Saturday, 22 August 2015

ख़बर



- मनोज कुमार झा

आपके सामने
जो ख़बर है
दरअसल ख़बर वो नहीं है
ख़बर छुपा ली गई है
बड़ी सफ़ाई से
आपको चंद हवाले
दे दिए गए
आप आंकड़ों में
उलझ गए
वो ख़बर
छप नहीं सकती
वो दुर्घटना में मौत
हत्या
बलात्कार और दंगे की
ख़बर नहीं
वो मंगल पर यान पहुंचने की
प्रधानमंत्री का दसलखिया सूट
करोड़ों में नीलाम होने की
ख़बर नहीं है
वो ख़बर किसी को
फांसी पर लटकाने की भी
नहीं है
वो तो बड़ी संगीन
ख़बर है
इतनी कि किसी अख़बार में
छप नहीं सकती
वो हमारे या आपके
होने या न होने से
शायद ताल्लुक रखती है।

Friday, 21 August 2015

कहां है कोई जगह

- मनोज कुमार झा

कहां है कोई जगह
तुमसे मिलने की
कम होती जा
रही है
हर जगह
जहां किसी भी तरह
हो सके मिलना
जैसे इस मौसम में ही
कोई खोट है
तो हमारा मिलना
बहुत ही मुश्किल है
जैसे प्रकृति में
तुम्हारा बचपन है
कभी सुनाई पड़ जाता है
तो फ़िर कुछ
लालसाएं भी
उमड़ने लगती हैं
पर पल में
सब निरर्थक
लगता है
समय किसी
प्रलाप की तरह
निरंतर जारी रहता है
तो फ़िर
कहीं कोई
जगह नहीं
तुमसे मिलने की।


Sunday, 26 July 2015

सांप्रदायिक चुनौती और बिहार विधानसभा चुनाव

 -  मनोज कुमार झा/ वीणा भाटिया

भगवा चुनौती का मुकाबला करने के लिए जनता परिवार ने महाविलय की घोषणा की थी, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया। यह अलग बात है कि राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को नेता माना है, लेकिन जब गठबंधन बन ही नहीं पाया तो यह सिर्फ कहने की ही बात रह गई है। अक्टूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। इस चुनाव में भाजपा का मुकाबला करने के लिए जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का गठबंधन हो चुका है। वामपंथी दल नीतीश-लालू का समर्थन करेंगे, यह पहले से जाहिर है। इधर, जीतन राम मांझी को भाजपा ने अपने पाले में ले लिया है। अब ये अलग बात है कि मांझी भाजपा को किस हद तक फायदा पहुंचा सकेंगे। कुल मिलाकर, बिहार में भाजपा की स्थिति कमजोर दिखाई पड़ती है।

लोकसभा चुनाव में भले ही भाजपा ने जदयू और राजद को पछाड़ दिया, लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। लालू प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया है, लेकिन बिहार में भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जिसे वह नीतीश कुमार के मुकाबले सामने ला सके। ऐसे में, भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे ही बिहार विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है, पर मोदी का प्रभाव अब पहले जैसा रह नहीं गया है। नरेंद्र मोदी को आगे कर विधानसभा चुनाव में उतरने के पीछे भाजपा का तर्क ये है कि जिन राज्यों में उसने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की पहले घोषणा नहीं की, वहां उसे जीत मिली। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड, लेकिन जहां पहले से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा कर दी, वहां हार मिली, उदाहरण के लिए दिल्ली।

इस वर्ष बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव भाजपा के लिए काफी मायने रखते हैं। साथ ही, ये वो राज्य हैं जहां जीत हासिल कर पाना भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। जब तक इन राज्यों में भाजपा को सत्ता नहीं मिलती, वह भले ही केंद्र की सत्ता में बनी रहे, पर उसकी स्थिति बहुत मजबूत नहीं रह सकती। बिहार विधानसभा चुनाव में जो समीकरण सामने आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए भाजपा के लिए जीत दर्ज कर पाना संभव नहीं लगता। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में काफी वक्त है, तब तक नए समीकरण उभर सकते हैं और नए गठबंधन भी बन सकते हैं। बहरहाल, ऐसा लगता है कि जनता परिवार के घटक दलों ने महाविलय की जो घोषणा की थी, उसके कामयाब नहीं हो पाने के बावजूद जदयू-राजद का गठबंधन कांग्रेस और वामदलों के सहयोग से चुनाव में जीत हासिल कर सकता है।


उल्लेखनीय है कि भगवा की जीत और मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही नीतीश कुमार और मुलायम सिंह जैसे नेताओं को अपनी सत्ता के लिए चुनौती साफ दिखाई पड़ने लगी। भाजपा ने जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद को उम्मीदवार घोषित किया, तभी नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ले अपना नाता तोड़ लिया। इसकी वजह यह थी कि मोदी की छवि कट्टरपंथी सांप्रदायिक नेता की रही है और गुजरात दंगों के लिए उन्हें भाजपा के दिग्गज नेताओं की आलोचना का सामना भी करना पड़ा था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राजधर्मका पालन करने की नसीहत उन्हें दी थी। यह भी नहीं भूलना होगा कि लालकृष्ण आडवाणी से लेकर भाजपा के और भी कई दिग्गज नेता नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के खिलाफ थे, पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आगे किसी की नहीं चल पाई। इसके साथ ही अमित शाह को भाजपा का अध्यक्ष बना दिया गया। इससे राजग के घटक दलों की तो छोड़ें, भाजपा में भी असंतोष गहरा गया जो अभी भी सुलग रहा है और समय आते ही भड़क सकता है। इस लिहाज से नीतीश कुमार ने राजग से अलग होकर जनता को यह संदेश दिया कि वह उग्र हिंदूवादी तत्वों के विरुद्ध हैं। 

लोकसभा चुनाव में जदयू की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने इस्तीफा भी दे दिया, पर जिस जीतन राम मांझी को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद पर बैठाया, उन्होंने एक के बाद एक उलटे-सीधे बयान देकर बहुत ही अगंभीरता और गैरजिम्मेदारी का परिचय दिया। उनकी गतिविधियों ने नीतीश कुमार को बहुत ही परेशानी में डाल दिया। आखिरकार, खुद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी फिर से संभाल कर नीतीश कुमार ने एक सही कदम उठाया, क्योंकि चुनावों के दौरान जीतन राम मांझी बहुत नुकसान पहुंचा सकते थे। मांझी की महत्त्वाकांक्षा मुख्यमंत्री पद पाकर बेलगाम हो चुकी थी और जिस पेड़ की डाल पर वह बैठे थे, उसकी ही जड़ खोदनी शुरू कर दी थी। अब भाजपा से गठबंधन कर उन्होंने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। 


जहां तक जनता परिवार के दलों के महाविलय का सवाल था, तो यह अभी भी मौजू है। उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह बहुत पहले से ही गैरभाजपा और गैरकांग्रेसवाद के आधार पर इस तरह का एक महागठबंधन बनाने का प्रयास कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने काफी कोशिश की, पर कतिपय दलों और नेताओं के उत्साह नहीं दिखा पाने के कारण कारण उनकी योजना मूर्त रूप नहीं ले सकी। इसके बाद भगवा चुनौती का सामना करने के लिए उन्होंने और नीतीश कुमार, लालू यादव जैसे नेताओं ने जनता परिवार के महाविलय की घोषणा की। इनका कहना था कि जनता परिवार के अलग-अलग दलों का विलय इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि मोदी देश में सर्वसत्तावादी नीतियां चलाने की कोशिश कर रहे हैं। सांप्रदायिकता से लड़ना भी इसका मुख्य उद्देश्य बताया गया।


भूलना नहीं होगा कि सबसे पहले जनता पार्टी का गठन इंदिरा गांधी की सर्वसत्तावादी प्रवृत्तियों के ही ख़िलाफ़ हुआ था। उस समय इमरजेंसी से त्रस्त देश की जनता ने जनता पार्टी को भारी बहुमत से जीत दिलाई, ये अलग बात है कि अंतर्विरोधों के कारण जनता पार्टी में जल्दी ही बिखराव हो गया। इसके बाद, राजीव गांधी जब बोफोर्स घोटाले में फंसे तो भ्रष्टाचार विरोध के मसीहा बन कर उभरे उन्हीं के मंत्रिमंडल में शामिल विश्वनाथ प्रताप सिंह। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जो जनमोर्चा बनाया। उसमें जनता पार्टी के बहुतेरे घटक दल शामिल हो गए। लेकिन तब तक जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी के रूप में नया अवतार ले लिया था। कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से उबी हुई जनता ने कांग्रेस को चुनाव में हरा दिया और वी पी सिंह के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी। यही वह दौर था जब अयोध्या में राममंदिर का आंदोलन और सांप्रदायिक उन्माद फैला कर भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ाई थी।


आज केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के साथ एक बार फिर से सर्वसत्तावादी ताकतें सिर उठा रही हैं। यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए बहुत बड़ा खतरा है। बिहार में होने वाला चुनाव इस बात को तय करेगा कि देश में सर्वसत्तावादी ताकतों को चुनौती मिलती है या नहीं। यह भूलना नहीं होगा कि भाजपा में सत्ता के केंद्र से दूर कर दिए गए लालकृष्ण आडवाणी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि देश में फिर से इमरजेंसी लग सकती है। यह एक भयावह संकेत है। नीतीश कुमार की छवि एक ईमानदार और जनपक्षधर नेता की रही है। जहां तक लालू प्रसाद का  का सवाल है, भले ही उन पर जितने आरोप लगे हों, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में भाजपा को सत्ता से दूर रखने में उनकी बहुत बड़ी भूमिका रही है। आडवाणी के रामरथ को रोककर उन्होंने सांप्रदायिक तत्वों को खुली चुनौती दी थी। फिलहाल, नीतीश और लालू का एक साथ आना देश में लोकतांत्रिक ढांचे को बनाए रखने के लिए जरूरी हो गया था। आज की मुख्य चुनौती सांप्रदायिक ताकतों को आगे बढ़ने से रोकने की है। बिहार को ही अब इस चुनौती का सामना करना है।   
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Saturday, 20 June 2015

स्वर्ग से विदाई


 - गोरख पांडेय

भाइयो और बहनों!
अब यह आलीशान इमारत
बनकर तैयार हो गई है
अब आप यहां से जा सकते हैं।
अपनी भरपूर ताकत लागकर,
आपने मिट्टी काटी, गहरी नींव डाली,
मिट्टी के नीचे दब भी गए
आपके कई साथी।
मगर आपने हिम्मत से काम लिया,
पत्थर और इरादे से,
संकल्प और लोहे से,
बालू, कल्पना और सीमेंट से
ईंट-दर-ईंट आपने,
अटूट बुलंदी की दीवारें खड़ी की।
छत ऐसी कि वहां से हाथ बढ़ाकर,
आसमान छुआ जा सके।
और खिड़कियां –
क्षितिज की थाह लेने वाली आंखों
जैसी,
दरवाजे – शानदार स्वागत!
अपने घुटनों, बाजुओं और
बरौनियों के बल पर आपने
सैकड़ों साल टिकी रहने वाली
यह जीती जागती इमारत तैयार की।
अब आपने हरा-भरा लॉन,
फूलों का बगीचा,
झरना और ताल भी बना दिया है।
और कदम-कदम पर
रंग-बिरंगी रोशनी फैला दी है।
गर्मी में ठंडक और ठंड में
गुनगुनी गर्मी का इंतजाम कर दिया है।
संगीत और नृत्य के साज सामान
सही जगह पर रख दिए हैं।
अलगनियां, प्यालियां,
गिलास और बोतलें सजा दी हैं।
कम शब्दों में कहें तो
सुख-सुविधा और आजादी का एक सुरक्षित इलाका
एक झिलमिलाता स्वर्ग रच दिया है।
इस मेहनत और इस लगन के लिए
आपको बहुत-बहुत धन्यवाद,
अब आप यहां से जा सकते हैं।

यह मत पूछिए कि कहां जाएं,
जहां चाहें वहां जाएं
फिलहाल, उस अंधेरे में
कटी जमीन पर
जो झोंपड़े डाल रखे हैं
उन्हें भी खाली कर दें।
फिर जहां चाहें वहां जाएं।
आप आजाद हैं
हमारी जिम्मेवारी खत्म हुई
अब एक मिनट के लिए भी
आपका यहां ठहरना ठीक नहीं,
महामहिम आने वाले हैं
विदेशी मेहमानों के साथ।
आने वाली हैं अप्सराएं,
और अफसरान।
पश्चिमी धुनों पर शुरू होने वाला है
उन्मादक नृत्य।
जाम छलकने वाला है
भला आपकी यहां क्या जरूरत हो सकती है?
और वे आपको यहां देखकर क्या सोचेंगे?
गंदे कपड़े और धूल में सने शरीर
ठीक से बोलने, हाथ हिलाने का भी शऊर नहीं।
उनकी रुचि और उम्मीद को
कितना धक्का लगेगा
और हमारी कितनी तौहीन होगी।

मान लिया कि इमारत को
यह शानदार बुलंदी हासिल कराने में
आपने अपनी हड्डियां तक गला दीं,
खून पसीना एक कर दिया,
परंतु इसके एवज में
मजूरी दी जा चुकी है
मुंह मीठा करा दिया है
धन्यवाद भी दे चुके हैं
अब आपको क्या चाहिए?
आप यहां से टल नहीं रहे हैं
आपको चेहरे के भाव भी बदल रहे हैं।
शायद अपनी इस विशाल और खूबसूरत रचना से,
आपको मोह हो गया है
इसे छोड़कर जाने में दुख हो रहा है।
ऐसा हो सकता है!
मगर इसका मतलब यह तो नहीं
कि आप जो कुछ भी अपने हाथों से बनाएंगे,
वह सब आपका हो जाएगा।
इस तरह तो यह सारी दुनिया आपकी होती,
फिर हम मालिक लोग कहां जाते।

याद रखिए
मालिक, मालिक होता है
मजदूर, मजदूर।
आपको काम करना है
हमें उसका फल भोगना है
आपको स्वर्ग बनाना है
हमें उसमें विहार करना है।
अगर ऐसा सोचते हैं
कि आपको अपने काम का
पूरा फल मिलना चाहिए,
तो हो सकता है
कि पिछले जन्मों के आपके काम,
आपको अभावों के नरक में ले जा रहे हों।
विश्वास कीजिए
धर्म के सिवा कोई रास्ता नहीं,
अब आप यहां से जा सकते हैं।

क्या आप यहां से जाना ही नहीं चाहते?
यहीं रहना चाहते हैं
इस आलीशान इमारत में,
इन गलीचों पर पांव रखना चाहते हैं,
ओह! यह तो लालच की हद है,
सरासर अन्याय है।
कानून और व्यवस्था पर सीधा हमला है।
दूसरों की मिल्कियत पर कब्जा करने
और दुनिया को उलट देने का
सबसे बुनियादी अपराध है।
हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे
देखिए, यह भाईचारे का मसला नहीं है।
इंसानियत का भी नहीं,
यह तो लड़ाई का
जीने या मरने का मसला है।
हालांकि हम खून-खराबा नहीं चाहते
हम अमन-चैन, सुख-सुविधा पसंद करते हैं।
लेकिन अगर आप मजबूर करेंगे,
तो हमें कानून का सहारा लेना पड़ेगा
पुलिस, और जरूरत पड़ी तो
फौज को भी बुलाना पड़ेगा।
हम कुचल देंगे,
अपने हाथों गढ़े,
इस स्वर्ग में रहने की
आपकी इच्छा भी कुचल देंगे,
वर्ना जाइए,
टूटते जोड़ों, उजाड़ आंखों की,
आंधियों, अंधेरों और सिसकियों की,
मृत्यु, गुलामी और अभावों की अपनी
बे-दरो-दीवार दुनिया में
चुपचाप, वापस चले जाइए।  


Wednesday, 10 June 2015

प्रेम

- शमशेर बहादुर सिंह


द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
रूप नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूं प्यार
सांसारिक व्यवहार न ज्ञान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
शक्ति न यौवन पर अभिमान
फिर भी मैं करता हूं प्यार
कुशल कलाविद् हूं न प्रवीण
फिर भी मैं करता हूं प्यार
केवल भावुक दीन मलीन
फिर भी मैं करता हूं प्यार।

मैंने कितने किए उपाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब विधि था जीवन असहाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब कुछ साधा, जप, तप, मौन,
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
कितना घूमा देश विदेश
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
तरह-तरह के बदले वेष
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम।

उसकी बात बात में छल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
माया ही उसका संबल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह वियोग का बादल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
छाया जीवन आकुल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
केवल कोमल, अस्थिर नभ-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह अंतिम भय-सी, विस्मय-सी
फिर भी कितनी अनुपम सुंदर। 

Friday, 23 January 2015

दिल्ली में मोदी को केजरीवाल की कड़ी चुनौती


-मनोज कुमार झा

दिल्ली में चुनाव का दंगल शुरू हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी की पूरी कोशिश है कि किसी भी तरह से दिल्ली की सत्ता पर कब्ज़ा करे। पिछली बार भाजपा को इसमें सफलता नहीं मिली थी। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। यह कांग्रेस और भाजपा के लिए बहुत बड़ी शिकस्त थी, क्योंकि आम आदमी पार्टी एक नए तरह के आंदोलन की उपज थी और परंपरागत पार्टियों से बहुत कुछ अलग थी। लेकिन लोकपाल बिल पास न होने के कारण अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों के बाद ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और तब से वहां राष्ट्रपति शासन चल रहा है। अब 17 फरवरी तक वहां नई सरकार का गठन होना है। दिल्ली की सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच है। यह सीधा मुकाबला है। अन्य कोई दल इस मुकाबले में शामिल नहीं है।

चुनाव पूर्व कई सर्वेक्षणों में यह जाहिर हो चुका है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली के वोटरों की पहली पसंद बने हुए हैं। अरविंद केजरीवाल गंदगी का पर्याय बन चुकी भारतीय राजनीति में ताजी हवा के झोंके की तरह आए थे। इन्हें बुद्धिजीवियों के अलावा ग़रीब तबकों का भी पूरा समर्थन मिला था और इसी समर्थन का बदौलत वो सत्ता हासिल कर पाने सफल रहे। अरविंद केजरीवाल ने एक नई तरह की राजनीति की शुरुआत की थी। बड़े कॉरपोरेट घरानों को उन्होंने सीधा निशाना बनाया और शासन-प्रशासन के कुछ ऐसे तौर-तरीके अपनाए जो पहले कभी देखने-सुनने को नहीं मिले थे। जाहिर है, सत्ता के वर्तमान ढांचे में अरविंद केजरीवाल फिट होने वाले नहीं थे। वर्तमान सत्ता पूंजीपतियों के समर्थन और सहयोग के बिना नहीं चल सकती। पूंजीपति ही वर्तमान सत्ता के ढांचे की चालक शक्ति हैं। यह बात शायद अरविंद केजरीवाल की समझ में आ गई है। जाहिर है, वे वर्तमान सत्ता का ऐसा विकल्प तो हर्गिज नहीं बन सकते जो जनहित के मुद्दों पर आधारित हो, जो जनता को उसके कष्टों से छुटकारा दिला सके, उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सके। यह काम तो तभी हो सकता है, जब व्यापक जनक्रांति हो जिसके आसार दूर-दूर तक नहीं नज़र आते। तो क्या माना जाए कि अरविंद केजरीवाल अन्य पूंजीवादी दलों के नेताओं की तरह ही हैं? पूरी तरह यह कहना उचित नहीं होगा।

दरअसल, अरविंद केजरीवाल इस सड़ांध मार रहे सिस्टम में सुधार के पैरोकार हैं और जनता लुटेरे नेताओं से आजिज आ गई है। वह राहत चाहती है। अरविंद केजरीवाल में उसे राहत मिलने की उम्मीद दिखती है। तमाम दलों के नेताओं के साथ मीडिया भी अरविंद केजरीवाल का मजाक उड़ाने में आगे रहा है, क्योंकि वह सुधार तक नहीं चाहता। अगर जनक्रांति नहीं तो सुधार ही सही। जरूरत तो है इसकी। पर विडंबना ये है कि वर्तमान व्यवस्था सुधार के काबिल भी नहीं रह गई है। लेकिन जनता को राहत की इतनी ज़्यादा दरकार है कि वह अरविंद केजरीवाल के समर्थन में है। यह अलग बात है कि उन्हें जीत मिलती है या नहीं, पर भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती तो वे बन ही गए हैं।

लोकसभा चुनाव के दौरान देश में नरेंद्र मोदी की लहर चल रही थी। अरविंद केजरीवाल ने बनारस में उनके खिलाफ़ चुनाव लड़कर उन्हें चुनौती दी। उनका हारना तय था, पर चुनौती देना भी कम मायने नहीं रखता। इसलिए अरविंद केजरीवाल भले ही लोकसभा चुनाव में कोई उपलब्धि हासिल नहीं कर सके, लेकिन उन्होंने चुनौती देने की हिम्मत तो दिखाई। बहरहाल, लोकसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने के बाद से नरेंद्र मोदी अपनी तथाकथित हवा के बल पर लगातार चुनाव जीतते चले जा रहे हैं, यानी भाजपा चुनाव जीतती चली जा रही है। उसे आशातीत सफलता मिल रही है। लेकिन साथ ही, देश में जैसा माहौल बनता जा रहा है, उससे ज़्यादा लोग असंतुष्ट ही नज़र आते हैं। इसकी वजह है कि जो वायदे नरेंद्र मोदी ने जनता से किए थे, उनमें एक भी पूरा नहीं हुआ। इसके विपरीत पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संघ परिवार के संगठनों ने खुले तौर पर साम्प्रदायिक माहौल बनाना शुरू कर दिया। संघ और अन्य भगवा संगठनों के ऐसे-ऐसे बयान लगातार आते रहे हैं, जो बहुत ही आपत्तिजनक हैं, पर उन पर कोई लगाम लगाने वाला नहीं। भूलना नहीं होगा कि विकल्पहीनता के शून्य के बीच और साम्प्रदायिक समीकरणों की बदौलत नरेंद्र मोदी सत्ता में आ सके। इसके अलावा, देशी-विदेशी पूंजीपतियों का पूरा समर्थन उन्हें मिला। पूंजीपतियों ने उनके लिए अपनी थैलियां खोल दी। पर तय है कि अर्थव्यवस्था संकट के जिस भंवर में पड़ चुकी है, उससे लाख खुलेपन की नीतियां अपनाने के बावजूद निकल पाना संभव नहीं। लूट को चरम सीमा पर पहुंचाने के बावजूद नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सकते। लेकिन क्या कोई विकल्प है? विकल्प नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर केजरीवाल नरेंद्र मोदी के विकल्प बनेंगे या इनके जैसे सुधारवादी? संभव नहीं। फ़िर भी ये कम नहीं कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली में भाजपा के लिए चुनौती पेश कर रहे हैं। इन्होंने कम से कम यह तो दिखा दिया है कि अभी भी दिल्ली में भारी संख्या में लोग उनके पीछे हैं और वे बदलाव चाहते हैं। दूसरी तरफ, कांग्रेस हो या जनता परिवार के रूप में संगठित होने की कोशिश में लगे अन्य दल, कोई दिल्ली में नरेंद्र मोदी के मुकाबले अपने को कहीं नहीं पा रहा है।

 इससे जाहिर होता है कि केजरीवाल टाइप सुधारवादी राजनीति की जरूरत देश में है और इस तरह के सुधारवादी संगठन काफी हद तक राजनीतिक रूप से सफल हो सकते हैं। यही मूलभूत बदलाव की पूर्व-पीठिका तैयार कर सकते हैं। इस रूप में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता।

इसे आम आदमी पार्टी का प्रभाव ही कहेंगे कि भाजपा दिल्ली में नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव नहीं लड़ रही। भगवा पार्टी को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा। उसने रातोंरात एक समय केजरीवाल की सहयोगी रही पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को पार्टी में शामिल किया और उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया। यह दिखाता है कि मोदी को ख़ुद अब अपनी लहर पर यकीन नहीं रह गया है। भूलना नहीं होगा कि जम्मू-कश्मीर में मोदी-अमित शाह का मिशन फेल हो गया, फिर भी वहां उल्लेखनीय सफलता उन्हें मिली है। झारखंड में भाजपा को बहुमत मिल गया। बिहार, यूपी और बंगाल अगला निशाना है। वहां कमजोर दलों और नेताओं को देखते हुए सफलता मिलने की पूरी उम्मीद है भाजपा को, पर दिल्ली में अलग ही कहानी लिखी जा रही है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। दिल्ली में मोदी-अमित शाह को गेम प्लान चेंज करना पड़ा। इसी के तहत अरविंद केजरीवाल क मुकाबले किरण बेदी को खड़ा किया गया है, जो एक समय उनके साथ थीं। साथ ही, अरविंद केजरीवाल की पुरानी सहयोगी शाजिया इल्मी को भी भाजपा में लाया गया। असंतुष्ट विनोद कुमार बिन्नी और कांग्रेस से कृष्णा तीरथ को भाजपा ने अपने पाले में ले लिया। यह सब इसलिए किया जा रहा है, ताकि किसी तरह आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल को हराया जा सके। पर मुकाबला कड़ा है। यह ठीक है कि अरविंद केजरीवाल ने कई ग़लतियां की हैं और अपने इर्द-गिर्द कई ऐसे लोगों को जमा कर लिया जो उनके लिए घातक साबित हुए। शाजिया और बिन्नी ने तो साफ रंग दिखा दिया, पर कवि कुमार विश्वास भी उन्हें अपना असली रंग दिखा कर रहेंगे, ये अलग बात है कि इस भड़ैत पर अरविंद केजरीवाल को अभी भी भरोसा है। ऐसे ही तत्वों ने उनका नुकसान किया है और यदि वे संभलते नहीं तो ये आगे भी उनका नुकसान ही करेंगे।

बहरहाल, दिल्ली विधानसभा का चुनाव यह तय कर देगा कि भाजपा का आने वाले दिनों में क्या होगा। यह बात खास है कि दिल्ली भाजपा में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो किरण बेदी को दिल्ली मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाने से खफा हैं। अमित शाह के प्रति असंतोष भाजपा में पनप रहा है। अगर उनका गेम प्लान फेल होता है, तो असंतोष खुल कर सामने आ जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि संघ के भी कतिपय नेता किरण बेदी को सीएम कैंडिडेट घोषित करने से नाराज हैं। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि संघ चाहता है कि मुख्यमंत्री संघ परिवार का ही हो, बाहर से न लाया जाए, जैसा महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में हुआ। इन तीनों राज्यों के मुख्यमंत्री संघ से जुड़े रहे हैं।

कहा जा रहा है कि किरण बेदी को सामने लाने के पीछे अमित शाह की मंशा ये है कि अगर जीत हो तो इसका श्रेय मोदी और उन्हें मिले, वहीं हार की स्थिति में इसका ठीकरा किरण बेदी के माथे पर फोड़ा जाए। किरण बेदी तो पर्चा दाखिल करते ही खुद को मुख्यमंत्री मानकर ही चल रही हैं। ग़ज़ब का आत्मविश्वास है उनका। पर यह बात ध्यान मंे रहनी चाहिए कि अति आत्मविश्वास खतरनाक भी होता है। भाजपा तो उनका इस्तेमाल कर रही है। कामयाब हुईं तो ठीक, नहीं हुईं तो डस्टबिन में डाल दी जाएंगी। पुलिसगीरी और राजनीति में क्या फर्क है, ये किरण बेदी को शायद अभी पता नहीं, पर अरविंद केजरीवाल काफी हद तक राजनीति सीख चुके हैं। तभी तो वोटरों से ये कह रहे हैं कि पैसे सभी से ले लो, पर वोट उन्हें ही दो। यानी पूंजीवादी राजनीति के तिकड़म करने से भी वे बाज नहीं आ रहे। कहा जा सकता है कि जब सभी चड्ढी तक उतार रहे हैं तो वो बनियान भी न उतारें। यही तो अरविंद केजरीवाल की सीमा है। पर जनता को इससे क्या! उसे थोड़ी राहत चाहिए। जनकवि बाबा नागार्जुन की काव्य पंक्तियां है –
ना हम दक्षिण ना हम वाम, जनता को रोटी से काम।

तो जनता को बदलाव चाहिए। अगर दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल भाजपा को हरा पाने में कामयाब हो पाते हैं तो यह उनकी एक बड़ी उपलब्धि होगी और निस्संदेह इसका असर देश की राजनीति पर भी पड़ेगा। मोदी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की असली परीक्षा है दिल्ली विधानसभा चुनाव। संघ का विश्वास जीतने के लिए किरण बेदी उसे राष्ट्रवादी संगठन बता रही हैं, पर भूलना नहीं होगा कि पहले उन्होंने संघ के खिलाफ कैसी टिप्पणियां की हैं। यही हाल शाजिया का रहा है। रहे कवि कुमार विश्वास तो वे तो पहले से ही अटल के प्रशंसक रहे हैं। अरविंद केजरीवाल को उनसे सावधान रहने की जरूरत है। मौका आने पर यह आदमी किसी भी तरह का समझौता कर सकता है।

खास बात है कि अरविंद केजरीवाल जनता परिवार के रूप में एकजुट होने की कोशिश कर रहे राजनीतिक दलों से दूरी बना कर चल रहे हैं और ये दल भी दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने लिए कहीं कोई जगह तलाश नहीं कर पा रहे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ये संघ और मोदी की चुनौती का सामना नहीं कर सकते। इनके दिन भी लगता है कांग्रेस की तरह ही लद गए। अब अगर दिल्ली में भाजपा की जीत होती है, तो अन्य राज्यों में उसकी विजय का मार्ग प्रशस्त होगा। अगर अरविंद केजरीवाल जीतते हैं, तो भाजपा और संघ को नई चालें चलनी पड़ेंगी। जो भी हो, खोखले वायदे कर और जनता को सब्ज़बाग दिखा सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी के प्रति जनता में असंतोष तो है ही, यह विस्फोटक रूप ले सकता है यदि दिल्ली की सत्ता अरविंद केजरीवाल के हाथ आती है।