नामवर सिंह द्वारा 90 बरस की उम्र में संघ का पल्ला पकड़ लेने की सही ही आलोचना हो रही है। सवाल है कि क्या यह
नामवरजी की ही समस्या है या और साहित्यकार-बुद्धिजीवी भी इस बीमारी
से ग्रस्त हैं। क्या यह एक व्यक्ति विशेष का ही चरित्र है कि तात्कालिक सत्ता को
सम्मान के एवज में वैधता प्रदान करे या इस बीमारी के स्रोत कहीं ज्यादा गहरे हैं? अज्ञेय की कविता ' बौद्धिक बुलाये गए' याद आती है (देखें
कविता लेख के अंत में)।
सम्मान के बदले में अपने
चेहरे, पद और नाम सरकार को समर्पित कर देना या समर्पित करने को लालायित रहना, भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की, खासकर हिंदी बुद्धिजीवी वर्ग की लाक्षणिक
विशिष्टता है। अंग्रेज़ों द्वारा दी गयी शिक्षा प्रणाली में पढ़े-लिखे
ये बुद्धिजीवी जब पढ़-लिख कर बाहर आते हैं तो ये अपने परिवेश से अपने आपको बेगाना
पाते हैं। अपने रिश्तेदारों, नातेदारों, भाई-बिरादरी और जवार-टोले के अन्य व्यक्तियों के साथ इनका संवाद ही नहीं हो पाता। इनकी पढाई-लिखाई
ने भारतीय समाज या परिवेश की कोई समझ इन्हें नहीं दी।
और जो सोच-समझ इन्होंने पाई, उससे इनके करीबी लोगों का कोई अर्थपूर्ण या मानीखेज जुड़ाव नहीं हो पाता। कबीर
ने यूँ ही तो नहीं कहा –
पढ़ि-पढ़ि के पाथर भया, लिख-लिख भया जू ईंट।
कह कबिरा प्रेम की लगी न
लगि ने अंतर छींट।।
ऐसे में, अगर ये डॉक्टर या कोई सरकारी
अफसर हैं तो और बात हैं, क्योंकि तब ये उनके कुछ काम कर सकते हैं या करवा सकते हैं।
नहीं तो इनके नातेदार-रिश्तेदार इनसे एक ही उम्मीद करते हैं कि ये उनकी गाहे-बगाहे
आर्थिक मदद कर दें। नतीजा, नवउदारवादी नीतियों के चलते ग्रामीण जमीनों के दाम
बढ़ने से पहले तक तो इनमें
से कई गांव जा कर झांकते भी नहीं थे। कई बुद्धिजीवियों ने तो बचपन की ब्याहता पत्नी को छोड़ दिया और शहरों में नए ब्याह कर
लिए। उनमें से जो थोड़े-बहुत सामंती संस्कार से ग्रस्त हैं, वो तो गांव पर उस पत्नी
के रहन-सहन का खर्च भेज भी देते हैं, नहीं तो प्रगतिशीलता के तहत उससे भी अपने को
मुक्त समझते हैं।
अपने परिवेश से बेगाने ये गमले के गुलाब स्वीकृति खोजते हैं। वाज़िब इच्छा है। किसे शिकायत हो सकती है। इसके दो ही रास्ते हैं। यदि अपने स्वाभाविक परिवेश में स्वीकृति पानी है तो अपने आपको लोगों से एकीकार करना होगा और
उसके लिए व्यक्तित्वान्तरण की कष्टसाध्य प्रक्रिया से गुज़रना
होगा। जो सीखा नहीं है, सीखना होगा। मध्यम वर्ग की सुविधाओं में जीने के मोह को लगाम
देकर जीवन में सादगी को अपनाना होगा और जहाँ तक हो सके, कथनी और करनी के फर्क को ख़त्म करना होगा। या
दूसरे शब्दों में कहें तो अपने वर्ग की सीमाओं को समझते हुए अपने आप को मेहनती आम जन, मज़दूर-किसानों की आशाओं, उम्मीदों, आकाँक्षाओं, सपनों, दुख-दर्द और ख़ुशी-गम, सभी से जोड़ना होगा, सच्ची वर्ग चेतना से जोड़ना
होगा। नामवर के ही शब्दों में- “..... उसकी सच्ची वर्ग चेतना इस बात में है कि वो
मज़दूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके
लिए पूंजीवाद के विनाश में मज़दूर वर्ग का साथ दे।” (
देखें, कविता के नए प्रतिमान - पेज 246 ). इसी बात को कबीर ने दूसरे शब्दों में यूँ कहा है :
"यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहीं।
सिर उतारे भूँई धरे, तब पैठे घर माहीं।''
यह कार्य व्यक्तिगत स्तर
पर एक सीमा से आगे नहीं जा सकता। किसी आंदोलन के हिस्से के तौर पर ही हो सकता है। आज़ादी की लड़ाई में यह
कार्य गाँधी के नेतृत्व में मुख्यतः संपन्न हुआ। आज़ादी के बाद एक हद तक समाजवादी
आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन की रहनुमाई में संपन्न हुआ। 1959 में ही नामवर कम्युनिस्ट पार्टी के
उम्मीदवार के तौर पर पूर्वी यूपी से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। लेकिन अब नक्सलवादी आंदोलन की भिन्न
धाराओं या कुछ थोड़े से समाजवादियों को छोड़ कर, व्यक्तित्वान्तरण
या आम जन से एकीकरण के सवालों
को कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं उठाता और नक्सलवादी-समाजवादी आंदोलन कि
धाराएं भी आज
समाज में हाशिए की ताकतें हैं। वैसे भी दुनिया के पैमाने पर प्रभावी माहौल इनके
पक्ष में नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति की अपनी यांत्रिक सोच के चलते भी ये
धाराएं बुद्धिजीवियों के बहुलांश को आकर्षित नहीं कर पातीं।
अब दूसरा रास्ता भारतीय
बुद्धिजीवी वर्ग के पास है तो विदेशों में या सरकारी तंत्र द्वारा
स्वीकृति पाना। विदेशों में स्वीकृति का रास्ता बड़ा मुश्किल
है। एक तो अंग्रेजी में महारत चाहिए, दूसरे
विदेशी आबोहवा से कुछ पहचान भी चाहिए और आजकल तो टेंट में पैसा भी चाहिए। प्रथम
पीढ़ी के पढ़ने वालों के सामने या हिंदीभाषी छात्रों को ये मामला बहुत दुरूह लगता
है। कोई गलत भी नहीं, स्वाभाविक ही है। हाँ, देखा जा रहा है कि हिंदी-हिंदीभाषी बुद्धिजीवियों
के लड़के-बच्चे आज़ाद भारत में गांधीजी की भारत छोडो आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ा
रहे हैं या उस दिशा में प्रयासरत हैं। ( मैं स्वयं कोई इसका अपवाद नहीं हूँ। मेरा बेटा स्वयं विदेश जाने की कोशिश कर रहा है)
आखिरी राह है सरकारी
तंत्र द्वारा स्वीकृति की। सरकारी
तंत्र में कई संवेदनशील प्रतिभाशाली कवि, साहित्यकार अफसर बन कर धंस जाना चाहते हैं और कई धंसे भी हैं। शेष जो बचे वो पुरस्कृत
हो कर अपने को धन्य समझते हैं। नामवर जी कोई ऐसे अनोखे अपवाद नहीं हैं।
लेकिन इस रास्ते की कितनी
भारी कीमत चुकानी पड़ती है, उसको उकेरते हुए बहुत पहले महाकवि निराला ने सत्ता की ‘गिलौरियाँ’ खाने को लालायित सुधीजनों को चेताते हुए कहा था -
"साथ न होना।
गांठ खुलेगी।
छूटेगा उर का सोना।
पाना ही होगा खोना।
साथ न होना।
हाथ बचा जा, कटने से माथ बचा जा
अपने को सदा लचा जा,
सोच न कर, मिला अगर कोना।
साथ न होना।"
वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ
सिंह इसको विस्तारित करते हुए सही ही कहते हैं
'"... फिर से मुड़कर वहीं मत जाना। फिर उसी अल्पमत में अपनी जगह बनाने की कोशिश न
करना। अपने लोगों के बीच रहना। वरना तुम्हारी गांठ का सोना वे लुटेरे लूट लेंगे। तुम्हारी प्रतिभा, वर्चस्विता, तेजस्विता का इस्तेमाल-उपयोग करके तुम्हें रिक्त
कर देंगे। जिसे तुम अपनी उपलब्धि समझोगे, जिस
सुविधा, सुरक्षा, ऐश्वर्य
और स्थापना को तुम ‘पाना’ समझोगे, दरअसल वही तुम्हारा सबसे बड़ा ‘खोना’ होगा। तुम अपना निजत्व अपना ‘मैं’ सदा के
लिए हार जाओगे। अतः किसी प्रलोभन में पड़कर उस ‘राजे’ के समाज के जादू में मत फँसना।"
सोचना होगा कि क्या भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस हश्र के लिए अभिशप्त है। शायद नहीं, फ़्रांसीसी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र ने 1964 में नोबेल प्राइज लेने से इनकार करते हुए शायद सही ही कहा था-
सोचना होगा कि क्या भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस हश्र के लिए अभिशप्त है। शायद नहीं, फ़्रांसीसी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र ने 1964 में नोबेल प्राइज लेने से इनकार करते हुए शायद सही ही कहा था-
“एक लेखक, जो राजनीतिक, सामाजिक, साहित्यिक अवधारणाओं की पैरवी करता है, उसे अपने
ही साधनों यानी लिखित शब्द के साथ ही अपना कार्य करना चाहिए। सभी सम्मान जो लेखक
को प्राप्त होते हैं, वो उसके पाठक पर एक ऐसा दबाव बनाते हैं जिसे वो सही नहीं
मानते थे।“
यह सही है कि तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवियों में सार्त्र जैसी सार्वजनिक स्वीकृति और उससे उपजी
यह सही है कि तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवियों में सार्त्र जैसी सार्वजनिक स्वीकृति और उससे उपजी
नैतिक ताकत आज कम ही
दिखाई देती है, पर इसकी उम्मीद रखना कोई गलत भी तो नहीं है, क्योंकि यह मनोभाव एक इंसानी जिंदगी की पूर्व शर्त होती है।
‘बौद्धिक बुलाये गए'
-अज्ञेय
‘हमें
कोई नहीं पहचानता था।
हमारे चेहरों पर श्रद्धा थी।
हम सब को भीतर बुला लिया गया।
उस के चेहरे पर कुछ नहीं था।
उस ने हम सब पर एक नज़र डाली।
हमारे चेहरों पर कुछ नहीं था।
उस ने इशारे से कहा इन सब के चेहरे
उतार लो।
हमारे चेहरे उतार लिये गये।
उस ने इशारे से कहा
इन सब को सम्मान बाँटो :
हम सब को सिरोपे दिये गये
जिन के नीचे नये
चेहरे भी टँके थे
उस ने नमस्कार का इशारा किया
हम विदा कर के
बाहर निकाल दिये गये
बाहर हमें सब पहचानते हैं :
जानते हैं हमारे चेहरों पर नये चेहरे हैं।
जिन पर श्रद्धा थी
वे चेहरे भीतर
उतार लिये गये थे : सुना है
उन का निर्यात होगा।
विदेशों में श्रद्धावान् चेहरों की
बड़ी माँग है।
वहाँ पिछले तीन सौ बरस से
उन की पैदावार बन्द है।
और निर्यात बढ़ता है
तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती हैl’
कोई नहीं पहचानता था।
हमारे चेहरों पर श्रद्धा थी।
हम सब को भीतर बुला लिया गया।
उस के चेहरे पर कुछ नहीं था।
उस ने हम सब पर एक नज़र डाली।
हमारे चेहरों पर कुछ नहीं था।
उस ने इशारे से कहा इन सब के चेहरे
उतार लो।
हमारे चेहरे उतार लिये गये।
उस ने इशारे से कहा
इन सब को सम्मान बाँटो :
हम सब को सिरोपे दिये गये
जिन के नीचे नये
चेहरे भी टँके थे
उस ने नमस्कार का इशारा किया
हम विदा कर के
बाहर निकाल दिये गये
बाहर हमें सब पहचानते हैं :
जानते हैं हमारे चेहरों पर नये चेहरे हैं।
जिन पर श्रद्धा थी
वे चेहरे भीतर
उतार लिये गये थे : सुना है
उन का निर्यात होगा।
विदेशों में श्रद्धावान् चेहरों की
बड़ी माँग है।
वहाँ पिछले तीन सौ बरस से
उन की पैदावार बन्द है।
और निर्यात बढ़ता है
तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती हैl’
Ravinder Goel 106
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