Monday, 31 October 2016

कुनबे में घमासान के साथ ही तय है सपा का पतन/मनोज कुमार झा

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले मुलायम के कुनबे में जो ड्रामेबाजी शुरू हुई है, उससे यह साफ हो गया है कि समाजवादी पार्टी का हाल क्या होने वाला है। पहले भी कहा जा रहा था कि मुलायम के कुनबे में सत्ता की बंदरबांट को लेकर अंदर ही अंदर घमासान चल रहा है, पर चुनाव के पहले यह सतह पर आ गया और देश भर में चर्चा का विषय बन गया। दरअसल, समाजवादी पार्टी का मतलब एक तरह से मुलायम का कुनबा ही रह गया है। गत लोकसभा चुनाव में सपा को उन्हीं सीटों पर जीत हासिल हुई, जिन पर मुलायम परिवार के सदस्य खड़े हुए थे। अन्य किसी सीट पर जीत नहीं मिली।


सभी जानते हैं कि मुलायम ने सपा को परिवारवाद की बुनियाद पर खड़ा किया है। सपा में जितने भी प्रमुख पद हैं, सब मुलायम के परिवार वालों के पास ही हैं। अब परिवार में भी धड़े और गुट बन गए और अंतर्कलह शुरू हो गया। इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बन रही थी। इसके पीछे मुख्य बात यह लगती है कि मुलायम और सपा के अन्य कर्णधारों को यह समझ में आ गया है कि विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ेगा, तो इसके लिए आखिर ठीकरा किस पर फोड़ा जाएगा। इसके साथ ही ढहते हुए वोट बैंक के चलते मुलायम और उनके सलाहकारों में बौखलाहट की स्थिति पैदा हो गई है। वे चाह रहे हैं कि किसी तरह कुछ ऐसे उपाय किए जाएं जिससे उनका वोट बैंक पूरी तरह तो न ढहे। इसलिए मुलायम ने पार्टी और सरकार में कुछ बदलाव करना चाहा।



भूलना नहीं होगा कि मुलायम समय-समय पर मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश की भूमिका की आलोचना भी करते रहे हैं। अखिलेश की स्थिति ये है कि वे स्वतंत्र रूप से कुछ भी कर पाने में कभी समर्थ नहीं रहे। उन पर हमेशा मुलायम और अपने चाचा शिवपाल यादव का दबाव बना रहा। इस बीच, कुछ ऐसी बातें हुईं जिनका अखिलेश ने विरोध किया, जैसे मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय का, जिसका शिवपाल समर्थन करते थे और मुलायम भी चाहते थे कि इस माफिया की मदद चुनाव जीतने में ली जाए। पर अखिलेश के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका। इस बीच, अखिलेश ने कुछ भ्रष्ट मंत्रियों को भी हटाया जो शिवपाल के गुट के थे। इससे सपा में खलबली मची और अखिलेश का विरोध शिवपाल ने किया। रस्साकशी चलने लगी। मुलायम ने अखिलेश के पर संगठन में कतर दिए तो बदले में अखिलेश ने शिवपाल से कई विभाग छीन लिए। इसके बाद सत्ता संघर्ष तेज हो गया। अखिलेश के खिलाफ साजिश में मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना, उसका बेटा प्रतीक यादव भी शामिल बताए जाते हैं। कहा जा रहा है कि साधना चाहती है कि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार प्रतीक को घोषित किया जाए। मुलायम के बारे में बताया जाता है कि वे पूरी तरह से अपनी पत्नी, अमर सिंह और अपने भाई शिवपाल यादव के पक्ष में हैं। यही कारण है कि उन्होंने अखिलेश के विरुद्ध सार्वजनिक तौर पर कई बातें कही। बहरहाल, ऐसी खबरें मीडिया में चलीं कि मुलायम की दूसरी पत्नी साधना ने अपने बेटे के लिए राजगद्दी और सौतेले बेटे अखिलेश के लिए वनवास मांगा है। लेकिन साधना के बेटे प्रतीक की कोई राजनीतिक पहचान है ही नहीं।  हालत तो ये है कि अगले विधानसभा चुनाव में सपा की जीत की कोई संभवाना ही नज़र नहीं आती। ऐसे में, मुलायम के कुनबे में कलह के सामने आने से सपा का और भी नुकसान होगा, इसमें दो राय नहीं है। गायत्री प्रजापति जैसे भ्रष्ट मंत्री को जिसे अखिलेश ने हटा दिया था, शिवपाल के दबाव पर मुलायम ने फिर से मंत्री बनवाया। इससे बहुत गलत संदेश गया है। लोग ये समझ रहे हैं कि मुलायम पूरी तरह सत्ता के दलाल अमर सिंह के प्रभाव में हैं, जो काफी समय के बाद सपा में लौटा है। वह शुरू से ही अखिलेश का विरोधी रहा है, क्योंकि अखिलेश उसके हिसाब से नहीं चलते।


सपा में दो ध्रुव बन गए हैं। एक में मुलायम, शिवपाल और अमर सिंह हैं, दूसरे में रामगोपाल यादव और अखिलेश हैं। दोनों जोर-आजमाइश कर रहे हैं। यह कुनबे में सत्ता हासिल करने की लड़ाई है, जो एक तरह से व्यर्थ है, क्योंकि विधानसभा चुनाव परिणाम जब सामने आएगा तो यह कुनबा राजनीतिक शक्ति से शून्य हो जाएगा। यह अलग बात है कि लंबे समय से सत्ता में रहने के कारण इनके पास बेशुमार दौलत है, भरपूर काला धन है जिसे लेकर मुलायम को कभी भी जेल जाना पड़ सकता है। जेल जाने से बचने के लिए ही ये यूपीए सरकार के दौरान ये सोनिया के तलवे चाटते रहे और अभी भी मोदी-अमित शाह से मधुर संबंध बना के रखते हैं। ये जब भी मुख्यमंत्री रहे, इन्होंने खुल कर गुंडों और माफिया तत्वों को प्रश्रय दिया, अभी भी दे रहे हैं। इसका अखिलेश विरोध करते हैं तो उन पर दबाव डालते हैं। अखिलेश जानते हैं कि चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जनता को भरोसे में लेना होगा और अपराधियों पर लगाम कसने से जनता का भरोसा उन पर बढ़ेगा। पर यह बात शिवपाल को बुरी लगती है। सारी आमदनी का जरिया तो माफिया ही है। सत्ता में उसे भागीदारी नहीं देंगे तो काम कैसे चलेगा। भूलना नहीं होगा कि यूपी की सत्ता पर लंबे समय से माफिया का नियंत्रण रहता आया है। चाहे सरकार बसपा की रही हो, भाजपा की या सपा की। बसपा-भाजपा गठबंधन सरकार में सत्ता पर पूरी तरह माफिया हावी था और यह साझे में लूट के लिए बना था, पर बाद में मायावती ने भाजपा को अंगूठा दिखा दिया था। जब बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो उसे गुंडा राज कहा जाने लगा। लेकिन मुलायम की छत्रछाया में बनी अखिलेश सरकार को महागुंडा राज कहा गया। यानी सत्ता में कोई भी दल आए, असली बात यही है कि माफिया ही राज करेगा। अब किसका माफिया करेगा, किसका हित साधेगा, लड़ाई इस बात को लेकर है। फिर भी मुलायम के कुनबे में जो संघर्ष चला है और जैसी छीछालेदर हुई है, उससे यह बहुत साफ हो गया है कि जब एक पर्टी के स्वामित्व वाले दल में इतनी गुटबाजी है, तो अन्य दलों की स्थिति क्या होगी जिनका अस्तित्व ही गुटों पर आधारित है। कांग्रेस भी एक परिवार की पार्टी है, पर वहाँ सत्ता की दावेदारी के लिए सड़कों पर ऐसा संघर्ष हो, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। इसकी वजह सिर्फ यही है कि परिवार में सत्ता का कोई दूसरा दावेदार ही नहीं है एक को छोड़ कर।


बहरहाल,  मुलायम के कुनबे में हुए वर्चस्व के इस संघर्ष ने साबित कर दिया है कि ये क्षेत्रीय दल किस हद तक पतन के गर्त में जा चुके हैं। इन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि इनके पाँवों तले ज़मीन खिसकती जा रही है, पर सत्ता के नशे में बदमस्त हो कर ये सुध-बुध खो बैठे हैं। मुलायम ने अपने जन्मोत्सवों और सैफई महोत्सवों से जो नाम कमाया है, वह उन्हें डुबोने के लिए काफी है। धनलिप्सा और तरह-तरह के कुटैब से घिरा ये शख्स अमर सिंह के चंगुल में इसीलिए फंसता है, क्योंकि वह इसे ब्लैकमेल करता है। वह परले दर्जे का दलाल है और उसकी सांठगांठ कई दलों के नेताओं से है। उसने मुलायम की कमजोर नस पकड़ रखी है और उसका फायदा उठा रहा है। ऐसे में, सपा का भविष्य क्या होने जा रहा है, यह समझा जा सकता है। यूपी के मतदाताओं का भरोसा सपा पर नहीं रहा, लेकिन कहा जा रहा है कि मतदाताओं के एक वर्ग में अखिलेश के प्रति सहानुभूति का भाव भी उमड़ रहा है। अब इसका कितना फायदा अखिलेश को मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। वैसे तमाम उटापठक के बाद मुलायम इस बात पर राजी हो गए हैं कि संगठन में प्रमुख शिवपाल रहेंगे और मुख्यमंत्री पद का चेहरा अखिलेश बनेंगे। लेकिन दोनों में विश्वास की कमी इतनी ज्यादा हो गई है कि कब फिर कैसा विवाद और झगड़ा सामने आ जाएगा, कहा नहीं जा सकता।


कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मुलायम के कुनबे में हुई इस कलह का फायदा भाजपा को मिलेगा तो कुछ कहते हैं कि इसका फायदा कांग्रेस को मिलेगा। यहाँ यह देखना जरूरी है कि अगर यह सपा में यह ड्रामेबाजी नहीं होती तो क्या उसे फायदा मिलने जा रहा था। क्या वह यूपी में सरकार बनाने की दावेदार पार्टी के रूप में थी? कहा जा सकता है कि ऐसा कभी नहीं था। यूपी की जनता मुलायम-अखिलेश के शासन से परेशान हो चुकी है, गुंडों, माफिया और बलात्कारियों का आतंक चरम पर है। मुलायम-अखिलेश जनता को लॉलीपॉप दिखाते हैं। करोड़ों की लगात से अपने लिए पांच सितारा ऑफिस बना कर उसे अपने शासन की उपलब्धि बताते हैं। जनता के पास विकल्प की कमी है, पर इसका मतलब ये नहीं कि वह बेवकूफ है। तमाम दल के नेता जनता को यानी वोटरों को बेवकूफ मान कर ही चलते हैं। यूपी के वोटरों का मुलायम-अखिलेश सरकार से इस कदर मोहभंग हो गया है कि मुलायम कुनबे में वर्चस्व का यह विवाद सामने नहीं भी आता तो भी उसे जाना ही था। अगले विधानसभा चुनाव में सपा का सूपड़ा साफ होना है। जीत किसे मिलती है, यह अलग बात है। भाजपा किसी खुशफहमी में न रहे, क्योंकि मोदी जी के भाषणों और अमित शाह की कुटिल चालों से जनता परेशान हो गई है। कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाएं तो मिल जाएं, पर वह सरकार बनाएगी, इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस की खटिया लूटी जा चुकी है यूपी में। अब यह पार्टी पूरी तरह बेदम हो चुकी है। सवाल है, फिर सरकार किसकी बनेगी। बार-बार धोखा खाने वाली जनता ही इसका जवाब समय पर दे देगी। उसके पास विकल्प है नहीं। विकल्पहीनता की स्थिति में आत्मघात की स्थितियाँ ही बनती हैं। 

Thursday, 15 September 2016


यौन शोषण का मकड़जाल : सभी पार्टियों में हैं भेड़िए/श्यामा राय





क्या दामिनी की वेदना का कोई मोल नहीं? आज भी न जाने कितनी ही दामिनियों का दमन हो रहा है। यह चक्रवात थमने का नाम ही नहीं ले रहा। आज भी 16 दिसम्बर 2012 की वह घटना सबके दिलों को झकझोर देती है। लेकिन बलात्कार और यौन शोषण की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ती ही चली जा रही हैं। सबसे विडंबनापूर्ण बात तो यह है कि जिन पर कानून-व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, वे ही लोग बलात्कार और यौन शोषण में लिप्त पाए जा रहे हैं। अभी हाल में ही राजनीतिक जीवन में शुचिता और नैतिकता का दावा करने वाली पार्टी आप के मंत्री संदीप कुमार का सेक्स स्कैंडल सामने आया।



किसी को जल्दी विश्वास नहीं हो रहा था कि दिल्ली के महिला एवं बाल विकास मंत्री जिन पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है, वह अपने कर्तव्य का निर्वाह इस प्रकार कर रहे हैं। जब उनकी अश्लील सीडी सामने आई तो लोगों का विश्वास राजनीतिक नेताओं से उठने लगा। यह ठीक है कि अरविंद केजरीवाल ने उन्हें बर्खास्त कर दिया, पर इस घटना ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। दूसरी तरफ, संदीप कुमार ने यह दलील दी कि उसे दलित होने के कारण इस सेक्स स्कैंडल में फंसाया गया है। यह बात किसी के गले उतरने वाली नहीं थी। सबसे गलत तो यह रहा कि आप के नेता पूर्व पत्रकार आशुतोष ने संदीप कुमार का यह कह कर बचाव करने की कोशिश की कि यह दो वयस्क लोगों के बीच सहमति से बनाया गया संबंध था और इस पर सवाल नहीं खड़े किए जाने चाहिए। आशुतोष ने इस क्रम में यह भी कह दिया कि नेहरू, गाँधी जैसे नेताओं के ऐसे संबंध रहे हैं। यह सरासर गलत है। संदीप कुमार के भ्रष्ट और आपराधिक आचरण के बचाव में आशुतोष जैसे पत्रकार का यह कहना उसके मानसिक दिवालियेपन को ही दिखाता है। लेकिन सिर्फ आशुतोष ही नहीं, कुछ और लोग जो ऊंचे पदों पर रह चुके हैं, इसी तरह का तर्क दे रहे थे। इससे समझा जा सकता है कि स्त्रियों को लेकर मान्य और प्रतिष्ठित कहे जाने वाले लोग कैसा विचार रखते हैं। फिर अपराधियों की बात ही क्या है। बाद में संदीप कुमार के साथ सीडी में नजर आने वाली महिला सामने आई और सुल्तानपुरी थाने में उसने कहा कि राशन कार्ड बनवा देने के बहाने संदीप कुमार ने उसे बुलाया था और फिर दुष्कर्म किया था। बहरहाल, महिला के साथ यौन संबंध उसकी सहमति से बनाए गए या दबाव डाल कर या प्रलोभन देकर, यह ज्यादा मायने नहीं रखता, महत्त्वपूर्ण है मंत्री का अनैतिक आचरण जिसका बचाव उसकी पत्नी ने भी किया। उसके परिवार वाले ने भी किया और सबसे बढ़ कर संदीप कुमार ने अपने बचाव में दलित होने का तर्क दिया। कहा तो यहां तक जाता है कि वह सीडी अरविंद केजरीवाल के पास मीडिया में आने के पंद्रह दिन पहले ही पहुंच चुकी थी, पर उन तक सीडी पहुंचाने वाले ने कहा कि वे उसे दबाकर बैठे रहे। आखिरकार उसने मीडिया में सीडी दी। तब सारा मामला खुला।



इसी बीच, पंजाब के संगरूर में आप नेता विजय चौहान का नाम भी यौन शोषण के मामले में आया। विजय चौहान पंजाब का नहीं है। वह दिल्ली में आप का सक्रिय नेता था और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय था। पंजाबी अच्छी-खासी बोल लेने के कारण अरविंद केजरीवाल ने उसे इलेक्शन के प्रचार और संगठन आदि के काम के लिए पंजाब भेजा। वहां उसने ऑफिस मेड का यौन शोषण करना शुरू कर दिया। यह शोषण उसने लगातार जारी रखा। आखिरकार, तंग आकर उस मेड ने उससे रहम की भीख मांगी और उसे छोड़ देने को कहा, पर विजय चौहान उसे बहलाता-फुसलाता रहा। इसकी भी ऑडियो सीडी बन गई। सीडी मीडिया में आ गई। सारी बात पंजाबी में दर्ज है, जिसमें मेड कह रही है कि क्यों वह उसकी इज्जत के साथ खेल रहा है, उसके पति और रिश्तेदारों को पता चल जाएगा तो क्या होगा और विजय चौहान उसे बहला-फुसला रहा है। इस मामले में विजय चौहान पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वह आरोपों से इनकार कर रहा है। पर सीडी में उसकी ही आवाज है पंजाबी में जो मीडिया के पास मौजूद है। विजय चौहान अन्ना आन्दोलन में सक्रिय था। अरविंद केजरीवाल भी अन्ना आन्दोलन की ही पैदावार हैं। आम आदमी पार्टी के दो वॉलन्टियर्स ने ही विजय चौहान की दरिंदगी का भंडा सीडी बना कर फोड़ा था, अन्यथा किसी को इसकी खबर नहीं मिल पाती।



आप के एक और एमएलए पर यौन शोषण और छेड़छाड़ का आरोप लगा है। इसके साथ ही दिल्ली के आप विधायक देवेन्द्र सहरावत ने यह आरोप लगया है कि पंजाब में विधायकी का टिकट देने के लिए महिलाओं का शोषण किया जा रहा है। सहारावत ने कहा है कि उन्होंने इस बारे में अरविंद केजरीवाल को बताया है, पर वे कुछ सुनने को तैयार नहीं। तब जाकर उन्होंने मीडिया में यह बात रखी। बहरहाल, ऐसी घटनाएं महज किसी विशेष पार्टी से ही ताल्लुक नहीं रखतीं। भारतीय जनता पार्टी से जुड़े टीनू जैन का नाम भी सेक्स रैकेट में सामने आ चुका है। उसकी तस्वीरें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी, राजनाथ सिंह और भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ हैं। वह नरेंद्र मोदी सेना का स्वयंभू अध्यक्ष भी है। भाजपा के बड़े नेताओं के साथ संबंधों के रसूख के बल पर वह ग्वालियर से हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट चला रहा था। सिर्फ यही नहीं, यौन शोषण करने वाले नेताओं और उनके गुर्गों की किसी दल में कमी नहीं है। आश्चर्य की बात ये है कि सार्वजनिक मंचों पर ये ही बढ़-चढ़ कर स्त्रियों के सम्मान रक्षा की बात करते हैं और बेटी बचाओ अभियान चलाते हैं।





ऐसे ही नेता महिलाओं पर तंज़ कसते हुए उनकी वेशभूषा पर टिप्पणी करते हैं। उन्हें तन को पूरी तरह से ढंक कर रहने की सलाह देते हैं। पर सच्चाई तो यह है कि वे खुद स्त्रियों के यौन शोषण में लिप्त रहते हैं। वैसे लोगों को संरक्षण देते हैं जो बलात्कारी हैं। सिर्फ आप ही नहीं, न ही भाजपा, तमाम दलों में ऐसे लोगों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। भूलना नहीं होगा कि हाल ही में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में एक वामपंथी छात्र संगठन आइसा का बड़ा नेता अनमोल रतन एक छात्रा के साथ बलात्कार और ब्लैकमेल के मामले में लिप्त पाया गया। वह महीनों से एक शोध छात्रा का भयादोहन कर यौन शोषण कर रहा था। अंत में तंग आकर छात्रा ने पुलिस में उसके खिलाफ मामला दर्ज कराया। कई दिनों तक जेएनयू कैम्पस में छुपे रहने के बाद जब उसे लगा कि बच पाना संभव नहीं होगा तो उसने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और अभी तिहाड़ में बंद है। अनमोल रतन हाई प्रोफाइल छात्र नेता था। वह टीवी पर होने वाली बहसों में बुलाया जाता था और टीवी पर स्त्री स्वतंत्रता वगैरह विषयों पर जम कर बोलता था। दामिनी रेप कांड के खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों में भी उसने बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। जब ऐसा व्यक्ति बलात्कारी निकले तो जनता किस पर विश्वास करे। दरअसल, यह विश्वास के टूटते और खत्म होते जाने का समय है। राजनीति में भेड़िया युग है। बलात्कारी सभी पार्टियों में भरे हैं, चाहे आप हो, भाजपा हो या लेफ्ट। हर जगह आपराधिक मानसिकता के लोग भरे पड़े हैं और उन्हें सुरक्षा भी मिली हुई है। ऐसे में जनता को, खासकर औरतों को सोचना होगा कि वे क्या करें, कौन-सा कदम उठाएं।

Wednesday, 31 August 2016

जनता भूखे भजन करे, अब विधानसभा और संसद में मुनियों के प्रवचन होंगे - मनोज कुमार झा

हरियाणा विधानसभा में जैन मुनि तरुण सागर ने प्रवचन दिया। धर्म को पति और राजनीति को पत्नी बताया। यह कहा कि जैसे पत्नी पर पति का प्रभुत्व होता है, वैसे ही राजनीति पर धर्म का प्रभुत्व होना चाहिए। इस तरह धर्म और राजनीति के गठजोड़ की व्याख्या कर दी मुनिवर ने। दिगंबर जैन मुनि नग्न रहते हैं और विधानसभा को भी उन्होंने नग्नावस्था में ही संबोधित किया। भारतीय इतिहास में संभवत: किसी भी जनप्रतिनिधि सदन में किसी धर्मगुरु के संबोधन का यह पहला मामला है। यह मोदी (आरएसएस) के शासन में ही संभव हुआ। इस पर काफी कड़ी प्रतिक्रिया भी आ रही है, पर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के किसी अन्य नेता की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है, न आएगी। ऐसा इसलिए कि यह सब उनके द्वारा ही प्रायोजित है। संभव है, इसके बाद भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी बाबाओं-धर्मगुरुओं को प्रवचन देने के लिए बुलाया जाए।


 बहरहाल, इस पूरी परिघटना और प्रवृत्ति पर मार्क्सवादी आलोचक-चिंतक अरुण माहेश्वरी ने जो टिप्पणी की है, वह गौर करने वाली है। उन्होंने लिखा है,“यह है भारतीय राज्य का चरित्र। यह घनघोर असभ्य और अशिक्षित जनों के राज्य में बदलता जा रहा है। सारी दुनिया इस गंदगी को देख रही है। इसीलिये हम फ्रांस की सरकार के बुर्कों पर पाबंदी लगाने के फ़ैसले का तहे दिल से स्वागत करते हैं। कोई भी सभ्य राज्य अपनी सीमा में मध्ययुगीन असभ्यताओं के आयात की अनुमति नहीं दे सकता। अमेरिका ने हाल में उस भाजपाई सांसद को वीजा देने से इनकार कर दिया जो यहां यज्ञ के धुएं से ओज़ोन परत में दरार को पाटने की बात करता है। अमेरिकी दूतावास ने बहाना बनाया है कि उसे वहां पगड़ी पहन कर नहीं जाने दिया जायेगा। अभी का भारतीय राज्य हमारे यहां मध्ययुगीन बर्बरताओं को आमंत्रित कर रहा है।“ यह टिप्पणी खास महत्व रखती है। देखने में यह आ रहा है कि जब से मोदी सरकार आई है, उसने अवैज्ञानिक विचारों को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया है। यह सब राज्य प्रायोजित है। आरएसएस की विचारधारा क्या रही है, उससे सभी परिचित रहे हैं। पर विडंबना यह है कि राज्य अब आरएसएस के हाथ में है। इसलिए राजकीय संस्थाओं, विधानमंडलों और अन्य मंचों पर इस तरह की गतिविधियां देखने को मिल रही हैं। लगभग सभी शैक्षणिक और शोध संस्थानों में आरएसएस के लोग बैठाए चुके हैं। विश्वविद्यालयों में आरएसएस समर्थक लोगों को भरा जा रहा है। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैज्ञानिकों के सम्मेलनों में घोर अवैज्ञानिक बातें बोलते सुने जा चुके हैं।


यहां यह भूलना नहीं होगा कि मोदी के सत्ता में आते ही हिंदूवादी कट्टर तत्वों ने गोविंद पानसारे, दाभोलकर समेत कई लोगों की हत्या कर दी जो अंधविश्वास के खिलाफ अभियान चला रहे थे, कितने बुद्धिजीवियों और लेखकों को जान से मारने की धमकियां दी और भी न जाने कितने उत्पात किए। इस तरह, मोदी सरकार ने प्रगति-विरोधी कूढ़मगज तत्वों को खुल कर संरक्षण दिया। आरएसएस प्रमुख एवं इनके समर्थक साधु-संतों-बाबाओं के लगातार बयान आते रहते हैं कि हिंदू ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। ऐसे-ऐसे घृणित बयान आते हैं जो पहले कभी नहीं आए। लेकिन उन्हें रोकने-टोकने वाला कोई नहीं है। अब इन्हें राज्य का समर्थन प्राप्त है।


क्या हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर ने एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा कि जैन मुनि को सदन में बुलाकर वे कितना बड़ा संविधान-विरोधी काम कर रहे हैं। भारत का संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता कि किसी भी धर्मगुरु को विधानसभा या संसद में प्रवचन देने के लिए बुलाया जाए। आश्चर्य की बात तो यह है कि विरोधी दल भी इस पर चुप रहे। जबकि अन्य मुद्दों पर वे तत्काल हंगामा करने लगते हैं। दरअसल, देश मे मोदी सरकार और हरियाणा में खट्टर सरकार दूसरे दलों की नाकामी की वजह से ही आ पाने में सफल हो सकी है। कल को क्या ये दूसरे धर्मों के गुरुओं को भी सदन में आमंत्रित करेंगे या सिर्फ नंगे बाबाओं को ही बुलाकर प्रवचन सुनेंगे। बहरहाल, जैनमुनि तरुण सागर का प्रवचन बहुत ही सांकेतिक रहा। धर्म पति है, राजनीति पत्नी। धर्म और राजनीति के गठबंधन को आरएसएस की विचारधारा के अनुकूल व्याख्यायित कर दिया मुनि ने। अब सवाल है कि क्या हरियाणा विधानसभा में हुए इस असंवैधानिक कृत्य का न्यायालय संज्ञान लेगा और खट्टर आदि महात्माओं से पूछेगा कि ऐसी नाजायज हरकत उन्होंने क्यों की। इसकी संभावना बहुत ही कम लगती है। इस लोकतंत्र में न्यायालय की अपनी सीमाएं हैं और वहां भी संघी मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं है।


भूलना नहीं होगा कि चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने किस तरह हरियाणा के माफिया मठाधीश संत राम रहीम का समर्थन लिया था, जिस पर बलात्कार और हत्या के केस हैं और जिसके पास कितनी दौलत है, उसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वह फिल्में बनाता है, उनमें अभिनय करता है और स्वयं को सर्वशक्तिमान बतलाता है। खट्टर सरकार का उससे संपर्क लगातार बना रहता है। अभी हाल मे स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज उससे मिलने गए थे। क्या खट्टर सरकार ऐसे बाबाओं और महंतों से दिशा-निर्देश लेती है?  इसमें कोई दो राय नहीं कि खट्टर सरकार और जहां भी भाजपा की सरकार है, वहां ऐसे ही समाज-विरोधी लोग सत्ता के सबसे ऊंचे पायदान पर हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ था। पर जो कभी नहीं हुआ था, वही भाजपा के राज में होगा। लोग तमाशा देखते रहें। हर तरह के अपराधियों और बलात्कारियों को इस राज में पूरी तरह छूट मिली हुई है। रोज ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं। उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है।


सवाल है, ऐसा कब तक चलता रहेगा? क्या लोगों की चेतना कुंद हो चुकी है? लगता तो ऐसा ही है। लोगों का प्रतिरोध किसी न किसी संगठन के माध्यम से सामने आता है। ऐसा कोई संगठन नज़र नहीं आता। कुछ संगठन हैं भी तो बहुत कमजोर हाल में हैं और उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर ही रह जाती है। विरोधी दलों में कोई संभावना नहीं दिखती। चौटाला बाप-बेटे जेल में हैं। कांग्रेस की जो हालत है, लोग देख ही रहे हैं। वामपंथी भी गहन निद्रा में हैं। ऐसे में, अब जनता भूखे रह कर भजन करे और मुनियों-बाबाओं का प्रवचन सुने। दूसरा कोई उपाय है नहीं।

Sunday, 28 August 2016

यूपी चुनाव : गाय, दंगा और दलित - मनोज कुमार झा

भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के लिए अब गाय मुसीबत बन गई है। ऐसी ख़बरें आईं हैं कि आरएसएस के अपने सर्वे में भाजपा यूपी चुनाव में चौथे नंबर पर आती दिख रही है। पंजाब में तो सूपड़ा साफ होने की नौबत है। गुजरात में भी हाहाकार की स्थिति बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अभी गुजरात में चुनाव हों तो भाजपा चारों खाने चित हो जाएगी। गुजरात में स्थिति गंभीर होने के कारण मोदी-अमित शाह और आरएसएस के रणनीतिकारों ने जल्दबाजी में आनंदीबेन का इस्तीफा लिया और संघ के परम प्रिय विजय रूपाणी को सत्ता सौंपी, जबकि आनंदीबेन ऐसा नहीं चाहती थीं। उन्होंने अमित शाह पर अपने खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया। बहरहाल, दलित आन्दोलन अब वहां क्या शक्ल लेगा, यह देखने की बात होगी। पर आरएसएस और मोदी ने गोरक्षा दलों के गठन का आह्वान किया था। यानी बजरंग दल की तरह एक और बड़ा गुंडा दल। यह सब सुनियोजित तौर पर उत्तर प्रदेश में चुनावी लाभ के लिए किया गया था। राममंदिर के नाम पर अब वहां वोट नहीं लिए जा सकते। तो ज़रूरत थी गोरक्षा के नाम पर कुछ दंगे-फसाद करने कर हिंदू वोटों को गोलबंद करने की। इसके लिए गोरक्षा दलों का गठन किया गया। आरएसएस के पास ट्रेनिंग पाए गुंडों की कोई कमी नहीं है। उन्हें तो इशारा मिलना चाहिए। दंगे होते हैं तो लूटपाट कर पर्याप्त धन इकट्ठा कर लेते हैं और औरतों की अस्मत भी लूटते हैं। उन्हें तो मौका चाहिए। यह मौका प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और आरएसएस का नेतृत्व उन्हें देता रहा है। बजरंग दल में सारे छंटे हुए गुंडे थे, जिन्होंने गोधरा कांड के बाद जबरदस्त दंगे फैलाए और उत्पात किया। रावण के तो बस दस सिर थे, इस आरएसएस के न जाने कितने सिर हैं। लेकिन दांव उलटा पड़ गया। गोरक्षा दल के गुंडे दलितों पर पिल पड़े जो सैकड़ों वर्षों से मरे पशुओं की खाल उतारा करते हैं। मुसलमान ये काम नहीं करते। देश में गोमांस का कारोबार मुसलमान नहीं करते, संगठित रूप से हिंदू व्यवसायी ये काम करते हैं। अधिकांश बूचडखानों के मालिक हिंदू हैं, जिनमें एक संगीत सोम भी है। 


मोदी सरकार को कार्यकाल में गोमांस का कारोबार बढ़ा है, उसका निर्यात बढ़ा है, इसे कोई झुठला नहीं सकता। लेकिन इस सरकार ने दंगों का माहौल बनाने के लिए और गाय का इस्तेमाल मुसलमानों के खिलाफ करने के लिए दादरी हत्याकांड को अंजाम दिया। एक निर्दोष की हत्या शक के बिना पर की गई। पर इसका लाभ कुछ नहीं मिला। ये काम चुनाव के पहले ही हो गया। अब चुनाव सिर पर है तो फिर गाय का सहारा है। लेकिन इस बार भी दांव उलटा पड़ गया। निशाना मुसलमानों पर साधना था, आ गए दलित और वह भी गुजरात में। अति उत्साह में ऐसा होता है। अगर आप गुंडों को संगठित करते हैं और उनसे फायदा उठाना चाहते हैं तो कभी वे नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। गुजरात में गोरक्षा दलों के गुंडों ने जब दलितों को बुरी तरह से पीटा तो इसका खामियाजा अब यूपी में भुगतना ही पड़ेगा। भाजपा को जरूरत थी गाय के बहाने यूपी में कुछ और दादरी कांड करने की, हो गया क्या। भूलना नहीं होगा, गोरक्षा दलों के गठन का प्रधानमंत्री मोदी ने ही आह्वान किया था। लेकिन देश में गायों की जो हालत है, वो कोई भी देख सकता है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में जहां भाजपा की सरकार है, वहां गोशालाओं में सैकड़ों की संख्या में गायें उचित देखभाल और पोषण के अभाव में मर गईं। उस पर गोरक्षकों ने कुछ नहीं कहा, न उनके संरक्षक मोदी और आरएसएस ने। क्या इन्हें नहीं पता कि गोमांस निर्यात का भारतीय अर्थव्यवस्था में कितना योगदान है। दूसरी बात, भारत में गोमांस की खपत कम है, ज्यादा निर्यात होता है। 


लेकिन आरएसएस को तो गाय दंगा कराने के लिए चाहिए। इसलिए गोरक्षा दल बनाए, जैसे आरएसएस में आतताई संगठनों की कमी हो गई थी। अब जब पानी नाक पर से ऊपर बहने लगा और आरएसएस के गोरक्षक काबू से बाहर हो गए तो प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि दलितों को न मारो, मुझे ही गोली मार दो। क्या अहमकपना है। क्या दलितों पर जुल्म ढाने वालों पर कार्रवाई के लिए कानून नहीं है। क्या दलित इतने भोले हैं कि वे मोदी की चाल में फंस जाएंगे। क्या लोग ये समझ नहीं गए कि ये आदमी हमेशा जुमले बकता है और इसकी कोई बात गंभीरता से लेने लायक नहीं है। गोरक्षक मोदी को गोली क्यों मारेंगे, उन्हें तो गाय के बहाने मुसलमानों पर हमला करने के लिए संगठित किया गया था। वे ये काम करते, पर मुसलमान तो गायों को नहीं मारते, न उनकी खाल उतारते हैं, ये काम दलित करते हैं तो गोरक्षकों के निशाने पर आ गए। ये गोरक्षक इतने बड़े आतताई हैं कि उन पर मोदी की इस बात का भी की असर नहीं पड़ा कि दलितों को मत मारो, मुझे मारो। इसके बाद भी उन्होंने हैदराबाद में कुछ दलितों की पिटाई की जो मरे पशुओं की खाल उतार रहे थे। ये गोरक्षक गुंडे सड़कों पर घूमते हैं और जहां इन्हें शक होता है कि कोई मरा पशु या मांस-खाल लेकर जा रहा है तो उसे गोमांस घोषित कर मारपीट और दंगा शुरू कर देते हैं। इन्होंने दादरी कांड को अंजाम दिया जिसमें एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की गई और हत्यारों का कुछ भी नहीं बिगड़ा, क्योंकि उन्हें सरकार का संरक्षण हासिल था।



अब ये डैमेज कंट्रोल की कोशिश में लगे हैं। पर यह संभव नहीं है। आरएसएस के पास कोई मुद्दा नहीं जिसे वह यूपी चुनाव में भुना सके। एक गाय हाथ लगी थी, वो भी गई। दलित भड़क गए अलग से और वो भी हिंदुत्व की महान प्रयोगशाला गुजरात में। जहां तक यूपी का सवाल है, वहां दलित वोटबैंक भाजपा का है ही नहीं। यह वोटबैंक दलितों की महारानी ये देवी जो कहें, मायावती का है। गोरक्षकों द्वारा दलितों के उत्पीड़न से मायावती को भाजपा के खिलाफ प्रचार का अच्छा मौका हाथ लगा है। लेकिन फिर भी आरएसएस हिंदू वोटों को गोलबंद करने के लिए चुनाव के ऐन पहले उकसावापूर्ण कार्रवाई कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। आरएसएस ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को दंगा क्षेत्र बनाने की कोशिश की है। उसका सरमाया यही है। दंगा करवाओ और वोट बटोरो, मुसलमानों का भयादोहन करो, यही एकमात्र नीति है। जहां तक गाय का सवाल है, आरएसएस के गोरक्षा अभियान के बारे में हरिशंकर परसाई ने बहुत पहले ही लिखा था कि दुनिया में गाय दूध देने के काम आती है, पर अपने देश में यह दूध देने के अलावा दंगा कराने के काम भी आती है। 

Friday, 19 August 2016

नामवर के बहाने / रवींद्र गोयल

नामवर सिंह द्वारा 90 बरस की उम्र में संघ का पल्ला पकड़ लेने की सही ही आलोचना हो रही है। सवाल है कि क्या यह नामवरजी की ही समस्या है या और साहित्यकार-बुद्धिजीवी भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं। क्या यह एक व्यक्ति विशेष का ही चरित्र है कि तात्कालिक सत्ता को सम्मान के एवज में वैधता प्रदान करे या इस बीमारी के स्रोत कहीं ज्यादा गहरे हैं? अज्ञेय की कविता बौद्धिक बुलाये गए' याद आती है (देखें कविता लेख के अंत में)।

सम्मान के बदले में अपने चेहरे, पद और नाम सरकार को समर्पित कर देना या समर्पित करने को लालायित रहनाभारतीय बुद्धिजीवी वर्ग की, खासकर हिंदी बुद्धिजीवी वर्ग की लाक्षणिक विशिष्टता है। अंग्रेज़ों द्वारा दी गयी शिक्षा प्रणाली में पढ़े-लिखे ये बुद्धिजीवी जब पढ़-लिख कर बाहर आते हैं तो ये अपने परिवेश से अपने आपको बेगाना पाते हैं। अपने रिश्तेदारों, नातेदारोंभाई-बिरादरी और जवार-टोले के अन्य व्यक्तियों के साथ इनका संवाद ही नहीं हो पाता। इनकी पढाई-लिखाई ने भारतीय समाज या परिवेश की कोई समझ इन्हें नहीं दी। और जो सोच-समझ इन्होंने पाई, उससे इनके करीबी लोगों का कोई अर्थपूर्ण या मानीखेज जुड़ाव नहीं हो पाता। कबीर ने यूँ ही तो नहीं कहा –

पढ़ि-पढ़ि के पाथर भयालिख-लिख भया जू ईंट।
कह कबिरा प्रेम की लगी न लगि ने अंतर छींट।।

ऐसे में, अगर ये डॉक्टर या कोई सरकारी अफसर हैं तो और बात हैं, क्योंकि तब ये उनके कुछ काम कर सकते हैं या करवा सकते हैं। नहीं तो इनके नातेदार-रिश्तेदार इनसे एक ही उम्मीद करते हैं कि ये उनकी गाहे-बगाहे आर्थिक मदद कर दें। नतीजानवउदारवादी नीतियों के चलते ग्रामीण जमीनों के दाम बढ़ने से पहले तक तो इनमें से कई गांव जा कर झांकते भी नहीं थे। कई बुद्धिजीवियों ने तो बचपन की ब्याहता पत्नी को छोड़ दिया और शहरों में नए ब्याह कर लिए। उनमें से जो थोड़े-बहुत सामंती संस्कार से ग्रस्त हैं, वो तो गांव पर उस पत्नी के रहन-सहन का खर्च भेज भी देते हैं, नहीं तो प्रगतिशीलता के तहत उससे भी अपने को मुक्त समझते हैं।   

अपने परिवेश से बेगाने ये गमले के गुलाब स्वीकृति खोजते हैं। वाज़िब इच्छा है। किसे शिकायत हो सकती है। इसके दो ही रास्ते हैं। यदि अपने स्वाभाविक परिवेश में स्वीकृति पानी है तो अपने आपको लोगों से एकीकार करना होगा और उसके लिए व्यक्तित्वान्तरण की कष्टसाध्य प्रक्रिया से गुज़रना होगा। जो सीखा नहीं है, सीखना होगा मध्यम वर्ग की सुविधाओं में जीने के मोह को लगाम देकर जीवन में सादगी को अपनाना होगा और जहाँ तक हो सके, कथनी और करनी के फर्क को ख़त्म करना होगा। या दूसरे शब्दों में कहें तो अपने वर्ग की सीमाओं को समझते हुए अपने आप को मेहनती आम जनमज़दूर-किसानों की आशाओंउम्मीदोंआकाँक्षाओंसपनोंदुख-दर्द और ख़ुशी-गम, सभी से जोड़ना होगा, सच्ची वर्ग चेतना से जोड़ना होगा। नामवर के ही शब्दों में- ..... उसकी सच्ची वर्ग चेतना इस बात में है कि वो मज़दूर वर्ग के हितों की रक्षा में ही अंततः अपने हितों की रक्षा महसूस करे और इसके लिए पूंजीवाद के विनाश में मज़दूर वर्ग का साथ दे। ( देखें, कविता के नए प्रतिमान - पेज 246 )इसी बात को कबीर ने दूसरे शब्दों में यूँ कहा है :
"यह तो घर है प्रेम काखाला का घर नाहीं।
सिर उतारे भूँई धरेतब पैठे घर माहीं।''


यह कार्य व्यक्तिगत स्तर पर एक सीमा से आगे नहीं जा सकता। किसी आंदोलन के हिस्से के तौर पर ही हो सकता है। आज़ादी की लड़ाई में यह कार्य गाँधी के नेतृत्व में मुख्यतः संपन्न हुआ। आज़ादी के बाद एक हद तक समाजवादी आंदोलन और कम्युनिस्ट आंदोलन की रहनुमाई में संपन्न हुआ 1959 में ही नामवर कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर पूर्वी यूपी से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। लेकिन अब नक्सलवादी आंदोलन की भिन्न धाराओं या कुछ थोड़े से समाजवादियों को छोड़ करव्यक्तित्वान्तरण या आम जन से एकीकरण के सवालों को कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं उठाता और नक्सलवादी-समाजवादी आंदोलन कि धाराएं भी आज समाज में हाशिए की ताकतें हैं। वैसे भी दुनिया के पैमाने पर प्रभावी माहौल इनके पक्ष में नहीं है। साहित्य, कला और संस्कृति की अपनी यांत्रिक सोच के चलते भी ये धाराएं बुद्धिजीवियों के बहुलांश को आकर्षित नहीं कर पातीं।

अब दूसरा रास्ता भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के पास है तो विदेशों में या सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति पाना। विदेशों में स्वीकृति का रास्ता बड़ा मुश्किल है। एक तो अंग्रेजी में महारत चाहिएदूसरे विदेशी आबोहवा से कुछ पहचान भी चाहिए और आजकल तो टेंट में पैसा भी चाहिए। प्रथम पीढ़ी के पढ़ने वालों के सामने या हिंदीभाषी छात्रों को ये मामला बहुत दुरूह लगता है। कोई गलत भी नहीं, स्वाभाविक ही है। हाँ, देखा जा रहा है कि हिंदी-हिंदीभाषी बुद्धिजीवियों के लड़के-बच्चे आज़ाद भारत में गांधीजी की भारत छोडो आंदोलन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं या उस दिशा में प्रयासरत हैं। ( मैं स्वयं कोई इसका अपवाद नहीं हूँ मेरा बेटा स्वयं विदेश जाने की कोशिश कर रहा है)

आखिरी राह है सरकारी तंत्र द्वारा स्वीकृति की। सरकारी तंत्र में कई संवेदनशील प्रतिभाशाली कविसाहित्यकार अफसर बन कर धंस जाना चाहते हैं और कई धंसे भी हैं शेष जो बचे वो पुरस्कृत हो कर अपने को धन्य समझते हैं। नामवर जी कोई ऐसे अनोखे अपवाद नहीं हैं।
लेकिन इस रास्ते की कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ती है, उसको उकेरते हुए बहुत पहले महाकवि निराला ने सत्ता की गिलौरियाँ खाने को लालायित सुधीजनों को चेताते हुए कहा था -

"साथ न होना।
गांठ खुलेगी।
छूटेगा उर का सोना।
पाना ही होगा खोना।
साथ न होना।
हाथ बचा जाकटने से माथ बचा जा
अपने को सदा लचा जा,
सोच न करमिला अगर कोना।
साथ न होना।"

वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह इसको विस्तारित करते हुए सही ही कहते हैं
'"... फिर से मुड़कर वहीं मत जाना फिर उसी अल्पमत में अपनी जगह बनाने की कोशिश न करनाअपने लोगों के बीच रहना। वरना तुम्हारी गांठ का सोना वे लुटेरे लूट लेंगे। तुम्हारी प्रतिभावर्चस्वितातेजस्विता का इस्तेमाल-उपयोग करके तुम्हें रिक्त कर देंगे। जिसे तुम अपनी उपलब्धि समझोगे, जिस सुविधासुरक्षाऐश्वर्य और स्थापना को तुम पाना समझोगे, दरअसल वही तुम्हारा सबसे बड़ा खोना होगातुम अपना निजत्व अपना मैं सदा के लिए हार जाओगे। अतः किसी प्रलोभन में पड़कर उस राजे के समाज के जादू में मत फँसना"
सोचना होगा कि क्या भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग इस हश्र के लिए अभिशप्त हैशायद नहीं, फ़्रांसीसी लेखक ज्याँ पाल सार्त्र ने 1964 में नोबेल प्राइज लेने से इनकार करते हुए शायद सही ही कहा था-
एक लेखकजो राजनीतिकसामाजिकसाहित्यिक अवधारणाओं की पैरवी करता है, उसे अपने ही साधनों यानी लिखित शब्द के साथ ही अपना कार्य करना चाहिए। सभी सम्मान जो लेखक को प्राप्त होते हैं, वो उसके पाठक पर एक ऐसा दबाव बनाते हैं जिसे वो सही नहीं मानते थे।“ 
यह सही है कि तीसरी दुनिया के बुद्धिजीवियों में सार्त्र जैसी सार्वजनिक स्वीकृति और उससे उपजी
नैतिक ताकत आज कम ही दिखाई देती है, पर इसकी उम्मीद रखना कोई गलत भी तो नहीं है, क्योंकि यह मनोभाव एक इंसानी जिंदगी की पूर्व शर्त होती है।

बौद्धिक बुलाये गए'

-अज्ञेय

हमें 
कोई नहीं पहचानता था।
हमारे चेहरों पर श्रद्धा थी।
हम सब को भीतर बुला लिया गया।
उस के चेहरे पर कुछ नहीं था।
उस ने हम सब पर एक नज़र डाली।
हमारे चेहरों पर कुछ नहीं था।
उस ने इशारे से कहा इन सब के चेहरे
उतार लो।
हमारे चेहरे उतार लिये गये।
उस ने इशारे से कहा
इन सब को सम्मान बाँटो :
हम सब को सिरोपे दिये गये
जिन के नीचे नये
चेहरे भी टँके थे
उस ने नमस्कार का इशारा किया
हम विदा कर के
बाहर निकाल दिये गये
बाहर हमें सब पहचानते हैं :
जानते हैं हमारे चेहरों पर नये चेहरे हैं।
जिन पर श्रद्धा थी
वे चेहरे भीतर
उतार लिये गये थे : सुना है
उन का निर्यात होगा।
विदेशों में श्रद्धावान् चेहरों की
बड़ी माँग है।
वहाँ पिछले तीन सौ बरस से
उन की पैदावार बन्द है।
और निर्यात बढ़ता है
तो हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती हैl’


Ravinder Goel 106 Vaishali Pitampura Delhi-110088 Tel: (R) 42455072, 981134338

Friday, 5 August 2016

यूपी चुनाव : लुटेरों और दंगाइयों के बीच फंसी जनता / मनोज कुमार झा

उत्तर प्रदेश में एक तरह से चुनाव का बिगुल फूंक दिया गया है। सभी पार्टियां विधानसभा चुनाव की तैयारियों में लग गई हैं। पर मुद्दा किसी के पास नहीं है। जहां तक भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो उसके पास सदाबहार मुद्दा है राममंदिर का, अब गाय का मुद्दा जुड़ गया है। दादरी कांड कर भाजपा और संघ परिवार ने अपने गो-प्रेम का अच्छा परिचय पहले से दे रखा है, जिसकी पोल मोदी जी के गुजरात में ही खुल गई। दादरी कांड में पूरी तरह भद्द पिटने के बावजूद संघ परिवार को अक्ल नहीं आई और अब भीड़ के द्वारा मारे गए अखलाक के परिवार पर ही मुकदमा दर्ज किया गया है। यह सब विचित्र है, पर विचित्रता तो ही इस संघ सरकार की विशेषता है। दूसरा ताजा प्रकरण है दलितों की देवी मायावती को भाजपा के एक नेता द्वारा गालियों से नवाजा जाना। सभी जानते हैं कि मायावती क्या हैं और दलितों के लिए उन्होंने क्या किया है। लेकिन सरेआम एक महिला नेता को गंदी गाली देना एक ऐसा काम था, जिसका बचाव भाजपा भी नहीं कर सकी और दयाशंकर को पार्टी से निलंबित कर दिया। लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। दूसरी तरफ, मायावती के अनुयायियों ने भी गाली का बदला जोरदार गालियों से लिया। ये मायावती का तरीका है। ईंट का जवाब पत्थर से। भाजपा को भूलना नहीं चाहिए कि एक समय वह मायावती से साथ यूपी में साझे में सरकार बना चुकी है। उसे वह अनुभव नहीं भूलना चाहिए। भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो रास्ते वे अख्तियार करना चाहते हैं, उनमें मायवती उन पर बीस ही पड़ेंगी।


बहरहाल, यूपी में जो परिस्थितियां बनती जा रही हैं, उनमें मायावती के लिए जीत की राह आसान लगती है। मायावती पर गालियों की बौछार ने दलित और पिछड़ें वोटों का ध्रुवीकरण लगभग उनके पक्ष में कर दिया है। ऐसे भी कांग्रेस की कमजोर स्थिति के कारण पहले से उनके सत्ता में आने की भविष्यवाणी की जा रही है। समाजवादी पार्टी का सूपड़ा इस चुनाव में साफ होना है, इसमें दो राय नही है। समाजवादी पार्टी ने भ्रष्टाचार के साथ ही शासन के सभी चूलों को हिला कर रख दिया है और लंबे समय से लगता रहा है कि यूपी का कामकाज बिना किसी सरकार के ही चल रहा है। मुलायम ने जितना अवसरवाद और लंपटपना दिखाया है, वह अभूतपूर्व है। सपा पूरी तरह उनकी पारिवारिक पार्टी बन कर रह गई है। राज्य में जनभावना उनके खिलाफ है और सपा को चुनाव में भारी पराजय के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगना है। कांग्रेस के लिए उसके इलेक्शन स्ट्रैजिस्ट प्रशांत किशोर दिन-रात एक कर रहे हैं। शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर ब्राह्मण और अगड़ी जातियों के वोटरों को रिझाने की कोशिश की गई है, पर भूलना नहीं होगा कि एक समय मायावती ने ब्राह्मण वोटरों को सफलतापूर्वक अपने पक्ष में कर लिया था। वे फिर ऐसा ही दांव आजमाएंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। कांग्रेस की नीति आगे चल कर प्रियंका गांधी को भी चुनाव प्रचार में उतारने के साथ कांग्रेस में अहम पद देने की भी है। चुनाव प्रचार तो वे पहले से करती रही हैं, पर पार्टी में उन्हें क्या भूमिका दी जाएगी और वे क्या कर पाएंगी, यह अभी साफ नहीं हुआ है। चर्चा है कि सोनिया गांधी रिटायर होंगी और राहुल पार्टी की कमान संभालेंगे। पर अभी तक राहुल ने जो किया है, उससे बहुत उमामीद नहीं बंधती। यद्यपि यह उम्मीद की जा सकती है कि वोट मैनेजमेंट के नये फंडों से शायद कांग्रेस को कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन इतनी तो हर्गिज नहीं मिलेगी कि कांग्रेस यूपी में सरकार बना सके।


सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा यूपी चुनावी दंगल में दूसरी कोई पार्टी नहीं है। सपा साफ है। कांग्रेस अवश्य पहले से बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, लेकिन समीकरण बसपा के पक्ष में दिख रहे हैं। यहां पेंच सिर्फ ये है कि क्या बसपा बहुमत हासिल कर सकेगी। राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि बसपा नंबर-एक पर रहेगी तो जरूर, पर अपने दम पर सरकार बना सकने लायक शायद सीटें न ला सके। ऐसी स्थिति में वह सरकार बनाने के लिए क्या करेगी, यह देखने वाली बात होगी और यह इस पर निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी उसके बाद सबसे ज्यादा सीटें ला पाती है। सपा तो पारिवारिक पार्टी है। जैसे लोकसभा चुनाव में परिवार के सदस्य जीते, उसी भांति यूपी चुनाव में भी परिवार के सदस्य जीत सकते हैं, पर उससे तो मायावती का छत्तीस का रिश्ता है और रहेगा भी। भाजपा के प्रबल होने की स्थिति में मायावती के लिए संकट ज्यादा होगा। वैसे, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अंतिम समय में बसपा और भाजपा मिल कर भी सरकार बना सकती है। यह राजनीति में कुछ भी हो सकता है इस सिद्धांत के आधार पर कहा जा रहा है। लेकिन यदि कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सीटें मिलीं तो क्या मायावती उससे गठबंधन करेंगी, यह सवाल महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान स्थितियों में यूपी में मायावती को ही सत्ता का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। उनके पास वह शक्ति यानी जनबल, धनबल और कौशल है कि वे अपेक्षानुरूप सीटें जीत सकें। मुलायम के कुशासन से आजिज आ चुके लोग एक बार मायावती को मौका देने के बारे में सोच सकते हैं, क्योंकि उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।


अब सवाल भाजपा का है कि वह क्या करेगी। वह तो वही करेगी जो पहले से करती आ रही है यानी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण। दंगे की साजिश रचना और दंगा करवाना ताकि ऐन वक्त पर वोटों का ध्रुवीकरण हो सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भाजपा ने दंगों की उर्वर भूमि बना ही रखा है। गुजरात के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही संघ परिवार के लिए साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला है। राममंदिर के मुद्दे में ज्यादा दम नहीं। पर संघ परिवार को लगता है कि गाय और गोमांस में दम है। इसके बूते कुछ लोगों की हत्या की जा सकती है, दंगे भड़काए जा सकते हैं और हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सकता है। इसलिए वह यूपी चुनाव में इसी को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। लेकिन गुजरात का सच भी है कि किस तरह से वहां दलित समुदाय का गोमांस के मुद्दे पर उत्पीड़न किया गया। भाजपा को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि जिस हिन्दू वोटों की बात वो करती है, उसमें ही दलित-महादलित जैसे वोटबैंक भी हैं, जिन पर पहला दावा मायावती का और बचा-खुचा कांग्रेस का है। भाजपा और संघ के रणनीतिकारों को यह याद रखना चाहिए कि गाय और गोमांस पर खून-खराबा कर सत्ता में आना अब उसके लिए शायद आसान न हो, क्योंकि जनता भले चुपचाप हो, देख-समझ तो सब रही है। वहीं, मुस्लिम वोट बैंक भी अब मुलायम से पूरी तरह दूर होता जा रहा है। यूपी के मुसलमानों को यह समझ में आने लगा है कि मुलायम जिन्हें एक समय मौलाना तक कहा जाने लगा था, उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकते। उन्हें अपने कुनबे से आगे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। जाहिर है, ऐसी हालत में मुस्लिम वोट बैंक बसपा और कांग्रेस के बीच बंटेगा।



एक सवाल ये भी सामने आ रहा है कि कहीं भाजपा और सपा हताशा में कोई दुरभिसन्धि न  करक लें, यानी जीत न रहे हों तो खेल को बिगाड़ने की कोशिश करें। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए दंगों में मुलायम और सपा की भूमिका भी संदिग्ध रही है। अगर ऐसा हुआ तो भी इन्हें ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो सकेगा, बल्कि इनका नंगापन खुल कर सामने आ जाएगा। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है कि यूपी विधानसभा चुनावों में मायावती एक बार फिर सबसे ताकतवर हो कर उभरेंगी। यह परिवर्तन भले ही बहुत सकारात्मक न हो, लेकिन भाजपा के मुकाबले एकमात्र विकल्प है। जब तक जनविकल्प की शक्तियां सामने नहीं आती हैं, जनता के सामने इसके सिवा और कोई दूसरा चारा भी नहीं है कि वह कभी इसे तो कभी उसे आजमाए। 

Tuesday, 14 June 2016

व्यापक वाम मोर्चा वक़्त की ज़रूरत/मनोज कुमार झा



नरेंद्र मोदी (आरएसएस) सरकार के दो वर्ष पूरे हो गए। अब तीन वर्ष और बाकी हैं। ये तीन वर्ष कैसे बीतेंगे और इस दौरान मोदी सरकार क्या-क्या कहर बरपाएगी, यह सोच कर लोग परेशान हैं। चंद आरएसएस समर्थकों को छोड़ कर प्राय: लोगों का यही मानना है कि यह सरकार कांग्रेसी नेतृत्व वाली सरकार से भी कई गुना खराब है और इसका सत्ता में आना बहुत बुरा साबित हुआ है। पर अब कर क्या सकते हैं रोने के सिवा। मोदी ने अपना एक वादा भी पूरा नहीं किया। उलटे, उन्होंने अर्थव्यवस्था को बेलगाम छोड़ दिया, जिसका खामियाजा लोगों को लगातार बढ़ती महंगाई के रूप में भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार की हर नीति दिवालिया है। अर्थव्यवस्था से लेकर विदेश नीति तक यह कांग्रेस की नीतियों को ही लागू कर रही है, पर और भी भद्दे तरीके से। 



कांग्रेस ने अर्थव्यवस्था को बाजार के हवाले किया, पर उसकी गति धीमी थी। राजीव गांधी से शुरू हुई यह प्रक्रिया नरसिंहराव और मनमोहन सिंह के शासन के दौरान परवान चढ़ी, लेकिन मोदी जी की खासियत ये है कि इन्होंने अपनी सरकार को ही बाजार के हवाले कर दिया। इनकी सरकार अंबानी-अडानी चला रहा है। कांग्रेसी योजनाओं को नया नाम देकर मोदी उसे अपनी उपलब्धि बताते हैं, पर जनता यह समझ रही है कि यह तो कांग्रेसियों से भी बड़ा लुटेरा निकला। दूसरे, इसने सामाजिक शांति भी भंग की है। भाजपा का अध्यक्ष अमित शाह जो एक दंगाई और तड़ीपार है, हमेशा उन मुद्दों की तलाश में रहता है, जिनसे धार्मिक विद्वेष पैदा हो और दंगे भड़काए जा सकें। दंगे भड़काने में और सुनियोजित कत्लेआम करवाने में मोदी-अमित शाह की जोड़ी को महारत हासिल है। ऐसे न जाने कितने सबूत हैं जो दिखाते हैं कि गुजरात दंगे भड़काने और हजारों लोगों की हत्या करवाने में इन दोनों की भूमिका रही है, पर इसने न्यायपालिका को अपने पक्ष में कर क्लीन चिट ले लिया। यह वास्तव में इस देश का दुर्भाग्य है। 



अब सवाल है कि आने वाले दिनों में क्या होगा। अगर आरएसएस सत्ता में आने में सफल हुआ तो इसके पीछे वजह ये रही कि जनता कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से बेतरह परेशान थी और उसने बदलाव का मन बना लिया था। पर बदलाव पहले से भी बुरा होगा, ये कुछ लोग ही समझ रहे थे जो आरएसएस के चरित्र से परिचित थे। किसी विकल्प के अभाव में और झूठे प्रचार के बल पर आरएसएस सत्ता में आ गया। अच्छे दिन का नारा देकर प्रधानमंत्री बने मोदी ऐसे दुर्दिन लेकर आए कि अब आम जनता को न रोते बन पड़ रहा है, न हंसते। अच्छे दिन आए महज अंबानी-अडानी और दस प्रतिशत लोगों के जो इन पूंजीपतियों के दलाल हैं या उच्च वर्ग में शामिल हैं। मोदी की एक खासियत ये भी रही कि इन्होंने प्रचार तंत्र यानी मीडिया पर कब्ज़ा कर लिया। यह काम इन्होंने मीडिया को खरीद कर ही किया। कांग्रेस का संभवत: यह एजेंडा नहीं रहा, वर्ना मीडिया को वह भी खरीद सकती थी। बहरहाल, जनता बदलाव चाहती थी तो उसे बदलाव मिला, लेकिन बदतर।



अब सवाल ये है कि ये मोदी (आरएसएस) सरकार से देश को छुटकारा कैसे मिलेगा। इस बात में दो राय नहीं कि यह सरकार पांच साल तक तो रहेगी, लेकिन उसके बाद क्या ? यह ऐसा सवाल है जो हर विचारशील व्यक्ति के मन में है। दो साल तो जनता ने झेल लिया, तीन साल और झेल लेगी, यह और बात है कि तब तक यह सरकार देश के संसाधनों को पता नहीं कितना लूटेगी और लुटवाएगी, लेकिन 2019 में जब आम चुनाव होंगे तो क्या होगा ? कैसा विकल्प सामने आएगा, यह एक गंभीर प्रश्न है। यहां देश के प्रमुख राजनीतिक दलों की स्थिति पर विचार करना जरूरी होगा। भाजपा के बरक्स कांग्रेस अभी भी एक सबसे बड़ी पार्टी है। अन्य दल क्षेत्रीय चरित्र वाले हैं, यद्यपि अखिल भारतीय राजनीति में उनका महत्त्व कम नहीं है। वामपंथी दल भी अलग स्थान रखते हैं। लेकिन इन दलों की फिलहाल कोई ऐसी नीति या कार्यक्रम दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जिनके आधार पर कहा जाए कि वे आने वाले समय में भाजपा-आरएसएस के लिए चुनौती बन सकेंगे।



लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर सत्ता में आने के बाद अब राज्यों में भाजपा को  यद्यपि कोई बड़ी जीत मिलती नहीं दिख रही, पर कांग्रेस की स्थिति भी पहले से कमजोर होती जा रही है। झारखंड, हरियाणा जैसे राज्यों में भाजपा शासन हर मोर्चे पर फेल है और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी ने कांग्रेस के खिलाफ बिगुल फूंक दिया है। वहां नये समीकरण बन सकते हैं जो भाजपा के खिलाफ जाएंगे। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह की सरकार पूरी तरह बदनाम हो चुकी है। व्यापमं घोटाले ने शिवराज की कलई खोल दी है। यहां भी जब चुनाव होंगे, शिवराज का फिर से सत्ता में लौट पाना मुश्किल होगा। उत्तराखंड में हरीश रावत की सरकार को हटाने की कोशिश मोदी जी को भारी पड़ी है और इससे भाजपा की कलई खुली है। पर जो बेशर्मी की हद पर उतरा हो, उसे इन बातों से क्या फर्क पड़ता है। कहने का मतलब कि भाजपा में वो दम नहीं कि अगले चुनाव में वह जीतने की उम्मीद कर सके। अभी हुए विधानसभा चुनावों में सिर्फ असम में उसे जीत मिली है, यह उसकी उपलब्धि मानी जाएगी, साथ ही कांग्रेस के एक किले का ढहना।



पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम वामपंथी दलों को आईना दिखाने के लिए काफी हैं। ममता बनर्जी का वहां पहले से भी मजबूत हो कर उभरना यह दिखा देता है कि वामपंथियों की दाल वहां अभी गलने वाली नहीं है और कांग्रेस के साथ उनके गठबन्धन का कोई भविष्य नहीं है। पश्चिम बंगाल में तो यह साबित हो ही चुका है, आने वाले दिनों में राष्ट्रीय स्तर पर भी साबित हो जाएगा। दरअसल, वामपंथियों को अपने संगठन और कार्यनीति पर फिर से सोचने की ज़रूरत है। भूलना नहीं होगा कि देश में मज़दूरों-किसानों की एक बड़ी आबादी के साथ मध्य वर्ग का एक ऐसा तबका भी है जो इनकी तरफ आशा भरी निगाहों से देखता है। लेकिन ये पूंजीवादी राजनीति के घेरे से निकल पाने को तैयार नहीं दिखते। जबकि अभी भी इनका सांगठनिक ढांचा इतना मजबूत जरूर है कि ये चाहें तो एक बड़ा अभियान चला कर विकल्प की राजनीति की शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए इन्हें अपनी सीमाओं से निकलना होगा और सुविधाभोगी संस्कृति से पीछा छुड़ाना होगा। वामपंथियों में अनुभवी नेताओं की कमी नहीं है, बावजूद इनका कन्हैया जैसे अनुभवहीन युवा पर निर्भर हो जाना इनकी कमजोरी को ही दिखलाता है। कन्हैया का प्रयोग असफल रहा, यह वामपंथियों को स्वीकार कर लेना चाहिए और अपने आधार की तलाश विश्वविद्यालयों से अलग हट कर फैक्ट्रियों और कामगार आबादी के बीच करनी चाहिए। निश्चय ही, इससे इन्हें नई ऊर्जा मिलेगी और ये जनविकल्प खड़ा करने की दिशा में कुछ कर सकेंगे। इन्हें यह समझना चाहिए कि देश फासीवाद की चुनौती से जूझ रहा है और ऐसे में अब पुराने खोल से बाहर निकलना बहुत जरूरी है।



कांग्रेस एवं अन्य सत्तालोलुप दलों के पीछे चल कर वामपंथी कुछ भी हासिल नहीं कर पाएंगे, बल्कि अपनी खोती जा रही जमीन को पूरी तरह खो देंगे। इसलिए आरएसएस की सत्ता के खिलाफ इन्हें एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए और अपने संगठनों के माध्यम से राष्ट्रव्यापी हड़ताल और जन आंदोलनों की शुरुआत करनी चाहिए। तभी कोई रास्ता खुल सकता है। सोनिया, लालू, नीतीश और इस तरह के नेताओं के पीछे चलने से आरएसएस की सत्ता का कोई जनविकल्प सामने नहीं आ सकता। हां, आरएसएस के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष में जो दल इनसे जुड़ना चाहें, उन्हें अपने साथ ये ले सकते हैं। आज जो स्थितियां बन गई हैं, उनमें वर्तमान फासीवादी सत्ता के खिलाफ एक व्यापक वाम मोर्चा की राजनीति ही कारगर हो सकती है।