Sunday, 28 August 2016

यूपी चुनाव : गाय, दंगा और दलित - मनोज कुमार झा

भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के लिए अब गाय मुसीबत बन गई है। ऐसी ख़बरें आईं हैं कि आरएसएस के अपने सर्वे में भाजपा यूपी चुनाव में चौथे नंबर पर आती दिख रही है। पंजाब में तो सूपड़ा साफ होने की नौबत है। गुजरात में भी हाहाकार की स्थिति बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अभी गुजरात में चुनाव हों तो भाजपा चारों खाने चित हो जाएगी। गुजरात में स्थिति गंभीर होने के कारण मोदी-अमित शाह और आरएसएस के रणनीतिकारों ने जल्दबाजी में आनंदीबेन का इस्तीफा लिया और संघ के परम प्रिय विजय रूपाणी को सत्ता सौंपी, जबकि आनंदीबेन ऐसा नहीं चाहती थीं। उन्होंने अमित शाह पर अपने खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया। बहरहाल, दलित आन्दोलन अब वहां क्या शक्ल लेगा, यह देखने की बात होगी। पर आरएसएस और मोदी ने गोरक्षा दलों के गठन का आह्वान किया था। यानी बजरंग दल की तरह एक और बड़ा गुंडा दल। यह सब सुनियोजित तौर पर उत्तर प्रदेश में चुनावी लाभ के लिए किया गया था। राममंदिर के नाम पर अब वहां वोट नहीं लिए जा सकते। तो ज़रूरत थी गोरक्षा के नाम पर कुछ दंगे-फसाद करने कर हिंदू वोटों को गोलबंद करने की। इसके लिए गोरक्षा दलों का गठन किया गया। आरएसएस के पास ट्रेनिंग पाए गुंडों की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो इशारा मिलना चाहिए। दंगे होते हैं तो लूटपाट कर पर्याप्त धन इकट्ठा कर लेते हैं और औरतों की अस्मत भी लूटते हैं। उन्हें तो मौका चाहिए। यह मौका प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस का नेतृत्व उन्हें देता रहा है। बजरंग दल में सारे छंटे हुए गुंडे थे, जिन्होंने गोधरा कांड के बाद जबरदस्त दंगे फैलाए और उत्पात किया। रावण के तो बस दस सिर थे, इस आरएसएस के न जाने कितने सिर हैं। लेकिन दांव उलटा पड़ गया। गोरक्षा दल के गुंडे दलितों पर पिल पड़े जो सैकड़ों वर्षों से मरे पशुओं की खाल उतारा करते हैं। मुसलमान ये काम नहीं करते। देश में गोमांस का कारोबार मुसलमान नहीं करते, संगठित रूप से हिंदू व्यवसायी ये काम करते हैं। अधिकांश बूचडखानों के मालिक हिंदू हैं, जिनमें एक संगीत सोम भी है। 


मोदी सरकार को कार्यकाल में गोमांस का कारोबार बढ़ा है, उसका निर्यात बढ़ा है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। लेकिन इस सरकार ने दंगों का माहौल बनाने के लिए और गाय का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करने के लिए दादरी हत्याकांड को अंजाम दिया। एक निर्दोष की हत्या शक के बिना पर की गई। पर इसका लाभ कुछ नहीं मिला। ये काम चुनाव के पहले ही हो गया। अब चुनाव सिर पर है तो फिर गाय का सहारा है। लेकिन इस बार भी दांव उलटा पड़ गया। निशाना मुसलमानों पर साधना था, आ गए दलित और वह भी गुजरात में। अति उत्साह में ऐसा होता है। अगर आप गुंडों को संगठित करते हैं और उनसे फायदा उठाना चाहते हैं तो कभी वे नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। गुजरात में गोरक्षा दलों के गुंडों ने जब दलितों को बुरी तरह से पीटा तो इसका खामियाजा अब यूपी में भुगतना ही पड़ेगा। भाजपा को जरूरत थी गाय के बहाने यूपी में कुछ और दादरी कांड करने की, हो गया क्या। भूलना नहीं होगा, गोरक्षा दलों के गठन का प्रधानमंत्री मोदी ने ही आह्वान किया था। लेकिन देश में गायों की जो हालत है, वो कोई भी देख सकता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जहां भाजपा की सरकार है, वहां गोशालाओं में सैकड़ों की संख्या में गायें उचित देखभाल और पोषण के अभाव में मर गईं। उस पर गोरक्षकों ने कुछ नहीं कहा, न उनके संरक्षक मोदी और आरएसएस ने। क्या इन्हें नहीं पता कि गोमांस निर्यात का भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना योगदान है। दूसरी बात, भारत में गोमांस की खपत कम है, ज्यादा निर्यात होता है। 


लेकिन आरएसएस को तो गाय दंगा कराने के लिए चाहिए। इसलिए गोरक्षा दल बनाए, जैसे आरएसएस में आतताई संगठनों की कमी हो गई थी। अब जब पानी नाक पर से ऊपर बहने लगा और आरएसएस के गोरक्षक काबू से बाहर हो गए तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि दलितों को न मारो, मुझे ही गोली मार दो। क्या अहमकपना है। क्या दलितों पर जुल्म ढाने वालों पर कार्रवाई के लिए कानून नहीं है। क्या दलित इतने भोले हैं कि वे मोदी की चाल में फंस जाएंगे। क्या लोग ये समझ नहीं गए कि ये आदमी हमेशा जुमले बकता है और इसकी कोई बात गंभीरता से लेने लायक नहीं है। गोरक्षक मोदी को गोली क्यों मारेंगे, उन्हें तो गाय के बहाने मुसलमानों पर हमला करने के लिए संगठित किया गया था। वे ये काम करते, पर मुसलमान तो गायों को नहीं मारते, न उनकी खाल उतारते हैं, ये काम दलित करते हैं तो गोरक्षकों के निशाने पर आ गए। ये गोरक्षक इतने बड़े आतताई हैं कि उन पर मोदी की इस बात का भी की असर नहीं पड़ा कि दलितों को मत मारो, मुझे मारो। इसके बाद भी उन्होंने हैदराबाद में कुछ दलितों की पिटाई की जो मरे पशुओं की खाल उतार रहे थे। ये गोरक्षक गुंडे सड़कों पर घूमते हैं और जहां इन्हें शक होता है कि कोई मरा पशु या मांस-खाल लेकर जा रहा है तो उसे गोमांस घोषित कर मारपीट और दंगा शुरू कर देते हैं। इन्होंने दादरी कांड को अंजाम दिया जिसमें एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की गई और हत्यारों का कुछ भी नहीं बिगड़ा, क्योंकि उन्हें सरकार का संरक्षण हासिल था।



अब ये डैमेज कंट्रोल की कोशिश में लगे हैं। पर यह संभव नहीं है। आरएसएस के पास कोई मुद्दा नहीं जिसे वह यूपी चुनाव में भुना सके। एक गाय हाथ लगी थी, वो भी गई। दलित भड़क गए अलग से और वो भी हिंदुत्व की महान प्रयोगशाला गुजरात में। जहां तक यूपी का सवाल है, वहां दलित वोटबैंक भाजपा का है ही नहीं। यह वोटबैंक दलितों की महारानी ये देवी जो कहें, मायावती का है। गोरक्षकों द्वारा दलितों के उत्पीड़न से मायावती को भाजपा के खिलाफ प्रचार का अच्छा मौका हाथ लगा है। लेकिन फिर भी आरएसएस हिंदू वोटों को गोलबंद करने के लिए चुनाव के ऐन पहले उकसावापूर्ण कार्रवाई कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आरएसएस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दंगा क्षेत्र बनाने की कोशिश की है। उसका सरमाया यही है। दंगा करवाओ और वोट बटोरो, मुसलमानों का भयादोहन करो, यही एकमात्र नीति है। जहां तक गाय का सवाल है, आरएसएस के गोरक्षा अभियान के बारे में हरिशंकर परसाई ने बहुत पहले ही लिखा था कि दुनिया में गाय दूध देने के काम आती है, पर अपने देश में यह दूध देने के अलावा दंगा कराने के काम भी आती है। 

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