी विचारधारा से जुड़े और किसान आंदोलनों के गहरे संपर्क में आए। इसने उनकी रचनाशीलता की धारा को बदल दिया। आंदोलनों और ज़मीन से जुड़े होने के कारण ही गोरख पांडेय की कविता की अंतर्वस्तु और रूप में भिन्नता दिखाई पड़ती है। और चूंकि वे कभी सत्ता प्रतिष्ठानों से नहीं जुड़े और न ही उनमें आत्मप्रचार-प्रदर्शन की मध्यमवर्गीय प्रवृत्ति थी, इसलिए घनघोर उपेक्षा के शिकार हुए।
आज भी साहित्याचार्यों की नज़र में गोरख पांडेय का मोल शायद ही कुछ हो, वैसे जहां भाषणों की बात है तो स्वनामधन्य आलोचकों ने उन्हें भारत का लोर्का तक कहा। उनकी आत्महत्या को भी गौरवान्वित करने की कोशिश की गई। दरअसल, गोरख पांडेय हिंदी के कोई पहले कवि नहीं हैं, जिनकी इतनी उपेक्षा हुई हो।
जितने भी जनकवि हुए, नागार्जुन से लेकर त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल तक, शुरू में जबरदस्त उपेक्षा के शिकार रहे। स्वयं साहबी संस्कृति में डूबे प्रगतिशीलों ने ही उनकी उपेक्षा की। पर जनता के लिए, मेहनतकश अवाम के लिए लिखने वाले संघर्षधर्मी ये कवि अपनी उपेक्षा से कतई विचलित नहीं हुए। त्रिलोचन ने तो इन पर कटाक्ष करते हुए यहां तक लिखा था – ‘प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है, देखा त्रिलोचन का कहीं नाम नहीं था।’ इसी प्रकार शलभ श्रीराम सिंह और अदम गोंडवी जैसे कवि हैं, जो जनता के बीच काफी लोकप्रिय हुए, पर हिंदी के प्रगतिशील-जनवादी यानी मार्क्सवादी आलोचकों ने इन्हें तरजीह नहीं दी।
गोरख पांडेय की कविता वास्तव में लोक कविता है, इसलिए उन्हें आलोचकों की प्रशंसात्मक टिप्पणियों-लेखों की कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी। उनकी कविता स्वयं अपनी ताकत के दम पर पाठकों के बीच अपना स्थान बना रही थी। खासकर भोजपुरी में लिखे गए उनके गीत तो जन आंदोलनों के दौरान खूब गाए जाते थे, उसी तरह जैसे शलभ श्रीराम सिंह की नज़्म – नफ़स-नफ़स कद़म-कद़म की पंक्तियां – घिरे हैं हम सवालों से हमें जवाब चाहिए
 जवाब-दर-सवाल है इंक़लाब चाहिए।    
लेकिन इसे वामपंथी साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन की विडंबना ही कहेंगे कि सीपीआई के प्रगतिशील लेखक संघ और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जनवादी लेखक संघ के तर्ज पर इंडियन पीपुल्स फ्रंट ने जन संस्कृति मंच का गठन किया और गोरख पांडेय को इसका महासचिव बना दिया गया। उस समय भूमिगत मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन ने इस फ्रंट को चुनावी राजनीति में खुली भागीदारी करने के लिए बनाया था। दरअसल, पार्टी लाइन पर लेखक संगठनों का गठन ही एक ग़लत विचार था, पर उस दौर में यही विचार हावी था। इससे जो नुकसान हुआ, वह उस समय लोगों को समझ में नहीं आया और अब तो ये संगठन भी बस नाम भर के ही रह गए हैं। इनकी अब कहीं कोई मौजूदगी नज़र नहीं आती। वैचारिक संकीर्णता ने इनका एक तरह से लोप ही कर दिया। लेकिन ऐसा लगता है कि गोरख पांडेय समान विचार और उद्देश्य वाले लेखकों का इस तरह से अलग-अलग संगठन बनाए जाने को दिल से स्वीकार नहीं कर पाए थे, जैसे नागार्जुन, त्रिलोचन और कुछ अन्य साहित्यकार। यही कारण है कि वह हर संगठन और गुट के लेखकों से खुल कर मिलने और संवाद कायम करने में यक़ीन रखते थे, जिसके लिए उन्हें पीपुल्स फ्रंट के कुछ नेताओं की नाराज़गी भी झेलनी पड़ी थी। पर गोरख पांडेय ने प्रलेस और जसम के साथी लेखकों से मिलना और संवाद कायम करना बंद नहीं किया।
गोरख पांडेय बहुत ही खुले दिल और विचारों के व्यक्ति थे। वैचारिक संकीर्णता से कोसों दूर। उनमें यह क्षमता थी कि वह व्यक्ति के मन को समझ लेते थे, जो संभवत: उनकी सच्ची प्रतिबद्धता से पैदा हुई थी। असली-नकली और करियरवादी वामपंथियों को समझ लेना उनके लिए कठिन नहीं था। पर यह भी एक सच्चाई थी कि गोरख पांडेय जिस स्तर पर किसी व्यक्ति से जुड़ जाते थे, वह व्यक्ति उनसे उस स्तर पर नहीं जुड़ पाता था। गोरख पांडेय एक सच्चे मार्क्सवादी विचारक और लेखक इसलिए थे कि वह वास्तव में मनुष्य की समानता में यक़ीन करते थे। उनके लिए हर मनुष्य बराबर था। वह पद, पैसे और अधिकार के कारण किसी को बड़ा-छोटा नहीं मानते थे। यह उनका मूल स्वभाव था, जो दुर्लभ ही कहा जा सकता है।
1986 में दिल्ली जाने पर एक दोस्त के मार्फ़त गोरख पांडेय से मिलना हुआ। गोरख पांडेय जेएनयू ओल्ड कैंपस की लाइब्रेरी में सुबह ही चले जाते थे और देर शाम तक वहां पढ़ते थे। बीच-बीच में चाय-सिगरेट पीने बाहर निकला करते थे। ओल्ड कैंपस स्थित होस्टल में रहते थे। लाइब्रेरी के बाहर ही उनसे मुलाकात हुई और फिर तो लगभग रोज ही मिलने का सिलसिला चल पड़ा। पहली मुलाकात में ही उन्होंने मुझसे कविता सुनाने को कहा। एक कविता सुनाई जो आत्महत्या पर थी। उन्होंने कहा कि कविता अच्छी है, पर कुछ झाड़पोंछ की ज़रूरत है। मुझे याद आया कि बाबा नागार्जुन भी कविता की झाड़पोंछ करनी बाकी है, जैसी बात कहा करते थे। गोरख पांडेय ने अपनी भी कविताएं सुनाई। वह ज़्यादातर भोजपुरी के गीत सुनाया करते थे। जेएनयू ओल्ड कैंपस स्थित कैफेटेरिया में जहां अभिजात वर्गीय स्टूडेंट्स की भरमार होती थी, कुर्ता-धोती पहने गोरख पांडेय जब ‘गुलमिया अब हम नाहीं बजइबो अजदिया हमरा के भावे ले’ गाने लगते थे, तो समां ही बंध जाता था। वह अभिजात के छल-छद्म और अहंकार को कहीं भी तोड़ देते थे। जेएनयू के न्यू कैंपस में केदारनाथ सिंह का आवास था। वहां अक्सर कविता गोष्ठी होती थी, जिसमें गोरख पांडेय शामिल होते थे। होस्टल के उनके कमरे पर भी साथियों का जमावड़ा होता था। वहां वह स्वयं बोलते तो कम थे, पर दूसरे लोगों को सुना करते थे।
एक बार वह ब्रेख़्त की कविताओं की चर्चा कर रहे थे। उसी क्रम में उन्होंने बताया, “वीणा भाटिया ने उनके साथ ब्रेख़्त की 20 कविताओं का अनुवाद किया, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण कविता थी ‘वेश्या  ऐलविन रो‘। ये कविताएं गोष्ठियों में सुनी-सुनाई गईं, पर कभी प्रकाशित नहीं हुईं।“ वीणा भाटिया साहित्य चयन संस्था का संचालन करती हैं। गोरख पांडेय से नियमित अंतरालों पर मिलने वालों में वह भी थीं। वह साहित्य के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से दिल्ली में 35, फिरोजशाह स्थित भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् के कैंपस में किताबों की एक स्टाल लगाती थीं। गोरख पांडेय से जुड़ी बहुत-सी स्मृतियां उन्होंने सहेज रखी हैं।  
गोरख पांडेय का स्वभाव बच्चों जैसा सरल था। उनमें जरा भी कृत्रिमता नहीं थी। बड़ा हो या छोटा, सबसे वह एक ही तरह मिलते थे। होस्टल के उनके कमरे पर विद्यार्थियों से लेकर राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, लेखकों-कवियों और जान-पहचान के कई लोगों का आना-जाना लगा रहता था। आईपीएफ के कई बड़े नेता अक्सर उनके पास आया करते थे। कहानीकार अरुण प्रकाश जब दिल्ली आए तो सबसे पहले गोरख पांडेय के कमरे पर ही आए और जब तक उनके रहने की स्थाई व्यवस्था नहीं हुई, वहीं रहे।
जेएनयू के कई पुराने विद्यार्थी भी उनके पास आकर रहते थे, लेकिन उनका पूरा दिन प्राय: जेएनयू की लाइब्रेरी में ही बीतता था। संस्कृत के प्रकांड विद्वान और दर्शनशास्त्र के अध्येता गोरख पांडेय अति सुदर्शन व्यक्तित्व के मालिक थे। बड़े-बड़े घुंघराले बाल और धोती-कुर्ते में उनका व्यक्तित्व बहुत ही प्रभावशाली लगता था। गोरख पांडेय ने सार्त्र के अस्तित्ववाद और मार्क्सवाद पर पीएच.डी की थी और इसी से संबंधित विषय पर पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च कर रहे थे। साथ ही, पत्र-पत्रिकाओं के लिए वह लगातार लेख भी लिखा करते थे।  
बहरहाल, उनके जीवन पर विचार किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि बहुत ही कम उम्र में ही अपना जीवन जन आंदोलनों को समर्पित कर देने वाले गोरख पांडेय बहुत ही अकेले होते चले जा रहे थे। 1945 में जन्मे गोरख पांडेय की मां का निधन तभी हो गया था, जब वह बहुत छोटे थे। बड़ी भू-संपत्ति के मालिक उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। गोरख पांडेय का बचपन अपनी बुआ के सानिध्य में बीता, जिन पर उन्होंने ‘बुआ के प्रति’ जैसी अद्भुत कविता लिखी है, जिसकी तुलना निराला की ‘सरोज-स्मृति’ से की जा सकती है। लेकिन करियरवादी सुविधाभोगी कतिपय वामपंथी लेखकों ने समय-समय पर उनका मजाक उड़ाने की कोशिश भी कम नहीं की। परिवार से गोरख पांडेय का नाता लगभग टूट ही चुका था, दूसरी तरफ वो दोस्त भी उनसे उस स्तर पर नहीं जुड़ सके, जिस स्तर पर गोरख पांडेय स्वयं उनसे जुड़ाव महसूस करते थे। यह बात तब सामने आई जब गोरख पांडेय गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। यद्यपि नामुराद मानसिक बीमारी सीजोफ्रेनिया के लक्षण उनमें पहले से ही उभरने लगे थे, पर उनका इलाज तब शुरू हो पाया जब बीमारी चरम पर पहुंच गई। बीमारी के दौरान उसे गंभीरता से लेने की जगह उनका मजाक उड़ाने वाले ज़्यादा थे।
जिन लोगों की गोरख पांडेय ने हर स्तर पर लगातार मदद की थी, वो भी गाढ़े वक़्त में किनाराकशी करते नज़र आए। इससे गोरख पांडेय संभवत: भीतर से टूट गए।
बीमारी जब अंतिम अवस्था में पहुंची तो ऑल इंडिया ऑफ मेडिकल सांइसेस में उनका इलाज शुरू हुआ। बुलाने पर परिवार वाले भी आए, पर चंद दिनों के लिए। बहरहाल, लंबे इलाज के बाद गोरख पांडेय सामान्य हो गए थे। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होकर होस्टल लौट आए थे। पर अब कोई देखरेख करने वला नहीं था। रिसर्च प्रोग्रेस रिपोर्ट नहीं देने के कारण स्कॉलरशिप बंद हो चुकी थी। वह गहरे आर्थिक संकट में फंस चुके थे। उन्हें लंबे समय तक दवा खानी थी, पर दवाइयों के पैसे भी नहीं थे। एक समय जिन लोगों की उन्होंने खुले दिल से मदद की थी, वो झांकने भी नहीं आ रहे थे। जिस जनसंस्कृति मंच के वह महासचिव थे, उसके नेता, आइपीएफ के नेता कहां थे, कुछ पता नहीं था। दिल्ली का वामपंथी साहित्यिक समुदाय गोरख पांडेय की स्थिति से जानबूझकर बेख़बर था। सबसे बड़ी बात तो ये कि जिस व्यक्ति ने आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था, क्या उसके प्रति संगठन का कोई दायित्व नहीं बनता था? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे मुंह नहीं चुराया जा सकता। और अगर इसका जवाब देना हो तो कहा जा सकता है कि भारतीय वामपंथ की जो दुर्दशा हुई है और आज जिस प्रकार यह राजनीति से लेकर संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में हाशिए पर चला गया है, उसके पीछे वामपंथी संगठनों का अवसरवाद, सत्तलोलुपता और परमुखापेक्षिता ही है। जाहिर है, गोरख पांडेय जैसे सच्चे मनीषी और कवि के महत्व को वो कभी नहीं समझ सकते थे। वह उनका इस्तेमाल कर सकते थे, जो उन्होंने करने की कोशिश भी की, और जब उन्हें लगा कि वह उनके काम के नहीं रह गए तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। परिवार ने तो छोड़ ही रखा था, दोस्तों ने भी छोड़ दिया, और सबसे बढ़कर संगठन ने। यह संगठन अब उन्हें याद करने की रस्मअदायगी करता है।
पर यह भूला नहीं जा सकता कि हिंदी साहित्य के इतिहास में गोरख पांडेय का नाम अमिट है। राजनीतिक विचारधाराएं अपनी जगह हैं, पर साहित्य तो मनुष्य और मनुष्यता से जुड़ा है। इससे बड़ा सच और कोई नहीं। गोरख पांडेय की कविता उत्पीड़ित मनुष्य की आवाज़ बुलंद करती है। उनकी कविता आज़ादी का उद्घोष है, संघर्ष की रणभेरी है और उत्पीड़ित मनुष्यता की करुण पुकार ही नहीं, उसकी मुक्ति के लिए युद्ध का आह्वान है।
गोरख पांडेय लघुमानवों के कवि नहीं, सर्वहारा के कवि हैं, किसानो के कवि हैं, खेतों-खलिहानों में श्रमरत स्त्रियों की आवाज़ को सामने लाने वाले कवि हैं। गोरख पांडेय का कवि व्यक्तित्व विराट है। वह भारतेंदु, निराला, नागार्जुन और शमशेर बहादुर सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की परंपरा के कवि हैं। गोरख पांडेय के कृतित्व-व्यक्तित्व का मूल्यांकन इतिहास करेगा। फिलहाल, जो दौर है वह भटकाव और पतन का है। छद्म वाम पर गोरख पांडेय ने भी जम कर प्रहार किया था अपनी कविताओं के माध्यम से। लेकिन वह समय आएगा जब जनता का संघर्ष रंग लाएगा और सच्चे अर्थों में मनुष्यता की स्थापना होगी। युगो-युगों से चला आ रहा क्रांति का स्वप्न पूरा होगा। गोरख पांडेय स्वप्न और क्रांति के ही कवि हैं।      

21वीं सदी की सुबह आने से पहले ही जलता हुआ सवाल छोड़ कर चले गए गोरख पांडेय - मनोज कुमार झा



Monday, 16 January 2017

एक छोटे लड़के और छोटी लड़की की कहनी - संकलन-वीणा भाटिया

नए साल पर पाठकों को तोहफ़ा

वीणा भाटिया के सम्पादन में प्रकाशित इस संग्रह में शामिल लेखकों की ये कहानियाँ दुर्लभ हैं। संग्रह में शामिल सभी कहानियाँ अपनी-अपनी भाषाओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। इन कहानियों को पढ़ने का मतलब है विश्व साहित्य की क्लासिक परम्परा को जानना और समझना। इस संकलन के लिए वीणा भाटिया जी को बहुत-बहुत बधाई। गार्गी प्रकाशन को साधुवाद।

Monday, 31 October 2016

कुनबे में घमासान के साथ ही तय है सपा का पतन/मनोज कुमार झा

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले मुलायम के कुनबे में जो ड्रामेबाजी शुरू हुई है, उससे यह साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी का हाल क्या होने वाला है। पहले भी कहा जा रहा था कि मुलायम के कुनबे में सत्ता की बंदरबांट को लेकर अंदर ही अंदर घमासान चल रहा है, पर चुनाव के पहले यह सतह पर आ गया और देश भर में चर्चा का विषय बन गया। दरअसल, समाजवादी पार्टी का मतलब एक तरह से मुलायम का कुनबा ही रह गया है। गत लोकसभा चुनाव में सपा को उन्हीं सीटों पर जीत हासिल हुई, जिन पर मुलायम परिवार के सदस्य खड़े हुए थे। अन्य किसी सीट पर जीत नहीं मिली।


सभी जानते हैं कि मुलायम ने सपा को परिवारवाद की बुनियाद पर खड़ा किया है। सपा में जितने भी प्रमुख पद हैं, सब मुलायम के परिवार वालों के पास ही हैं। अब परिवार में भी धड़े और गुट बन गए और अंतर्कलह शुरू हो गया। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बन रही थी। इसके पीछे मुख्य बात यह लगती है कि मुलायम और सपा के अन्य कर्णधारों को यह समझ में आ गया है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ेगा, तो इसके लिए आखिर ठीकरा किस पर फोड़ा जाएगा। इसके साथ ही ढहते हुए वोट बैंक के चलते मुलायम और उनके सलाहकारों में बौखलाहट की स्थिति पैदा हो गई है। वे चाह रहे हैं कि किसी तरह कुछ ऐसे उपाय किए जाएं जिससे उनका वोट बैंक पूरी तरह तो न ढहे। इसलिए मुलायम ने पार्टी और सरकार में कुछ बदलाव करना चाहा।



भूलना नहीं होगा कि मुलायम समय-समय पर मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की भूमिका की आलोचना भी करते रहे हैं। अखिलेश की स्थिति ये है कि वे स्वतंत्र रूप से कुछ भी कर पाने में कभी समर्थ नहीं रहे। उन पर हमेशा मुलायम और अपने चाचा शिवपाल यादव का दबाव बना रहा। इस बीच, कुछ ऐसी बातें हुईं जिनका अखिलेश ने विरोध किया, जैसे मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का, जिसका शिवपाल समर्थन करते थे और मुलायम भी चाहते थे कि इस माफिया की मदद चुनाव जीतने में ली जाए। पर अखिलेश के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका। इस बीच, अखिलेश ने कुछ भ्रष्ट मंत्रियों को भी हटाया जो शिवपाल के गुट के थे। इससे सपा में खलबली मची और अखिलेश का विरोध शिवपाल ने किया। रस्साकशी चलने लगी। मुलायम ने अखिलेश के पर संगठन में कतर दिए तो बदले में अखिलेश ने शिवपाल से कई विभाग छीन लिए। इसके बाद सत्ता संघर्ष तेज हो गया। अखिलेश के खिलाफ साजिश में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना, उसका बेटा प्रतीक यादव भी शामिल बताए जाते हैं। कहा जा रहा है कि साधना चाहती है कि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार प्रतीक को घोषित किया जाए। मुलायम के बारे में बताया जाता है कि वे पूरी तरह से अपनी पत्नी, अमर सिंह और अपने भाई शिवपाल यादव के पक्ष में हैं। यही कारण है कि उन्होंने अखिलेश के विरुद्ध सार्वजनिक तौर पर कई बातें कही। बहरहाल, ऐसी खबरें मीडिया में चलीं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना ने अपने बेटे के लिए राजगद्दी और सौतेले बेटे अखिलेश के लिए वनवास मांगा है। लेकिन साधना के बेटे प्रतीक की कोई राजनीतिक पहचान है ही नहीं।  हालत तो ये है कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा की जीत की कोई संभवाना ही नज़र नहीं आती। ऐसे में, मुलायम के कुनबे में कलह के सामने आने से सपा का और भी नुकसान होगा, इसमें दो राय नहीं है। गायत्री प्रजापति जैसे भ्रष्ट मंत्री को जिसे अखिलेश ने हटा दिया था, शिवपाल के दबाव पर मुलायम ने फिर से मंत्री बनवाया। इससे बहुत गलत संदेश गया है। लोग ये समझ रहे हैं कि मुलायम पूरी तरह सत्ता के दलाल अमर सिंह के प्रभाव में हैं, जो काफी समय के बाद सपा में लौटा है। वह शुरू से ही अखिलेश का विरोधी रहा है, क्योंकि अखिलेश उसके हिसाब से नहीं चलते।


सपा में दो ध्रुव बन गए हैं। एक में मुलायम, शिवपाल और अमर सिंह हैं, दूसरे में रामगोपाल यादव और अखिलेश हैं। दोनों जोर-आजमाइश कर रहे हैं। यह कुनबे में सत्ता हासिल करने की लड़ाई है, जो एक तरह से व्यर्थ है, क्योंकि विधानसभा चुनाव परिणाम जब सामने आएगा तो यह कुनबा राजनीतिक शक्ति से शून्य हो जाएगा। यह अलग बात है कि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण इनके पास बेशुमार दौलत है, भरपूर काला धन है जिसे लेकर मुलायम को कभी भी जेल जाना पड़ सकता है। जेल जाने से बचने के लिए ही ये यूपीए सरकार के दौरान ये सोनिया के तलवे चाटते रहे और अभी भी मोदी-अमित शाह से मधुर संबंध बना के रखते हैं। ये जब भी मुख्यमंत्री रहे, इन्होंने खुल कर गुंडों और माफिया तत्वों को प्रश्रय दिया, अभी भी दे रहे हैं। इसका अखिलेश विरोध करते हैं तो उन पर दबाव डालते हैं। अखिलेश जानते हैं कि चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जनता को भरोसे में लेना होगा और अपराधियों पर लगाम कसने से जनता का भरोसा उन पर बढ़ेगा। पर यह बात शिवपाल को बुरी लगती है। सारी आमदनी का जरिया तो माफिया ही है। सत्ता में उसे भागीदारी नहीं देंगे तो काम कैसे चलेगा। भूलना नहीं होगा कि यूपी की सत्ता पर लंबे समय से माफिया का नियंत्रण रहता आया है। चाहे सरकार बसपा की रही हो, भाजपा की या सपा की। बसपा-भाजपा गठबंधन सरकार में सत्ता पर पूरी तरह माफिया हावी था और यह साझे में लूट के लिए बना था, पर बाद में मायावती ने भाजपा को अंगूठा दिखा दिया था। जब बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो उसे गुंडा राज कहा जाने लगा। लेकिन मुलायम की छत्रछाया में बनी अखिलेश सरकार को महागुंडा राज कहा गया। यानी सत्ता में कोई भी दल आए, असली बात यही है कि माफिया ही राज करेगा। अब किसका माफिया करेगा, किसका हित साधेगा, लड़ाई इस बात को लेकर है। फिर भी मुलायम के कुनबे में जो संघर्ष चला है और जैसी छीछालेदर हुई है, उससे यह बहुत साफ हो गया है कि जब एक पर्टी के स्वामित्व वाले दल में इतनी गुटबाजी है, तो अन्य दलों की स्थिति क्या होगी जिनका अस्तित्व ही गुटों पर आधारित है। कांग्रेस भी एक परिवार की पार्टी है, पर वहाँ सत्ता की दावेदारी के लिए सड़कों पर ऐसा संघर्ष हो, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसकी वजह सिर्फ यही है कि परिवार में सत्ता का कोई दूसरा दावेदार ही नहीं है एक को छोड़ कर।


बहरहाल,  मुलायम के कुनबे में हुए वर्चस्व के इस संघर्ष ने साबित कर दिया है कि ये क्षेत्रीय दल किस हद तक पतन के गर्त में जा चुके हैं। इन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि इनके पाँवों तले ज़मीन खिसकती जा रही है, पर सत्ता के नशे में बदमस्त हो कर ये सुध-बुध खो बैठे हैं। मुलायम ने अपने जन्मोत्सवों और सैफई महोत्सवों से जो नाम कमाया है, वह उन्हें डुबोने के लिए काफी है। धनलिप्सा और तरह-तरह के कुटैब से घिरा ये शख्स अमर सिंह के चंगुल में इसीलिए फंसता है, क्योंकि वह इसे ब्लैकमेल करता है। वह परले दर्जे का दलाल है और उसकी सांठगांठ कई दलों के नेताओं से है। उसने मुलायम की कमजोर नस पकड़ रखी है और उसका फायदा उठा रहा है। ऐसे में, सपा का भविष्य क्या होने जा रहा है, यह समझा जा सकता है। यूपी के मतदाताओं का भरोसा सपा पर नहीं रहा, लेकिन कहा जा रहा है कि मतदाताओं के एक वर्ग में अखिलेश के प्रति सहानुभूति का भाव भी उमड़ रहा है। अब इसका कितना फायदा अखिलेश को मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। वैसे तमाम उटापठक के बाद मुलायम इस बात पर राजी हो गए हैं कि संगठन में प्रमुख शिवपाल रहेंगे और मुख्यमंत्री पद का चेहरा अखिलेश बनेंगे। लेकिन दोनों में विश्वास की कमी इतनी ज्यादा हो गई है कि कब फिर कैसा विवाद और झगड़ा सामने आ जाएगा, कहा नहीं जा सकता।


कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मुलायम के कुनबे में हुई इस कलह का फायदा भाजपा को मिलेगा तो कुछ कहते हैं कि इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। यहाँ यह देखना जरूरी है कि अगर यह सपा में यह ड्रामेबाजी नहीं होती तो क्या उसे फायदा मिलने जा रहा था। क्या वह यूपी में सरकार बनाने की दावेदार पार्टी के रूप में थी? कहा जा सकता है कि ऐसा कभी नहीं था। यूपी की जनता मुलायम-अखिलेश के शासन से परेशान हो चुकी है, गुंडों, माफिया और बलात्कारियों का आतंक चरम पर है। मुलायम-अखिलेश जनता को लॉलीपॉप दिखाते हैं। करोड़ों की लगात से अपने लिए पांच सितारा ऑफिस बना कर उसे अपने शासन की उपलब्धि बताते हैं। जनता के पास विकल्प की कमी है, पर इसका मतलब ये नहीं कि वह बेवकूफ है। तमाम दल के नेता जनता को यानी वोटरों को बेवकूफ मान कर ही चलते हैं। यूपी के वोटरों का मुलायम-अखिलेश सरकार से इस कदर मोहभंग हो गया है कि मुलायम कुनबे में वर्चस्व का यह विवाद सामने नहीं भी आता तो भी उसे जाना ही था। अगले विधानसभा चुनाव में सपा का सूपड़ा साफ होना है। जीत किसे मिलती है, यह अलग बात है। भाजपा किसी खुशफहमी में न रहे, क्योंकि मोदी जी के भाषणों और अमित शाह की कुटिल चालों से जनता परेशान हो गई है। कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाएं तो मिल जाएं, पर वह सरकार बनाएगी, इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस की खटिया लूटी जा चुकी है यूपी में। अब यह पार्टी पूरी तरह बेदम हो चुकी है। सवाल है, फिर सरकार किसकी बनेगी। बार-बार धोखा खाने वाली जनता ही इसका जवाब समय पर दे देगी। उसके पास विकल्प है नहीं। विकल्पहीनता की स्थिति में आत्मघात की स्थितियाँ ही बनती हैं।