Wednesday, 31 August 2016

जनता भूखे भजन करे, अब विधानसभा और संसद में मुनियों के प्रवचन होंगे - मनोज कुमार झा

हरियाणा विधानसभा में जैन मुनि तरुण सागर ने प्रवचन दिया। धर्म को पति और राजनीति को पत्नी बताया। यह कहा कि जैसे पत्नी पर पति का प्रभुत्व होता है, वैसे ही राजनीति पर धर्म का प्रभुत्व होना चाहिए। इस तरह धर्म और राजनीति के गठजोड़ की व्याख्या कर दी मुनिवर ने। दिगंबर जैन मुनि नग्न रहते हैं और विधानसभा को भी उन्होंने नग्नावस्था में ही संबोधित किया। भारतीय इतिहास में संभवत: किसी भी जनप्रतिनिधि सदन में किसी धर्मगुरु के संबोधन का यह पहला मामला है। यह मोदी (आरएसएस) के शासन में ही संभव हुआ। इस पर काफी कड़ी प्रतिक्रिया भी आ रही है, पर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के किसी अन्य नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, न आएगी। ऐसा इसलिए कि यह सब उनके द्वारा ही प्रायोजित है। संभव है, इसके बाद भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी बाबाओं-धर्मगुरुओं को प्रवचन देने के लिए बुलाया जाए।


 बहरहाल, इस पूरी परिघटना और प्रवृत्ति पर मार्क्सवादी आलोचक-चिंतक अरुण माहेश्वरी ने जो टिप्पणी की है, वह गौर करने वाली है। उन्होंने लिखा है,“यह है भारतीय राज्य का चरित्र। यह घनघोर असभ्य और अशिक्षित जनों के राज्य में बदलता जा रहा है। सारी दुनिया इस गंदगी को देख रही है। इसीलिये हम फ्रांस की सरकार के बुर्कों पर पाबंदी लगाने के फ़ैसले का तहे दिल से स्वागत करते हैं। कोई भी सभ्य राज्य अपनी सीमा में मध्ययुगीन असभ्यताओं के आयात की अनुमति नहीं दे सकता। अमेरिका ने हाल में उस भाजपाई सांसद को वीजा देने से इनकार कर दिया जो यहां यज्ञ के धुएं से ओज़ोन परत में दरार को पाटने की बात करता है। अमेरिकी दूतावास ने बहाना बनाया है कि उसे वहां पगड़ी पहन कर नहीं जाने दिया जायेगा। अभी का भारतीय राज्य हमारे यहां मध्ययुगीन बर्बरताओं को आमंत्रित कर रहा है।“ यह टिप्पणी खास महत्व रखती है। देखने में यह आ रहा है कि जब से मोदी सरकार आई है, उसने अवैज्ञानिक विचारों को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया है। यह सब राज्य प्रायोजित है। आरएसएस की विचारधारा क्या रही है, उससे सभी परिचित रहे हैं। पर विडंबना यह है कि राज्य अब आरएसएस के हाथ में है। इसलिए राजकीय संस्थाओं, विधानमंडलों और अन्य मंचों पर इस तरह की गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। लगभग सभी शैक्षणिक और शोध संस्थानों में आरएसएस के लोग बैठाए चुके हैं। विश्वविद्यालयों में आरएसएस समर्थक लोगों को भरा जा रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैज्ञानिकों के सम्मेलनों में घोर अवैज्ञानिक बातें बोलते सुने जा चुके हैं।


यहां यह भूलना नहीं होगा कि मोदी के सत्ता में आते ही हिंदूवादी कट्टर तत्वों ने गोविंद पानसारे, दाभोलकर समेत कई लोगों की हत्या कर दी जो अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चला रहे थे, कितने बुद्धिजीवियों और लेखकों को जान से मारने की धमकियां दी और भी न जाने कितने उत्पात किए। इस तरह, मोदी सरकार ने प्रगति-विरोधी कूढ़मगज तत्वों को खुल कर संरक्षण दिया। आरएसएस प्रमुख एवं इनके समर्थक साधु-संतों-बाबाओं के लगातार बयान आते रहते हैं कि हिंदू ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। ऐसे-ऐसे घृणित बयान आते हैं जो पहले कभी नहीं आए। लेकिन उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। अब इन्हें राज्य का समर्थन प्राप्त है।


क्या हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर ने एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा कि जैन मुनि को सदन में बुलाकर वे कितना बड़ा संविधान-विरोधी काम कर रहे हैं। भारत का संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी भी धर्मगुरु को विधानसभा या संसद में प्रवचन देने के लिए बुलाया जाए। आश्चर्य की बात तो यह है कि विरोधी दल भी इस पर चुप रहे। जबकि अन्य मुद्दों पर वे तत्काल हंगामा करने लगते हैं। दरअसल, देश मे मोदी सरकार और हरियाणा में खट्टर सरकार दूसरे दलों की नाकामी की वजह से ही आ पाने में सफल हो सकी है। कल को क्या ये दूसरे धर्मों के गुरुओं को भी सदन में आमंत्रित करेंगे या सिर्फ नंगे बाबाओं को ही बुलाकर प्रवचन सुनेंगे। बहरहाल, जैनमुनि तरुण सागर का प्रवचन बहुत ही सांकेतिक रहा। धर्म पति है, राजनीति पत्नी। धर्म और राजनीति के गठबंधन को आरएसएस की विचारधारा के अनुकूल व्याख्यायित कर दिया मुनि ने। अब सवाल है कि क्या हरियाणा विधानसभा में हुए इस असंवैधानिक कृत्य का न्यायालय संज्ञान लेगा और खट्टर आदि महात्माओं से पूछेगा कि ऐसी नाजायज हरकत उन्होंने क्यों की। इसकी संभावना बहुत ही कम लगती है। इस लोकतंत्र में न्यायालय की अपनी सीमाएं हैं और वहां भी संघी मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं है।


भूलना नहीं होगा कि चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने किस तरह हरियाणा के माफिया मठाधीश संत राम रहीम का समर्थन लिया था, जिस पर बलात्कार और हत्या के केस हैं और जिसके पास कितनी दौलत है, उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वह फिल्में बनाता है, उनमें अभिनय करता है और स्वयं को सर्वशक्तिमान बतलाता है। खट्टर सरकार का उससे संपर्क लगातार बना रहता है। अभी हाल मे स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज उससे मिलने गए थे। क्या खट्टर सरकार ऐसे बाबाओं और महंतों से दिशा-निर्देश लेती है?  इसमें कोई दो राय नहीं कि खट्टर सरकार और जहां भी भाजपा की सरकार है, वहां ऐसे ही समाज-विरोधी लोग सत्ता के सबसे ऊंचे पायदान पर हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ था। पर जो कभी नहीं हुआ था, वही भाजपा के राज में होगा। लोग तमाशा देखते रहें। हर तरह के अपराधियों और बलात्कारियों को इस राज में पूरी तरह छूट मिली हुई है। रोज ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं। उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है।


सवाल है, ऐसा कब तक चलता रहेगा? क्या लोगों की चेतना कुंद हो चुकी है? लगता तो ऐसा ही है। लोगों का प्रतिरोध किसी न किसी संगठन के माध्यम से सामने आता है। ऐसा कोई संगठन नज़र नहीं आता। कुछ संगठन हैं भी तो बहुत कमजोर हाल में हैं और उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर ही रह जाती है। विरोधी दलों में कोई संभावना नहीं दिखती। चौटाला बाप-बेटे जेल में हैं। कांग्रेस की जो हालत है, लोग देख ही रहे हैं। वामपंथी भी गहन निद्रा में हैं। ऐसे में, अब जनता भूखे रह कर भजन करे और मुनियों-बाबाओं का प्रवचन सुने। दूसरा कोई उपाय है नहीं।

Sunday, 28 August 2016

यूपी चुनाव : गाय, दंगा और दलित - मनोज कुमार झा

भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के लिए अब गाय मुसीबत बन गई है। ऐसी ख़बरें आईं हैं कि आरएसएस के अपने सर्वे में भाजपा यूपी चुनाव में चौथे नंबर पर आती दिख रही है। पंजाब में तो सूपड़ा साफ होने की नौबत है। गुजरात में भी हाहाकार की स्थिति बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अभी गुजरात में चुनाव हों तो भाजपा चारों खाने चित हो जाएगी। गुजरात में स्थिति गंभीर होने के कारण मोदी-अमित शाह और आरएसएस के रणनीतिकारों ने जल्दबाजी में आनंदीबेन का इस्तीफा लिया और संघ के परम प्रिय विजय रूपाणी को सत्ता सौंपी, जबकि आनंदीबेन ऐसा नहीं चाहती थीं। उन्होंने अमित शाह पर अपने खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया। बहरहाल, दलित आन्दोलन अब वहां क्या शक्ल लेगा, यह देखने की बात होगी। पर आरएसएस और मोदी ने गोरक्षा दलों के गठन का आह्वान किया था। यानी बजरंग दल की तरह एक और बड़ा गुंडा दल। यह सब सुनियोजित तौर पर उत्तर प्रदेश में चुनावी लाभ के लिए किया गया था। राममंदिर के नाम पर अब वहां वोट नहीं लिए जा सकते। तो ज़रूरत थी गोरक्षा के नाम पर कुछ दंगे-फसाद करने कर हिंदू वोटों को गोलबंद करने की। इसके लिए गोरक्षा दलों का गठन किया गया। आरएसएस के पास ट्रेनिंग पाए गुंडों की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो इशारा मिलना चाहिए। दंगे होते हैं तो लूटपाट कर पर्याप्त धन इकट्ठा कर लेते हैं और औरतों की अस्मत भी लूटते हैं। उन्हें तो मौका चाहिए। यह मौका प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस का नेतृत्व उन्हें देता रहा है। बजरंग दल में सारे छंटे हुए गुंडे थे, जिन्होंने गोधरा कांड के बाद जबरदस्त दंगे फैलाए और उत्पात किया। रावण के तो बस दस सिर थे, इस आरएसएस के न जाने कितने सिर हैं। लेकिन दांव उलटा पड़ गया। गोरक्षा दल के गुंडे दलितों पर पिल पड़े जो सैकड़ों वर्षों से मरे पशुओं की खाल उतारा करते हैं। मुसलमान ये काम नहीं करते। देश में गोमांस का कारोबार मुसलमान नहीं करते, संगठित रूप से हिंदू व्यवसायी ये काम करते हैं। अधिकांश बूचडखानों के मालिक हिंदू हैं, जिनमें एक संगीत सोम भी है। 


मोदी सरकार को कार्यकाल में गोमांस का कारोबार बढ़ा है, उसका निर्यात बढ़ा है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। लेकिन इस सरकार ने दंगों का माहौल बनाने के लिए और गाय का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करने के लिए दादरी हत्याकांड को अंजाम दिया। एक निर्दोष की हत्या शक के बिना पर की गई। पर इसका लाभ कुछ नहीं मिला। ये काम चुनाव के पहले ही हो गया। अब चुनाव सिर पर है तो फिर गाय का सहारा है। लेकिन इस बार भी दांव उलटा पड़ गया। निशाना मुसलमानों पर साधना था, आ गए दलित और वह भी गुजरात में। अति उत्साह में ऐसा होता है। अगर आप गुंडों को संगठित करते हैं और उनसे फायदा उठाना चाहते हैं तो कभी वे नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। गुजरात में गोरक्षा दलों के गुंडों ने जब दलितों को बुरी तरह से पीटा तो इसका खामियाजा अब यूपी में भुगतना ही पड़ेगा। भाजपा को जरूरत थी गाय के बहाने यूपी में कुछ और दादरी कांड करने की, हो गया क्या। भूलना नहीं होगा, गोरक्षा दलों के गठन का प्रधानमंत्री मोदी ने ही आह्वान किया था। लेकिन देश में गायों की जो हालत है, वो कोई भी देख सकता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जहां भाजपा की सरकार है, वहां गोशालाओं में सैकड़ों की संख्या में गायें उचित देखभाल और पोषण के अभाव में मर गईं। उस पर गोरक्षकों ने कुछ नहीं कहा, न उनके संरक्षक मोदी और आरएसएस ने। क्या इन्हें नहीं पता कि गोमांस निर्यात का भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना योगदान है। दूसरी बात, भारत में गोमांस की खपत कम है, ज्यादा निर्यात होता है। 


लेकिन आरएसएस को तो गाय दंगा कराने के लिए चाहिए। इसलिए गोरक्षा दल बनाए, जैसे आरएसएस में आतताई संगठनों की कमी हो गई थी। अब जब पानी नाक पर से ऊपर बहने लगा और आरएसएस के गोरक्षक काबू से बाहर हो गए तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि दलितों को न मारो, मुझे ही गोली मार दो। क्या अहमकपना है। क्या दलितों पर जुल्म ढाने वालों पर कार्रवाई के लिए कानून नहीं है। क्या दलित इतने भोले हैं कि वे मोदी की चाल में फंस जाएंगे। क्या लोग ये समझ नहीं गए कि ये आदमी हमेशा जुमले बकता है और इसकी कोई बात गंभीरता से लेने लायक नहीं है। गोरक्षक मोदी को गोली क्यों मारेंगे, उन्हें तो गाय के बहाने मुसलमानों पर हमला करने के लिए संगठित किया गया था। वे ये काम करते, पर मुसलमान तो गायों को नहीं मारते, न उनकी खाल उतारते हैं, ये काम दलित करते हैं तो गोरक्षकों के निशाने पर आ गए। ये गोरक्षक इतने बड़े आतताई हैं कि उन पर मोदी की इस बात का भी की असर नहीं पड़ा कि दलितों को मत मारो, मुझे मारो। इसके बाद भी उन्होंने हैदराबाद में कुछ दलितों की पिटाई की जो मरे पशुओं की खाल उतार रहे थे। ये गोरक्षक गुंडे सड़कों पर घूमते हैं और जहां इन्हें शक होता है कि कोई मरा पशु या मांस-खाल लेकर जा रहा है तो उसे गोमांस घोषित कर मारपीट और दंगा शुरू कर देते हैं। इन्होंने दादरी कांड को अंजाम दिया जिसमें एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की गई और हत्यारों का कुछ भी नहीं बिगड़ा, क्योंकि उन्हें सरकार का संरक्षण हासिल था।



अब ये डैमेज कंट्रोल की कोशिश में लगे हैं। पर यह संभव नहीं है। आरएसएस के पास कोई मुद्दा नहीं जिसे वह यूपी चुनाव में भुना सके। एक गाय हाथ लगी थी, वो भी गई। दलित भड़क गए अलग से और वो भी हिंदुत्व की महान प्रयोगशाला गुजरात में। जहां तक यूपी का सवाल है, वहां दलित वोटबैंक भाजपा का है ही नहीं। यह वोटबैंक दलितों की महारानी ये देवी जो कहें, मायावती का है। गोरक्षकों द्वारा दलितों के उत्पीड़न से मायावती को भाजपा के खिलाफ प्रचार का अच्छा मौका हाथ लगा है। लेकिन फिर भी आरएसएस हिंदू वोटों को गोलबंद करने के लिए चुनाव के ऐन पहले उकसावापूर्ण कार्रवाई कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आरएसएस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दंगा क्षेत्र बनाने की कोशिश की है। उसका सरमाया यही है। दंगा करवाओ और वोट बटोरो, मुसलमानों का भयादोहन करो, यही एकमात्र नीति है। जहां तक गाय का सवाल है, आरएसएस के गोरक्षा अभियान के बारे में हरिशंकर परसाई ने बहुत पहले ही लिखा था कि दुनिया में गाय दूध देने के काम आती है, पर अपने देश में यह दूध देने के अलावा दंगा कराने के काम भी आती है। 

Friday, 19 August 2016

नामवर के बहाने / रवींद्र गोयल

नामवर सिंह द्वारा 90 बरस की उम्र में संघ का पल्ला पकड़ लेने की सही ही आलोचना हो रही है। सवाल है कि क्या यह नामवरजी की ही समस्या है या और साहित्यकार-बुद्धिजीवी भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं। क्या यह एक व्यक्ति विशेष का ही चरित्र है कि तात्कालिक सत्ता को सम्मान के एवज में वैधता प्रदान करे या इस बीमारी के स्रोत कहीं ज्यादा गहरे हैं? अज्ञेय की कविता बौद्धिक बुलाये गए' याद आती है (देखें कविता लेख के अंत में)।

सम्मान के बदले में अपने चेहरे, पद और नाम सरकार को समर्पित कर देना या समर्पित करने को लालायित रहनाभारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की, खासकर हिंदी बुद्धिजीवी वर्ग की लाक्षणिक विशिष्टता है। अंग्रेज़ों द्वारा दी गयी शिक्षा प्रणाली में पढ़े-लिखे ये बुद्धिजीवी जब पढ़-लिख कर बाहर आते हैं तो ये अपने परिवेश से अपने आपको बेगाना पाते हैं। अपने रिश्तेदारों, नातेदारोंभाई-बिरादरी और जवार-टोले के अन्य व्यक्तियों के साथ इनका संवाद ही नहीं हो पाता। इनकी पढाई-लिखाई ने भारतीय समाज या परिवेश की कोई समझ इन्हें नहीं दी। और जो सोच-समझ इन्होंने पाई, उससे इनके करीबी लोगों का कोई अर्थपूर्ण या मानीखेज जुड़ाव नहीं हो पाता। कबीर ने यूँ ही तो नहीं कहा –

पढ़ि-पढ़ि के पाथर भयालिख-लिख भया जू ईंट।
कह कबिरा प्रेम की लगी न लगि ने अंतर छींट।।

ऐसे में, अगर ये डॉक्टर या कोई सरकारी अफसर हैं तो और बात हैं, क्योंकि तब ये उनके कुछ काम कर सकते हैं या करवा सकते हैं। नहीं तो इनके नातेदार-रिश्तेदार इनसे एक ही उम्मीद करते हैं कि ये उनकी गाहे-बगाहे आर्थिक मदद कर दें। नतीजानवउदारवादी नीतियों के चलते ग्रामीण जमीनों के दाम बढ़ने से पहले तक तो इनमें से कई गांव जा कर झांकते भी नहीं थे। कई बुद्धिजीवियों ने तो बचपन की ब्याहता पत्नी को छोड़ दिया और शहरों में नए ब्याह कर लिए। उनमें से जो थोड़े-बहुत सामंती संस्कार से ग्रस्त हैं, वो तो गांव पर उस पत्नी के रहन-सहन का खर्च भेज भी देते हैं, नहीं तो प्रगतिशीलता के तहत उससे भी अपने को मुक्त समझते हैं।   

अपने परिवेश से बेगाने ये गमले के गुलाब स्वीकृति खोजते हैं। वाज़िब इच्छा है। किसे शिकायत हो सकती है। इसके दो ही रास्ते हैं। यदि अपने स्वाभाविक परिवेश में स्वीकृति पानी है तो अपने आपको लोगों से एकीकार करना होगा और उसके लिए व्यक्तित्वान्तरण की कष्टसाध्य प्रक्रिया से गुज़रना होगा। जो सीखा नहीं है, सीखना होगा मध्यम वर्ग की सुविधाओं में जीने के मोह को लगाम देकर जीवन में सादगी को अपनाना होगा और जहाँ तक हो सके, कथनी और करनी के फर्क को ख़त्म करना होगा। या दूसरे शब्दों में कहें तो अपने वर्ग की सीमाओं को समझते हुए अपने आप को मेहनती आम जनमज़दूर-किसानों की आशाओंउम्मीदोंआकाँक्षाओंसपनोंदुख-दर्द और ख़ुशी-गम, सभी से जोड़ना होगा, सच्ची वर्ग चेतना से जोड़ना होगा। नामवर के ही शब्दों में- ..... उसकी सच्ची वर्ग चेतना इस बात में है कि वो मज़दूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मज़दूर वर्ग का साथ दे। ( देखें, कविता के नए प्रतिमान - पेज 246 )इसी बात को कबीर ने दूसरे शब्दों में यूँ कहा है :
"यह तो घर है प्रेम काखाला का घर नाहीं।
सिर उतारे भूँई धरेतब पैठे घर माहीं।''


यह कार्य व्यक्तिगत स्तर पर एक सीमा से आगे नहीं जा सकता। किसी आंदोलन के हिस्से के तौर पर ही हो सकता है। आज़ादी की लड़ाई में यह कार्य गाँधी के नेतृत्व में मुख्यतः संपन्न हुआ। आज़ादी के बाद एक हद तक समाजवादी आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन की रहनुमाई में संपन्न हुआ 1959 में ही नामवर कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पूर्वी यूपी से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। लेकिन अब नक्सलवादी आंदोलन की भिन्न धाराओं या कुछ थोड़े से समाजवादियों को छोड़ करव्यक्तित्वान्तरण या आम जन से एकीकरण के सवालों को कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं उठाता और नक्सलवादी-समाजवादी आंदोलन कि धाराएं भी आज समाज में हाशिए की ताकतें हैं। वैसे भी दुनिया के पैमाने पर प्रभावी माहौल इनके पक्ष में नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति की अपनी यांत्रिक सोच के चलते भी ये धाराएं बुद्धिजीवियों के बहुलांश को आकर्षित नहीं कर पातीं।

अब दूसरा रास्ता भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के पास है तो विदेशों में या सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति पाना। विदेशों में स्वीकृति का रास्ता बड़ा मुश्किल है। एक तो अंग्रेजी में महारत चाहिएदूसरे विदेशी आबोहवा से कुछ पहचान भी चाहिए और आजकल तो टेंट में पैसा भी चाहिए। प्रथम पीढ़ी के पढ़ने वालों के सामने या हिंदीभाषी छात्रों को ये मामला बहुत दुरूह लगता है। कोई गलत भी नहीं, स्वाभाविक ही है। हाँ, देखा जा रहा है कि हिंदी-हिंदीभाषी बुद्धिजीवियों के लड़के-बच्चे आज़ाद भारत में गांधीजी की भारत छोडो आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं या उस दिशा में प्रयासरत हैं। ( मैं स्वयं कोई इसका अपवाद नहीं हूँ मेरा बेटा स्वयं विदेश जाने की कोशिश कर रहा है)

आखिरी राह है सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति की। सरकारी तंत्र में कई संवेदनशील प्रतिभाशाली कविसाहित्यकार अफसर बन कर धंस जाना चाहते हैं और कई धंसे भी हैं शेष जो बचे वो पुरस्कृत हो कर अपने को धन्य समझते हैं। नामवर जी कोई ऐसे अनोखे अपवाद नहीं हैं।
लेकिन इस रास्ते की कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है, उसको उकेरते हुए बहुत पहले महाकवि निराला ने सत्ता की गिलौरियाँ खाने को लालायित सुधीजनों को चेताते हुए कहा था -

"साथ न होना।
गांठ खुलेगी।
छूटेगा उर का सोना।
पाना ही होगा खोना।
साथ न होना।
हाथ बचा जाकटने से माथ बचा जा
अपने को सदा लचा जा,
सोच न करमिला अगर कोना।
साथ न होना।"

वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह इसको विस्तारित करते हुए सही ही कहते हैं
'"... फिर से मुड़कर वहीं मत जाना फिर उसी अल्पमत में अपनी जगह बनाने की कोशिश न करनाअपने लोगों के बीच रहना। वरना तुम्हारी गांठ का सोना वे लुटेरे लूट लेंगे। तुम्हारी प्रतिभावर्चस्वितातेजस्विता का इस्तेमाल-उपयोग करके तुम्हें रिक्त कर देंगे। जिसे तुम अपनी उपलब्धि समझोगे, जिस सुविधासुरक्षाऐश्वर्य और स्थापना को तुम पाना समझोगे, दरअसल वही तुम्हारा सबसे बड़ा खोना होगातुम अपना निजत्व अपना मैं सदा के लिए हार जाओगे। अतः किसी प्रलोभन में पड़कर उस राजे के समाज के जादू में मत फँसना"
सोचना होगा कि क्या भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस हश्र के लिए अभिशप्त हैशायद नहीं, फ़्रांसीसी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र ने 1964 में नोबेल प्राइज लेने से इनकार करते हुए शायद सही ही कहा था-
एक लेखकजो राजनीतिकसामाजिकसाहित्यिक अवधारणाओं की पैरवी करता है, उसे अपने ही साधनों यानी लिखित शब्द के साथ ही अपना कार्य करना चाहिए। सभी सम्मान जो लेखक को प्राप्त होते हैं, वो उसके पाठक पर एक ऐसा दबाव बनाते हैं जिसे वो सही नहीं मानते थे।“ 
यह सही है कि तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवियों में सार्त्र जैसी सार्वजनिक स्वीकृति और उससे उपजी
नैतिक ताकत आज कम ही दिखाई देती है, पर इसकी उम्मीद रखना कोई गलत भी तो नहीं है, क्योंकि यह मनोभाव एक इंसानी जिंदगी की पूर्व शर्त होती है।

बौद्धिक बुलाये गए'

-अज्ञेय

हमें 
कोई नहीं पहचानता था।
हमारे चेहरों पर श्रद्धा थी।
हम सब को भीतर बुला लिया गया।
उस के चेहरे पर कुछ नहीं था।
उस ने हम सब पर एक नज़र डाली।
हमारे चेहरों पर कुछ नहीं था।
उस ने इशारे से कहा इन सब के चेहरे
उतार लो।
हमारे चेहरे उतार लिये गये।
उस ने इशारे से कहा
इन सब को सम्मान बाँटो :
हम सब को सिरोपे दिये गये
जिन के नीचे नये
चेहरे भी टँके थे
उस ने नमस्कार का इशारा किया
हम विदा कर के
बाहर निकाल दिये गये
बाहर हमें सब पहचानते हैं :
जानते हैं हमारे चेहरों पर नये चेहरे हैं।
जिन पर श्रद्धा थी
वे चेहरे भीतर
उतार लिये गये थे : सुना है
उन का निर्यात होगा।
विदेशों में श्रद्धावान् चेहरों की
बड़ी माँग है।
वहाँ पिछले तीन सौ बरस से
उन की पैदावार बन्द है।
और निर्यात बढ़ता है
तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती हैl’


Ravinder Goel 106 Vaishali Pitampura Delhi-110088 Tel: (R) 42455072, 981134338

Friday, 5 August 2016

यूपी चुनाव : लुटेरों और दंगाइयों के बीच फंसी जनता / मनोज कुमार झा

उत्तर प्रदेश में एक तरह से चुनाव का बिगुल फूंक दिया गया है। सभी पार्टियां विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग गई हैं। पर मुद्दा किसी के पास नहीं है। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो उसके पास सदाबहार मुद्दा है राममंदिर का, अब गाय का मुद्दा जुड़ गया है। दादरी कांड कर भाजपा और संघ परिवार ने अपने गो-प्रेम का अच्छा परिचय पहले से दे रखा है, जिसकी पोल मोदी जी के गुजरात में ही खुल गई। दादरी कांड में पूरी तरह भद्द पिटने के बावजूद संघ परिवार को अक्ल नहीं आई और अब भीड़ के द्वारा मारे गए अखलाक के परिवार पर ही मुकदमा दर्ज किया गया है। यह सब विचित्र है, पर विचित्रता तो ही इस संघ सरकार की विशेषता है। दूसरा ताजा प्रकरण है दलितों की देवी मायावती को भाजपा के एक नेता द्वारा गालियों से नवाजा जाना। सभी जानते हैं कि मायावती क्या हैं और दलितों के लिए उन्होंने क्या किया है। लेकिन सरेआम एक महिला नेता को गंदी गाली देना एक ऐसा काम था, जिसका बचाव भाजपा भी नहीं कर सकी और दयाशंकर को पार्टी से निलंबित कर दिया। लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। दूसरी तरफ, मायावती के अनुयायियों ने भी गाली का बदला जोरदार गालियों से लिया। ये मायावती का तरीका है। ईंट का जवाब पत्थर से। भाजपा को भूलना नहीं चाहिए कि एक समय वह मायावती से साथ यूपी में साझे में सरकार बना चुकी है। उसे वह अनुभव नहीं भूलना चाहिए। भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो रास्ते वे अख्तियार करना चाहते हैं, उनमें मायवती उन पर बीस ही पड़ेंगी।


बहरहाल, यूपी में जो परिस्थितियां बनती जा रही हैं, उनमें मायावती के लिए जीत की राह आसान लगती है। मायावती पर गालियों की बौछार ने दलित और पिछड़ें वोटों का ध्रुवीकरण लगभग उनके पक्ष में कर दिया है। ऐसे भी कांग्रेस की कमजोर स्थिति के कारण पहले से उनके सत्ता में आने की भविष्यवाणी की जा रही है। समाजवादी पार्टी का सूपड़ा इस चुनाव में साफ होना है, इसमें दो राय नही है। समाजवादी पार्टी ने भ्रष्टाचार के साथ ही शासन के सभी चूलों को हिला कर रख दिया है और लंबे समय से लगता रहा है कि यूपी का कामकाज बिना किसी सरकार के ही चल रहा है। मुलायम ने जितना अवसरवाद और लंपटपना दिखाया है, वह अभूतपूर्व है। सपा पूरी तरह उनकी पारिवारिक पार्टी बन कर रह गई है। राज्य में जनभावना उनके खिलाफ है और सपा को चुनाव में भारी पराजय के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगना है। कांग्रेस के लिए उसके इलेक्शन स्ट्रैजिस्ट प्रशांत किशोर दिन-रात एक कर रहे हैं। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर ब्राह्मण और अगड़ी जातियों के वोटरों को रिझाने की कोशिश की गई है, पर भूलना नहीं होगा कि एक समय मायावती ने ब्राह्मण वोटरों को सफलतापूर्वक अपने पक्ष में कर लिया था। वे फिर ऐसा ही दांव आजमाएंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। कांग्रेस की नीति आगे चल कर प्रियंका गांधी को भी चुनाव प्रचार में उतारने के साथ कांग्रेस में अहम पद देने की भी है। चुनाव प्रचार तो वे पहले से करती रही हैं, पर पार्टी में उन्हें क्या भूमिका दी जाएगी और वे क्या कर पाएंगी, यह अभी साफ नहीं हुआ है। चर्चा है कि सोनिया गांधी रिटायर होंगी और राहुल पार्टी की कमान संभालेंगे। पर अभी तक राहुल ने जो किया है, उससे बहुत उमामीद नहीं बंधती। यद्यपि यह उम्मीद की जा सकती है कि वोट मैनेजमेंट के नये फंडों से शायद कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन इतनी तो हर्गिज नहीं मिलेगी कि कांग्रेस यूपी में सरकार बना सके।


सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा यूपी चुनावी दंगल में दूसरी कोई पार्टी नहीं है। सपा साफ है। कांग्रेस अवश्य पहले से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन समीकरण बसपा के पक्ष में दिख रहे हैं। यहां पेंच सिर्फ ये है कि क्या बसपा बहुमत हासिल कर सकेगी। राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि बसपा नंबर-एक पर रहेगी तो जरूर, पर अपने दम पर सरकार बना सकने लायक शायद सीटें न ला सके। ऐसी स्थिति में वह सरकार बनाने के लिए क्या करेगी, यह देखने वाली बात होगी और यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी उसके बाद सबसे ज्यादा सीटें ला पाती है। सपा तो पारिवारिक पार्टी है। जैसे लोकसभा चुनाव में परिवार के सदस्य जीते, उसी भांति यूपी चुनाव में भी परिवार के सदस्य जीत सकते हैं, पर उससे तो मायावती का छत्तीस का रिश्ता है और रहेगा भी। भाजपा के प्रबल होने की स्थिति में मायावती के लिए संकट ज्यादा होगा। वैसे, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम समय में बसपा और भाजपा मिल कर भी सरकार बना सकती है। यह राजनीति में कुछ भी हो सकता है इस सिद्धांत के आधार पर कहा जा रहा है। लेकिन यदि कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलीं तो क्या मायावती उससे गठबंधन करेंगी, यह सवाल महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान स्थितियों में यूपी में मायावती को ही सत्ता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। उनके पास वह शक्ति यानी जनबल, धनबल और कौशल है कि वे अपेक्षानुरूप सीटें जीत सकें। मुलायम के कुशासन से आजिज आ चुके लोग एक बार मायावती को मौका देने के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


अब सवाल भाजपा का है कि वह क्या करेगी। वह तो वही करेगी जो पहले से करती आ रही है यानी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण। दंगे की साजिश रचना और दंगा करवाना ताकि ऐन वक्त पर वोटों का ध्रुवीकरण हो सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भाजपा ने दंगों की उर्वर भूमि बना ही रखा है। गुजरात के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही संघ परिवार के लिए साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला है। राममंदिर के मुद्दे में ज्यादा दम नहीं। पर संघ परिवार को लगता है कि गाय और गोमांस में दम है। इसके बूते कुछ लोगों की हत्या की जा सकती है, दंगे भड़काए जा सकते हैं और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकता है। इसलिए वह यूपी चुनाव में इसी को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन गुजरात का सच भी है कि किस तरह से वहां दलित समुदाय का गोमांस के मुद्दे पर उत्पीड़न किया गया। भाजपा को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जिस हिन्दू वोटों की बात वो करती है, उसमें ही दलित-महादलित जैसे वोटबैंक भी हैं, जिन पर पहला दावा मायावती का और बचा-खुचा कांग्रेस का है। भाजपा और संघ के रणनीतिकारों को यह याद रखना चाहिए कि गाय और गोमांस पर खून-खराबा कर सत्ता में आना अब उसके लिए शायद आसान न हो, क्योंकि जनता भले चुपचाप हो, देख-समझ तो सब रही है। वहीं, मुस्लिम वोट बैंक भी अब मुलायम से पूरी तरह दूर होता जा रहा है। यूपी के मुसलमानों को यह समझ में आने लगा है कि मुलायम जिन्हें एक समय मौलाना तक कहा जाने लगा था, उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकते। उन्हें अपने कुनबे से आगे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। जाहिर है, ऐसी हालत में मुस्लिम वोट बैंक बसपा और कांग्रेस के बीच बंटेगा।



एक सवाल ये भी सामने आ रहा है कि कहीं भाजपा और सपा हताशा में कोई दुरभिसन्धि न  करक लें, यानी जीत न रहे हों तो खेल को बिगाड़ने की कोशिश करें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में मुलायम और सपा की भूमिका भी संदिग्ध रही है। अगर ऐसा हुआ तो भी इन्हें ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो सकेगा, बल्कि इनका नंगापन खुल कर सामने आ जाएगा। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है कि यूपी विधानसभा चुनावों में मायावती एक बार फिर सबसे ताकतवर हो कर उभरेंगी। यह परिवर्तन भले ही बहुत सकारात्मक न हो, लेकिन भाजपा के मुकाबले एकमात्र विकल्प है। जब तक जनविकल्प की शक्तियां सामने नहीं आती हैं, जनता के सामने इसके सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं है कि वह कभी इसे तो कभी उसे आजमाए।