नरेंद्र मोदी (आरएसएस) सरकार के दो वर्ष
पूरे हो गए। अब तीन वर्ष और बाकी हैं। ये तीन वर्ष कैसे बीतेंगे और इस दौरान मोदी
सरकार क्या-क्या कहर बरपाएगी, यह सोच कर लोग परेशान हैं। चंद आरएसएस समर्थकों को
छोड़ कर प्राय: लोगों का यही मानना
है कि यह सरकार कांग्रेसी नेतृत्व वाली सरकार से भी कई गुना खराब है और इसका सत्ता
में आना बहुत बुरा साबित हुआ है। पर अब कर क्या सकते हैं रोने के सिवा। मोदी ने
अपना एक वादा भी पूरा नहीं किया। उलटे, उन्होंने अर्थव्यवस्था को बेलगाम छोड़ दिया,
जिसका खामियाजा लोगों को लगातार बढ़ती महंगाई के रूप में भुगतना पड़ रहा है। मोदी
सरकार की हर नीति दिवालिया है। अर्थव्यवस्था से लेकर विदेश नीति तक यह कांग्रेस की
नीतियों को ही लागू कर रही है, पर और भी भद्दे तरीके से।
कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था
को बाजार के हवाले किया, पर उसकी गति धीमी थी। राजीव गांधी से शुरू हुई यह
प्रक्रिया नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के शासन के दौरान परवान चढ़ी, लेकिन मोदी जी
की खासियत ये है कि इन्होंने अपनी सरकार को ही बाजार के हवाले कर दिया। इनकी सरकार
अंबानी-अडानी चला रहा है। कांग्रेसी योजनाओं को नया नाम देकर मोदी उसे अपनी
उपलब्धि बताते हैं, पर जनता यह समझ रही है कि यह तो कांग्रेसियों से भी बड़ा
लुटेरा निकला। दूसरे, इसने सामाजिक शांति भी भंग की है। भाजपा का अध्यक्ष अमित शाह
जो एक दंगाई और तड़ीपार है, हमेशा उन मुद्दों की तलाश में रहता है, जिनसे धार्मिक
विद्वेष पैदा हो और दंगे भड़काए जा सकें। दंगे भड़काने में और सुनियोजित कत्लेआम
करवाने में मोदी-अमित शाह की जोड़ी को महारत हासिल है। ऐसे न जाने कितने सबूत हैं
जो दिखाते हैं कि गुजरात दंगे भड़काने और हजारों लोगों की हत्या करवाने में इन
दोनों की भूमिका रही है, पर इसने न्यायपालिका को अपने पक्ष में कर क्लीन चिट ले
लिया। यह वास्तव में इस देश का दुर्भाग्य है।
अब सवाल है कि आने वाले दिनों में
क्या होगा। अगर आरएसएस सत्ता में आने में सफल हुआ तो इसके पीछे वजह ये रही कि जनता
कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से बेतरह परेशान थी और उसने बदलाव का मन बना
लिया था। पर बदलाव पहले से भी बुरा होगा, ये कुछ लोग ही समझ रहे थे जो आरएसएस के
चरित्र से परिचित थे। किसी विकल्प के अभाव में और झूठे प्रचार के बल पर आरएसएस
सत्ता में आ गया। ‘अच्छे दिन’ का नारा देकर
प्रधानमंत्री बने मोदी ऐसे दुर्दिन लेकर आए कि अब आम जनता को न रोते बन पड़ रहा
है, न हंसते। ‘अच्छे दिन’ आए महज
अंबानी-अडानी और दस प्रतिशत लोगों के जो इन पूंजीपतियों के दलाल हैं या उच्च वर्ग
में शामिल हैं। मोदी की एक खासियत ये भी रही कि इन्होंने प्रचार तंत्र यानी मीडिया
पर कब्ज़ा कर लिया। यह काम इन्होंने मीडिया को खरीद कर ही किया। कांग्रेस का संभवत: यह एजेंडा नहीं
रहा, वर्ना मीडिया को वह भी खरीद सकती थी। बहरहाल, जनता बदलाव चाहती थी तो उसे
बदलाव मिला, लेकिन बदतर।
अब सवाल ये है कि ये मोदी (आरएसएस) सरकार से देश को
छुटकारा कैसे मिलेगा। इस बात में दो राय नहीं कि यह सरकार पांच साल तक तो रहेगी,
लेकिन उसके बाद क्या ? यह ऐसा सवाल है जो
हर विचारशील व्यक्ति के मन में है। दो साल तो जनता ने झेल लिया, तीन साल और झेल
लेगी, यह और बात है कि तब तक यह सरकार देश के संसाधनों को पता नहीं कितना लूटेगी
और लुटवाएगी, लेकिन 2019 में जब आम चुनाव होंगे तो क्या होगा ? कैसा विकल्प सामने
आएगा, यह एक गंभीर प्रश्न है। यहां देश के प्रमुख राजनीतिक दलों की स्थिति पर
विचार करना जरूरी होगा। भाजपा के बरक्स कांग्रेस अभी भी एक सबसे बड़ी पार्टी है।
अन्य दल क्षेत्रीय चरित्र वाले हैं, यद्यपि अखिल भारतीय राजनीति में उनका महत्त्व
कम नहीं है। वामपंथी दल भी अलग स्थान रखते हैं। लेकिन इन दलों की फिलहाल कोई ऐसी
नीति या कार्यक्रम दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जिनके आधार पर कहा जाए कि वे आने वाले
समय में भाजपा-आरएसएस के लिए चुनौती बन सकेंगे।
लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर सत्ता में आने के बाद अब राज्यों में
भाजपा को यद्यपि कोई बड़ी जीत मिलती नहीं
दिख रही, पर कांग्रेस की स्थिति भी पहले से कमजोर होती जा रही है। झारखंड, हरियाणा
जैसे राज्यों में भाजपा शासन हर मोर्चे पर फेल है और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने
कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। वहां नये समीकरण बन सकते हैं जो भाजपा के
खिलाफ जाएंगे। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की सरकार पूरी तरह बदनाम हो चुकी है।
व्यापमं घोटाले ने शिवराज की कलई खोल दी है। यहां भी जब चुनाव होंगे, शिवराज का
फिर से सत्ता में लौट पाना मुश्किल होगा। उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार को
हटाने की कोशिश मोदी जी को भारी पड़ी है और इससे भाजपा की कलई खुली है। पर जो
बेशर्मी की हद पर उतरा हो, उसे इन बातों से क्या फर्क पड़ता है। कहने का मतलब कि
भाजपा में वो दम नहीं कि अगले चुनाव में वह जीतने की उम्मीद कर सके। अभी हुए
विधानसभा चुनावों में सिर्फ असम में उसे जीत मिली है, यह उसकी उपलब्धि मानी जाएगी,
साथ ही कांग्रेस के एक किले का ढहना।
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम वामपंथी दलों को आईना दिखाने के लिए काफी
हैं। ममता बनर्जी का वहां पहले से भी मजबूत हो कर उभरना यह दिखा देता है कि
वामपंथियों की दाल वहां अभी गलने वाली नहीं है और कांग्रेस के साथ उनके गठबन्धन का
कोई भविष्य नहीं है। पश्चिम बंगाल में तो यह साबित हो ही चुका है, आने वाले दिनों
में राष्ट्रीय स्तर पर भी साबित हो जाएगा। दरअसल, वामपंथियों को अपने संगठन और
कार्यनीति पर फिर से सोचने की ज़रूरत है। भूलना नहीं होगा कि देश में मज़दूरों-किसानों
की एक बड़ी आबादी के साथ मध्य वर्ग का एक ऐसा तबका भी है जो इनकी तरफ आशा भरी
निगाहों से देखता है। लेकिन ये पूंजीवादी राजनीति के घेरे से निकल पाने को तैयार
नहीं दिखते। जबकि अभी भी इनका सांगठनिक ढांचा इतना मजबूत जरूर है कि ये चाहें तो
एक बड़ा अभियान चला कर विकल्प की राजनीति की शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए
इन्हें अपनी सीमाओं से निकलना होगा और सुविधाभोगी संस्कृति से पीछा छुड़ाना होगा।
वामपंथियों में अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है, बावजूद इनका कन्हैया जैसे अनुभवहीन
युवा पर निर्भर हो जाना इनकी कमजोरी को ही दिखलाता है। कन्हैया का प्रयोग असफल
रहा, यह वामपंथियों को स्वीकार कर लेना चाहिए और अपने आधार की तलाश
विश्वविद्यालयों से अलग हट कर फैक्ट्रियों और कामगार आबादी के बीच करनी चाहिए।
निश्चय ही, इससे इन्हें नई ऊर्जा मिलेगी और ये जनविकल्प खड़ा करने की दिशा में कुछ
कर सकेंगे। इन्हें यह समझना चाहिए कि देश फासीवाद की चुनौती से जूझ रहा है और ऐसे
में अब पुराने खोल से बाहर निकलना बहुत जरूरी है।
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