उत्तर प्रदेश में एक तरह से चुनाव का बिगुल फूंक दिया गया है। सभी
पार्टियां विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग गई हैं। पर मुद्दा किसी के पास नहीं
है। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो उसके पास सदाबहार मुद्दा है
राममंदिर का, अब गाय का मुद्दा जुड़ गया है। दादरी कांड कर भाजपा और संघ परिवार ने
अपने गो-प्रेम का अच्छा परिचय पहले से दे रखा है, जिसकी पोल मोदी जी के गुजरात में
ही खुल गई। दादरी कांड में पूरी तरह भद्द पिटने के बावजूद संघ परिवार को अक्ल नहीं
आई और अब भीड़ के द्वारा मारे गए अखलाक के परिवार पर ही मुकदमा दर्ज किया गया है।
यह सब विचित्र है, पर विचित्रता तो ही इस संघ सरकार की विशेषता है। दूसरा ताजा
प्रकरण है दलितों की देवी मायावती को भाजपा के एक नेता द्वारा गालियों से नवाजा
जाना। सभी जानते हैं कि मायावती क्या हैं और दलितों के लिए उन्होंने क्या किया है।
लेकिन सरेआम एक महिला नेता को गंदी गाली देना एक ऐसा काम था, जिसका बचाव भाजपा भी
नहीं कर सकी और दयाशंकर को पार्टी से निलंबित कर दिया। लेकिन उसे कोई फर्क नहीं
पड़ता। दूसरी तरफ, मायावती के अनुयायियों ने भी गाली का बदला जोरदार गालियों से
लिया। ये मायावती का तरीका है। ईंट का जवाब पत्थर से। भाजपा को भूलना नहीं चाहिए
कि एक समय वह मायावती से साथ यूपी में साझे में सरकार बना चुकी है। उसे वह अनुभव
नहीं भूलना चाहिए। भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो रास्ते वे अख्तियार
करना चाहते हैं, उनमें मायवती उन पर बीस ही पड़ेंगी।
बहरहाल, यूपी में जो परिस्थितियां बनती जा रही हैं, उनमें मायावती के लिए
जीत की राह आसान लगती है। मायावती पर गालियों की बौछार ने दलित और पिछड़ें वोटों
का ध्रुवीकरण लगभग उनके पक्ष में कर दिया है। ऐसे भी कांग्रेस की कमजोर स्थिति के
कारण पहले से उनके सत्ता में आने की भविष्यवाणी की जा रही है। समाजवादी पार्टी का
सूपड़ा इस चुनाव में साफ होना है, इसमें दो राय नही है। समाजवादी पार्टी ने
भ्रष्टाचार के साथ ही शासन के सभी चूलों को हिला कर रख दिया है और लंबे समय से
लगता रहा है कि यूपी का कामकाज बिना किसी सरकार के ही चल रहा है। मुलायम ने जितना
अवसरवाद और लंपटपना दिखाया है, वह अभूतपूर्व है। सपा पूरी तरह उनकी पारिवारिक
पार्टी बन कर रह गई है। राज्य में जनभावना उनके खिलाफ है और सपा को चुनाव में भारी
पराजय के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगना है। कांग्रेस के लिए उसके इलेक्शन
स्ट्रैजिस्ट प्रशांत किशोर दिन-रात एक कर रहे हैं। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद
का उम्मीदवार घोषित कर ब्राह्मण और अगड़ी जातियों के वोटरों को रिझाने की कोशिश की
गई है, पर भूलना नहीं होगा कि एक समय मायावती ने ब्राह्मण वोटरों को सफलतापूर्वक
अपने पक्ष में कर लिया था। वे फिर ऐसा ही दांव आजमाएंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
कांग्रेस की नीति आगे चल कर प्रियंका गांधी को भी चुनाव प्रचार में उतारने के साथ
कांग्रेस में अहम पद देने की भी है। चुनाव प्रचार तो वे पहले से करती रही हैं, पर
पार्टी में उन्हें क्या भूमिका दी जाएगी और वे क्या कर पाएंगी, यह अभी साफ नहीं
हुआ है। चर्चा है कि सोनिया गांधी रिटायर होंगी और राहुल पार्टी की कमान
संभालेंगे। पर अभी तक राहुल ने जो किया है, उससे बहुत उमामीद नहीं बंधती। यद्यपि
यह उम्मीद की जा सकती है कि वोट मैनेजमेंट के नये फंडों से शायद कांग्रेस को कुछ
सीटें मिल जाएं, लेकिन इतनी तो हर्गिज नहीं मिलेगी कि कांग्रेस यूपी में सरकार बना
सके।
सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा यूपी चुनावी दंगल में दूसरी कोई पार्टी
नहीं है। सपा साफ है। कांग्रेस अवश्य पहले से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन
समीकरण बसपा के पक्ष में दिख रहे हैं। यहां पेंच सिर्फ ये है कि क्या बसपा बहुमत
हासिल कर सकेगी। राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि बसपा नंबर-एक पर रहेगी तो
जरूर, पर अपने दम पर सरकार बना सकने लायक शायद सीटें न ला सके। ऐसी स्थिति में वह
सरकार बनाने के लिए क्या करेगी, यह देखने वाली बात होगी और यह इस पर निर्भर करेगा
कि कौन-सी पार्टी उसके बाद सबसे ज्यादा सीटें ला पाती है। सपा तो पारिवारिक पार्टी
है। जैसे लोकसभा चुनाव में परिवार के सदस्य जीते, उसी भांति यूपी चुनाव में भी
परिवार के सदस्य जीत सकते हैं, पर उससे तो मायावती का छत्तीस का रिश्ता है और
रहेगा भी। भाजपा के प्रबल होने की स्थिति में मायावती के लिए संकट ज्यादा होगा। वैसे,
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम समय में बसपा और भाजपा मिल कर भी सरकार बना
सकती है। यह ‘राजनीति में कुछ भी
हो सकता है’ इस सिद्धांत के
आधार पर कहा जा रहा है। लेकिन यदि कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलीं तो
क्या मायावती उससे गठबंधन करेंगी, यह सवाल महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई दो राय नहीं
कि वर्तमान स्थितियों में यूपी में मायावती को ही सत्ता का प्रबल दावेदार माना जा
रहा है। उनके पास वह शक्ति यानी जनबल, धनबल और कौशल है कि वे अपेक्षानुरूप सीटें
जीत सकें। मुलायम के कुशासन से आजिज आ चुके लोग एक बार मायावती को मौका देने के
बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
अब सवाल भाजपा का है कि वह क्या करेगी। वह तो वही करेगी जो पहले से करती
आ रही है यानी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण। दंगे की साजिश रचना और दंगा करवाना ताकि ऐन
वक्त पर वोटों का ध्रुवीकरण हो सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भाजपा ने दंगों की
उर्वर भूमि बना ही रखा है। गुजरात के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही संघ परिवार के
लिए साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला है। राममंदिर के मुद्दे में ज्यादा दम नहीं। पर
संघ परिवार को लगता है कि गाय और गोमांस में दम है। इसके बूते कुछ लोगों की हत्या
की जा सकती है, दंगे भड़काए जा सकते हैं और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकता
है। इसलिए वह यूपी चुनाव में इसी को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन
गुजरात का सच भी है कि किस तरह से वहां दलित समुदाय का गोमांस के मुद्दे पर
उत्पीड़न किया गया। भाजपा को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जिस हिन्दू वोटों की बात
वो करती है, उसमें ही दलित-महादलित जैसे वोटबैंक भी हैं, जिन पर पहला दावा मायावती
का और बचा-खुचा कांग्रेस का है। भाजपा और संघ के रणनीतिकारों को यह याद रखना चाहिए
कि गाय और गोमांस पर खून-खराबा कर सत्ता में आना अब उसके लिए शायद आसान न हो,
क्योंकि जनता भले चुपचाप हो, देख-समझ तो सब रही है। वहीं, मुस्लिम वोट बैंक भी अब
मुलायम से पूरी तरह दूर होता जा रहा है। यूपी के मुसलमानों को यह समझ में आने लगा
है कि मुलायम जिन्हें एक समय मौलाना तक कहा जाने लगा था, उनके हितों की रक्षा नहीं
कर सकते। उन्हें अपने कुनबे से आगे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। जाहिर है, ऐसी हालत
में मुस्लिम वोट बैंक बसपा और कांग्रेस के बीच बंटेगा।
एक सवाल ये भी सामने आ रहा है कि कहीं भाजपा और सपा हताशा में कोई
दुरभिसन्धि न करक लें, यानी जीत न रहे हों
तो खेल को बिगाड़ने की कोशिश करें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में मुलायम
और सपा की भूमिका भी संदिग्ध रही है। अगर ऐसा हुआ तो भी इन्हें ज्यादा कुछ हासिल
नहीं हो सकेगा, बल्कि इनका नंगापन खुल कर सामने आ जाएगा। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है
कि यूपी विधानसभा चुनावों में मायावती एक बार फिर सबसे ताकतवर हो कर उभरेंगी। यह
परिवर्तन भले ही बहुत सकारात्मक न हो, लेकिन भाजपा के मुकाबले एकमात्र विकल्प है।
जब तक जनविकल्प की शक्तियां सामने नहीं आती हैं, जनता के सामने इसके सिवा और कोई
दूसरा चारा भी नहीं है कि वह कभी इसे तो कभी उसे आजमाए।
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